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शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

हिमांशु पटेल - गांव बना शहर

महज 22 साल की उम्र में सरपंच बने हिमांशु पटेल ने पुनसारी गांव को शहरों के मुकाबले संसाधन युक्त बनाया

पुनसारी आज भारत के सबसे अच्छे गांवों में से एक है, क्योंकि इस गांव में शहर की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन यह गांव हमेशा से ऐसा नहीं था। यह सब एक आदमी के प्रयास से संभव हो सका है, जिसने पिछले कुछ सालों में गांव की तस्वीर ही बदल दी।
बता दें कि हिमांशु पटेल का जन्म गुजरात के साबरकांठा जिले के पुनसारी गांव में हुआ। हालांकि हिमांशु की स्कूली पढ़ाई के बाद उनका परिवार शहर चला गया था, जहां उनकी आगे की शिक्षा पूरी हुई। छुट्टियों के दौरान एक बार हिमांशु का अपने गांव आना हुआ, जहां न तो बिजली थी, न पानी और न ही कानून व्यवस्था। जबकि हिमांशु को गांव और शहर के बीच का अंतर समझ आने लगा था। उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान गांवों की स्थिति को बदलने के लिए अपनाई जाने वाली सरकारी योजनाओं पर शोध किया। इसके साथ ही उन्होंने समुदाय की भलाई के लिए काम करने और योजनाओं का उपयोग करने के लिए सरपंच और अधिकारियों से आग्रह भी की।
हालांकि उस समय कोई भी व्यक्ति उस एक युवा लड़के को सुनने के लिए तैयार नहीं था। सभी को लगता था कि वह इस काम के लिए बहुत छोटे हैं। हिमांशु ने बताया कि गांव में रहने वाले लोगों की मानसिकता को बदलना बहुत मुश्किल काम है। स्नातक स्तर की पढ़ाई खत्म करने के बाद हिमांशु 22 वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र के सरपंच बन गए।
जब वह सरपंच बने तो गांव में 23 विभिन्न समुदायों के लोग रहते थे, जिनमें 98 प्रतिशत ग्रामीण अशिक्षित थे और उनका मुख्य व्यवसाय कृषि या डेयरी फार्म हैं। वहीं पंचायत के पास कोई धन नहीं था, बल्कि 1.2 लाख रुपए का ऋण था। इसके साथ ही कुछ प्रभावशाली लोग हमेशा नए सरपंच का विरोध करने के लिए तैयार बैठे थे।
वहीं हिमांशु ने बताया कि उन्हें काम करने के लिए एक टीम की जरुरत थी। इसीलिए उन्होंने सरकार में नियुक्त लोगो से 60 सदस्यीय टीम बनाई, जिसमें गांवो के शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मचारी शामिल किए गए। सरकारी योजनाओं के माध्यम से गांव में मूल सुविधाएं पहुंचाने के लिए हिमांशु को ग्रामीणों के बीच भरोसा हासिल करना सबसे बड़ा मुद्दा था। इसके लिए उन्होंने सर्वप्रथम गांव के लोगों की प्राथमिकताओं को समझने की कोशिश की। अपने कार्यकाल के पहले तीन वर्षों में उन्होंने ग्रामीणों की सभी बुनियादी जरूरतों का ख्याल रखा। हिमांशु बहुत मजबूत थे कि वह किसी भी गैर-सरकारी संगठन या सीएसआर की सहायता या धन के लिए कोई दान नहीं लिया। इसके बजाय उन्होंने इस खाई को भरने के लिए सरकारी योजनाओं का इस्तेमाल किया।
उन्होंने योजनाओं के लिए दक्षता से आवेदन भरना शुरू किया और नई योजनाएं भी शामिल की। दो वर्षों के भीतर गांव में बिजली, सड़क, पानी वितरण प्रणाली स्थापित की गई, पक्के सड़कों को विकसित किया और गांव के हर घर में शौचालय भी बनाया गया। लेकिन हिमांशु ने गांव के लिए इन बुनियादी सुविधाओं की तुलना में बहुत ज्यादा सोचा था। वह उपलब्ध कराना चाहते थे। 



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