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शनिवार, 25 मई 2019

देवी - खुशियों से भागने का क्या मतलब...

देवी की कहानी अन्य विधवा माताओं से कुछ खास अलग नहीं है। लेकिन, उनकी जीवन के प्रति आशावादी सोच जरूर बाकी सबसे अलग है

‘ना, मैं वापस क्यों जाना चाहूंगी, जब सबकुछ यहां अच्छा चल रहा है, जब मैं यहां खुश हूं..... ’ हां, वह सच में बहुत खुश है। यह साफ देखा जा सकता है, वह जिस तरह उत्साह से बातें करती है, उनकी आंखों में जिस तरह की चमक दिखती है, जिस तरह वह वृंदावन की माटी में खुशियों की बात करती है, जिस तरह वह टूटी-फूटी हिंदी में बात करने की कोशिश करती है, इन सबसे पता चलता है कि वह बहुत खुश है।
वृंदावन में देवी को लगभग एक दशक हो चुका है। वह पश्चिमी बंगाल के नादिया जिले के रानाघाट की रहने वाली हैं। उनकी कहानी, अन्य विधवा माताओं से कुछ खास अलग नहीं है। लेकिन, उनकी जीवन के प्रति आशावादी सोच जरूर बाकी सबसे अलग है।
देवी सिर्फ 7 साल की थी, जब उनकी शादी एक 10 साल के लड़के से कर दी गई। जब कोई इस बात को सुनकर आश्चर्य से उनकी ओर देखता है, तो देवी हंस देती हैं जैसे यह उस वक्त के लिए बहुत साधारण बात हो। समय के साथ जीवन आगे बढ़ा, बालपन से गृहस्थ जीवन में प्रवेश हुआ और देवी ने एक लड़की को जन्म दिया।
उसका पति दिन भर खेतों में काम करता था, और वह घर पर अन्य काम के साथ बच्ची की देखभाल करती थी। उसका परिवार छोटा था, इसीलिए पैसों की भी कोई समस्या नहीं थी। वह अपनी जिंदगी में खुश थी।
जब लड़की बड़ी हो गई, तो उन्होंने उसके लिए वर तलाशना शुरू कर दिया। उस वक्त समाज में शादियां जल्दी होती हो जाती थीं, देवी की खुद की शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी, इसीलिए समाज का भी दबाव था कि जल्द ही वह अपनी बेटी के लिए एक अच्छा सुयोग्य वर ढूंढे।
फिर देवी ने अपनी क्षमता के अनुसार धूमधाम से अपनी बेटी की शादी कर दी।
अब देवी को सिर्फ अपने पति का सहारा था। उसका पहले से ही छोटा परिवार अब और छोटा हो चुका था। लेकिन फिर भी एक-दूसरे के प्यार सहारे वो खुश थे।
लेकिन समय के साथ, देवी के पति को सांस की बीमारी ने जकड़ लिया। लगातार उसके पति की पति हालत, इस बीमारी की वजह से खराब होती गई और एक दिन आखिरकार काल ने उसके पति को छीन लिया। सांस की बीमारी ने सांसों का चलना रोक दिया और देवी अपनी जिंदगी में अकेली रह गई। 
अब देवी की जिंदगी में वैधव्य का सफेद रंग घर कर चुका था। उसका जीवन सिर्फ एक रंग का ही नहीं, बल्कि नीरस भी हो चुका था। वह अपने पति के गुजर जाने से दुखी थी, लेकिन फिर भी उसे जीवन से कोई शिकायत नहीं थी। 
देवी कहती हैं, ‘जो होना है, वो तो होगा ही, उसे आप रोक नहीं सकते। आपका इस पर कोई वश नहीं है। इसीलिए जीवन से शिकायत करने का कोई मतलब नहीं है।’
वक्त गुजरा, देवी अपनी अकेली जिंदगी में किसी तरह आगे बढ़ी। फिर एक दिन, उसके कुछ पड़ोसी वृंदावन जा रहे थे और उन्होंने देवी से साथ चले को कहा। देवी ने पहले से ही वृंदावन के बारे में सुन रखा था। उसे पता था कि वैधव्य का जीवन जीने वाली बहुत-सी महिलाएं शांति की तलाश में राधा-रानी की भूमि वृंदावन आती हैं। इसीलिए देवी भी वृंदावन आने के लिए तुरंत तैयार हो गईं।
वृंदावन पहुंचकर देवी को कुछ अनोखा और अप्रतिम प्रतीत हुआ। जैसे वहां की माटी में ही कुछ खास हो। 
देवी कहती हैं, ‘जो कुछ मैंने वृंदावन के बारे में सुना था, सब मुझे वहां पहुंचकर महसूस हुआ। वहां का पवित्र वातावरण मेरे लिए जीवन बदलने वाला था। सब वहां भगवान कृष्ण की भक्ति में डूबे थे। मुझे भी लगा कि मैं यहां शांति पा सकती हूं। मैं कई दिनों तक वृंदावन की सड़कों पर घूमी। धीरे-धीरे मैं भी कान्हा की भक्ति में डूबने लगी और मेरे तन-मन में शांति और स्थायित्व का भाव उभरने लगा। इसीलिए जब यात्रा के बाद मेरे  साथी वापस जाने लगे, तो मैंने वापस जाने से मना कर दिया। मैंने फैसला किया कि मैं अब वृंदावन में ही रहूंगी।’ 
लगभग 10 साल पहले देवी वृंदावन आई थीं और यहीं की होकर रह गईं। देवी को लगता है कि यह जैसे 10 साल की नहीं, बल्कि कल की ही तो बात हो। वह कई वर्षों से सुलभ इंटरनेशनल द्वारा सहायता प्राप्त ‘मां शारदा महिला आश्रम’ में रहती हैं। देवी बताती हैं कि लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) हम सबका अपनी मां, बहनों और बेटियों की तरह खयाल रखते हैं। एक आशावादी और खुशमिजाज व्यक्तित्व के रूप में देवी भजन गाती हैं, अपने साथियों से खूब बातें करती हैं, टीवी देखती हैं और चारों तरफ खुशियां बिखेरती हैं।
देवी साल में एक बार अपनी बेटी से भी मिलने जाती हैं। लेकिन वह वापस फिर वृंदावन लौट आती हैं, क्योंकि उसका मन अब वृंदावन में ही बसता है। वह कान्हा की दासी ही बने रहना चाहती हैं। 
चेहरे पर एक खूबसूरत मुस्कान बिखेरते हुए देवी कहती हैं, ‘हर किसी को वहीं रहना चाहिए जहां उसे खुशी मिलती हो, खुशियों से भागने का कोई मतलब नहीं है। मैं यहां खुश हूं और कान्हा की माटी में ही अंतिम सांस लेना चाहती हूं।’ 



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