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गुरुवार, 20 जून 2019

शब्दों में उतरी गंगा

लेखक-पत्रकार अमरेंद्र राय अपनी पुस्तक ‘गंगा तीरे’ में क ऐसे यात्री की तरह दिखते हैं, जो गंगा को उसके प्रवाह में ही नहीं, मन से लेकर परंपरा तक पर छाए उसके प्रभाव के रूप में भी देखता है

दुनिया भर में नदियों के साथ संस्कृति का एक सजल पक्ष सामान्य रूप से जुड़ा है। नदियों का यह सजल पक्ष उस हस्तक्षेप का भी नाम है, जो जीवन और संस्कार को दूर तक प्रभावित करती है। लेखक-पत्रकार अमरेंद्र राय की पुस्तक ‘गंगा तीरे’ इसी हस्तक्षेप के दिलचस्प सांस्कृतिक धरातलों और विवरणों की खोज है। इस पूरी पुस्तक में राय एक ऐसे यात्री की तरह दिखते हैं, जो गंगा को उसके प्रवाह में ही नहीं, मन से लेकर परंपरा तक पर छाए उसके प्रभाव के रूप में भी देखता है। कमाल यह कि यह देखना भी बहुत प्रयासपूर्व नहीं, बल्कि स्वाभाविक मालूम पड़ता है।
गंगा को भजने और गाने की परंपरा देश में नई नहीं है। जो नया है, वह है गंगा के नाम पर सांस्कृतिक पाखंड और वितंडा, जिसमें आस्था किसी भाव का नहीं, बल्कि एक नकारात्मक नारे का नाम है, सामाजिक बिखराव में जुटी मंशा का नाम है। अमरेंद्र राय की गंगा को लेकर आस्था इस पाखंड से जहां मुक्त है, वहीं वह व्यक्ति और समाज के बीच एक सांस्कृतिक प्रवाह के रूप में गंगा की बार-बार शिनाख्त करते हैं। उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में कहा भी है- ‘पिछले 60 साल से गंगा से नजदीक का वास्ता रहा है। इस कारण गंगा के किनारे रहने वाले लोगों को नजदीक से देखा है, उनकी संस्कृति को नजदीक से समझा है।’
‘गंगा तीरे’ पुस्तक छह सर्गों में पूरी होती है- दो-दो गंगा, वाराणसी में गंगा, हिमालय में गंगा, गंगोत्री से गोमुख में गंगा, गंगा यात्रा- गोमुख से देवप्रयाग तक भागीरथी, देवप्रयाग से प्रयागराज तक गंगा, प्रयाग से पटना तक गंगा और पटना से गंगासागर तक गंगा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र गंगा को लेकर चर्चा में कई मौकों पर कहते थे कि गंगा और उससे जुड़ी संस्कृति, उसके कारण बनती-बदलती लोक परंपरा में हम जब भी गोता लगाएंगे तो पाएंगे कि गंगाजल सिर्फ हमारी प्यास और आचमन के लिए ही नहीं है, बल्कि इससे भारतीय लोकजीवन ने वह सामासिक संस्कार पाया है, जिसमें एक तरह श्रम और खेती की हरित परंपरा है, तो वहीं मिट्टी और प्रकृति के साथ सानिध्य की एक बड़ी सांस्कृतिक ललक भी है। आज इस परंपरा और ललक की पहचान कहीं न कहीं उस संकट के समाधान का भी प्रयास है, जो जल संकट और हरित भूमि को लेकर हमारे सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी है?
‘दो-दो गंगा’ सर्ग में राय के गांव और उसके आसपास के जीवन की झांकी है। इस जीवन में उत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन को अगड़ा-पिछड़ा का अगर अलगाव नजर आता है तो इसके साथ पानी को लेकर कम से कम मनमानी का सबक भी दिखता है। यही नहीं, गंगा अपनी प्रकृति और प्रवाह से जीवन संस्कार से लेकर हमारी भाषा तक को किस तरह समृद्ध करती है, उसकी भी चर्चा यहां है। राय एक जगह कहते हैं, ‘करीब वाली गंगा को छाड़न कहते हैं और दूर वाली गंगा को बहरी। भोजपुरी जानने वाले लोग छाड़न का मतलब खूब समझते हैं। मैंने भी छाड़न शब्द बचपन से सुना है।’ गंगा को लेकर यह शाब्दिक विमर्श हमें अनजाने ही इस बात से भी कहीं न कहीं आगाह करता है कि हमारे व्यवहार और अभिव्यक्ति के शब्द अगर मौलिक सजलता से समृद्ध नहीं रहेंगे, तो उनकी शुष्कता हमारे जीवन और जीवन मूल्यों को भी शुष्क करेंगे।
गंगा का जिक्र आते ही वाराणसी का चित्र मन में सबसे पहले उभरता है। कवि केदारनाथ सिंह मानते थे कि बनारस पर लिखी उनकी कविता उनके मन के सबसे करीब है। केदार जी की तरह अमरेंद्र राय को भी बनारस में गंगा में डुबकी लगाने का वर्षों मौका मिला। संयोग से ये साल उनकी तरुणाई के भी रहे। बनारस में गंगा न सिर्फ प्रशांत प्रवाह में है बल्कि इसका विस्तार वहां के जीवन में स्पष्ट दिखता है। ‘वाराणसी में गंगा’ की चर्चा करते हुए राय कहते हैं, ‘बनारस में गंगा आमतौर पर शांति से बहती है। स्नान करने का जो मजा यहां आता है, कहीं और नहीं। जितने घाट बनारस में हैं, उतने किसी और शहर में गंगा के किनारे नहीं हैं। इसीलिए बनारस को घाटों का शहर कहा जाता है। बनारस में एक और खासियत मैंने देखी। यहां के लोगों का गंगा के प्रति अच्छा-खासा लगाव है। यहां गंगा में स्नान करने स्थानीय लोग ज्यादा हैं। हरिद्वार या प्रयागराज में स्नान करने वाले ज्यादातर लोग बाहरी होते हैं।’
आगे चलकर जब ‘प्रयाग से पटना तक गंगा’ का जिक्र आता है तो राय ने इस बात को बहुत खूबसूरती के साथ दर्ज किया है कि गंगा की धारा और उससे जुड़ी आस्था का भावनात्मक पक्ष इतना कारुणिक है कि कोई चाहे तो कह सकता है कि साहित्य और लोकभाषा में भावों के मानवीकरण के जितने प्रयोग गंगा को लेकर हुए हैं, वैसा शायद नील और वोल्गा को लेकर भी शायद ही हुए हों। अमरेंद्र राय लिखते हैं, ‘गंगा का मन काशी से आगे बढ़ने का नहीं होता। पर उसे आगे तो बढ़ना ही है। वरना भगीरथ के पुरखों का उद्धार कैसे होगा। वह यहां से धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।’ इसी सर्ग में वे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की भी चर्चा करते हैं, जो कुछ समय तक गाजीपुर में आकर रहे थे। यहीं रहकर उन्होंने ‘मानसी’ और ‘नौका डूबी’ की रचना की थी। पुस्तक के अन्य सर्ग भी इसी तरह दिलचस्प हैं।
राय के गंगा तीरे की यात्रा में कई ऐसे अनाम किरदार हैं, जो अपने समय में अपने आसपास के जीवन और संस्कार का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहीं कोई बाबा हैं तो कहीं कोई पढ़ा-लिखा तर्कशील युवक। गांव कस्बों की महिलाओं के साथ गीत-गौनी और लोक शब्दों और मुहावरों की भी यात्रा है यह पुस्तक। अच्छी बात एक यह भी है कि गंगा को लेकर अपनी शब्द यात्रा राय काफी अंतरंगता के कारण पूरी करते हैं। इस अंतरंगता को बनाए रखने के लिए उन्होंने भाषागत शैली के साथ अलग से कोई प्रयोग करने के बजाय इसे सामान्य और बोलचाल जैसा रहने दिया है। इस कारण यह एक पत्रकार के बजाए एक किस्सागो की किताब ज्यादा लगती है। पहली बार हाथ में लेने के बाद कम ही लोग ऐसे होंगे जो इस किताब को पूरा न पढ़ना चाहें। ‘गंगा तीरे’ का लेखन, उसकी विषयवस्तु और उसका पाठ तीनों मिलकर एक रचनात्मक और एक संतृप्त करने वाले संतोष को जन्म देते हैं। 



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