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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

लू के थपेड़ों से झुलसेगी दुनिया

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्रीन हाउस गैसों का अगर इसी तरह उत्सर्जन होता रहा तो सदी के अंत तक दुनिया की 74 प्रतिशत आबादी को गंभीर स्थितियों का सामना करना होगा

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण इंसान के भविष्य पर दिनोदिन और गहरे सवाल खड़े होते जा रहे हैं। विश्व की तीन-चौथाई आबादी को जल्द ही भयानक लू के थपेड़ों का सामना करना पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहता है, तो हम में से कई लोगों को अपने जीते-जी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। 1980 से लेकर अब तक दुनिया के 1,900 अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग लोग गर्मी और उमस के कारण मारे गए हैं। 2010 में मॉस्को में 10,800 लोगों की गर्मी के कारण मौत हुई। 2003 में पेरिस में करीब 4,900 लोग गर्मी और उमस के कारण मारे गए। 1995 में शिकागो में गर्मी और उमस ने लगभग 740 लोगों की जान ली। शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु इतनी तेजी से बदल रही है कि इतने कम समय में बढ़े हुए तापमान के प्रति इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर नहीं हो सकती है। 
शोधकर्ताओं के मुताबिक, साल 2000 में दुनियाभर में बड़ी तादाद में लोग 20 दिन या इससे भी ज्यादा समय तक गर्मी के कारण बेहद जानलेवा स्थिति के शिकार हुए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कार्बन उत्सर्जन इसी तरह होता रहा, तो इस सदी के अंत तक विश्व के 74 फीसद लोगों को बढ़े हुए तापमान के कारण बेहद गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ेगा। सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने की हरसंभव कोशिश करने पर भी दुनिया की 47 फीसदी से ज्यादा आबादी 2100 तक घातक व जानलेवा लू का शिकार हो जाएगी। 
एक शोध में पाया गया कि प्राकृतिक कारणों के मुकाबले इंसानों की गतिविधियां इस दुनिया को 170 गुना तेजी से गर्म कर रही हैं। इस बढ़ती गर्मी के कारण पेड़-पौधों और जीवों की कई प्रजातियों को बहुत गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। ‘नेचर’ एक पत्रिका में छपे एक शोधपत्र का कहना है कि इस जलवायु परिवर्तन के कारण इंसानों के अस्तित्व पर खतरा गहराने लगा है। इस शोधपत्र को लिखने वाले प्रमुख वैज्ञानिक केमिलो मोरा ने कहा, 'भविष्य के लिए हमारे विकल्प तेजी से खत्म होते जा रहे हैं।' उन्होंने कहा, 'गर्म हवा के थपेड़ों से बचने के लिए हमारे पास जो विकल्प हैं, वे बेहद खराब हैं। दुनिया में अभी से ही लोगों को इन गर्म हवाओं का खामियाजा उठाना पड़ रहा है। संभावना है कि ये गर्म हवाएं जारी रहेंगी। अगर कार्बन उत्सर्जन को प्रभावी स्तर तक कम नहीं किया गया, तो स्थितियां और बदतर हो जाएंगी।' इंसानी शरीर 37 डिग्री सेल्सियस के जिस्मानी तापमान या फिर इससे थोड़े आगे-पीछे के टेंपरेचर को सहन कर सकता है। गर्म हवा के थपेड़े इंसान के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। ज्यादा उमस होने से यह स्थिति और घातक हो जाती है। इससे इंसान के शरीर का तापमान बढ़ सकता है और उसकी जान भी जा सकती है। 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक के तापमान में इंसान के शरीर का तापमान अगर घटता है, तो वह बच सकता है। पसीना बाहर निकलने से शरीर की गर्मी कम होती है, लेकिन जब उमस बढ़ जाती है तब हवा में नमी की अधिकता हो जाती है। ऐसी स्थिति में चूंकि पसीना हवा में वाष्पीकृत नहीं हो पाता, तो यह प्रक्रिया भी कारगर साबित नहीं होती।



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