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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

जल प्रबंधन सिखाते मंदिर

कुंडों, कुओं और तालाबों के साथ मंदिर निर्माण की परंपरा काफी पुरानी है। ज्यादातर मंदिरों में पूजा की पारंपरिक पद्धति भी उससे जुड़े जल-स्रोत से जुड़ी है

 

अगर कोई कहे कि मंदिरों का धार्मिक महत्व तो है ही, उससे ज्यादा इसका जल संरक्षण की दृष्टि से ज्यादा महत्व है, तो अच्छा आशय प्रकट होने के बावजूद पहली नजर में यह बात कुछ समझ नहीं आती है। दरअसल, इसे समझने के लिए मंदिरों से जुड़ी देशज परंपरा का गहन अध्ययन जरूरी है। जल कुंडों, कुओं और तालाबों के साथ मंदिर निर्माण की भारतीय परंपरा कोई आज की नहीं है। ज्यादातर मंदिर में पूजा की पारंपरिक पद्धति भी यही है कि उससे जुड़े जलस्रोत से मंदिरों में स्थापित देवी-देवता का जलाभिषेक किया जाए। 

जॉयसागर टैंक
ऐेतिहासिक तौर पर भी देखें तो देश के विभिन्न हिस्सों में राजाओं ने मंदिरों के साथ के कुंडों का निर्माण करवाया है। इनके निर्माण के दो प्रयोजन थे। लोगों की मान्यता है कि मंदिरों के कुंड में स्नान करने से आप अंदर तक पवित्र हो जाएंगे और दूसरा यह कि भारत के अधिकांश क्षेत्र पानी 
के लिए बारिश पर निर्भर होते हैं। ऐसे में बारिश के मौसम में इन कुंडों पानी में संग्रहित होता है 
और जरूरत के वक्त लोगों की पानी की मूलभूत जरूरतों को पूरा करते हैं। असम का जॉयसागर 
टैंक इसका उदाहरण है, जिसका निर्माण अहोम राजा रुद्र सिंह ने अपनी मां जायमति की स्मृति 
में करवाया था। इस टैंक को देश के सबसे 
बड़े मंदिर कुंड के रूप में जाना जाता है। यह 318 एकड़ में फैला है और इसके किनारों पर जयदोल मंदिर, शिव मंदिर, देवी घर और नाटी गोसाईं 
के मंदिर हैं।
नरेंद्र सरोवर
पुरी में स्थित नरेंद्र सरोवर को ओडिशा का सबसे पवित्र सरोवर माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर के उत्तर-पूर्व में स्थित इस सरोवर का फैलाव 3.24 एकड़ में है। तमिलनाडु के कंुभकाेणम शहर में स्थित महामहम सरोवर 6.2 एकड़ क्षेत्र में फैला है और 16 छोटे मंडपों और नव कन्निका मंदिर से घिरा है। ऐसी मान्यता है कि महामहम उत्सव के दौरान भारत की सभी प्रमुख नदियां इस सरोवर में मिलती हैं। इनके अलावा भी देश में सैकड़ों मंदिर मौजूद हैं, जो क्षेत्र विशेष की जल आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हैं। हिन्दुओं की इस परम्परा को सिख समुदाय ने भी अपनाया। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का ‘अमृत सरोवर’ इसी का एक उदाहरण है।
सीता कुंड
कई स्थानों पर प्राकृतिक कुंड भी देखने को मिलते हैं, जो गर्म पानी के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं प्राकृतिक कुंडों में से एक है बिहार के मुंगेर जिले का सीता कुंड। मान्यता है कि सीता ने अग्नि परीक्षा के बाद इस कुंड में स्नान किया था। तभी से इस कुंड का पानी गर्म हो गया। इसके आस-पास सीता मंदिर है और बाद में चारों भाइयों के नाम से राम कुंड, लक्ष्मण कुंड, भरत कुंड और शत्रुघ्न कुंड बनवाए गए।

दक्षिण भारत की मिसाल
दक्षिण भारत में खेतों की सिंचाई पारंपरिक रूप में पानी के छोटे-छोटे स्रोतों से की जाती थी। सिंचाई के संसाधनों के संचालन में मंदिरों का महत्वपूर्ण योगदान होता था। हालांकि चोल (9वीं से 12वीं सदी) और विजयनगर दोनों ही साम्राज्यों ने कृषि को बढ़ावा दिया, फिर भी इनमें से किसी ने 
भी सिंचाई और सार्वजनिक कार्यों के लिए अलग 
से विभाग नहीं बनाया। इन कार्यों को सामान्य 
लोगों, गांवों के संगठनों और मंदिरों पर छोड़ दिया गया था, क्योंकि ये भी जरूरी संसाधनों को राज्य 
की तरह ही आसानी से जुटा सकते थे। उदाहरण के तौर पर, आंध्र प्रदेश के तिरुपति के पास स्थित कालहस्ती में बना शैव मंदिर चढ़ावों का उपयोग सिंचाई के लिए नहरों की खुदाई और मंदिरों 
की अधिकृत जमीनों पर फिर अधिकार प्राप्त करने के लिए करता था। 1540 के कालहस्ती अभिलेख के अनुसार, ‘वीराप्पनार अय्यर ने भगवान के खजाने में 1306 पोन (मुद्रा) जमा किए, जिसका उपयोग मुत्तयामान समुद्रम के पास के नए क्षेत्रों को खरीदने में किया जाना था, जिससे इस जमीन को खेती के काम में लाया जा सके। इसके अलावा, लक्कुसेतिपुरम झील से पानी निकालने का भी प्रयोजन था। इस झील की मरम्मत और रखरखाव के लिए जमा किए गए धन में से 1006 पोन खर्च किए जाने थे।’

मंदिर और सिंचाई
दक्षिण भारत में मंदिरों के जरिए चलाई जाने वाली सिंचाई परियोजनाओं के और भी उदाहरण मिलते हैं। 1584 में एक शैव और वैष्णव मंदिर के न्यासियों का कुछ अन्य लोगों की सहायता से एक मंदिर की अधिकृत जमीन पर स्थानीय नदी से निकाले गए नालों की खुदाई करने जैसा उदाहरण भी मिलता है। इन नालों से पानी दूसरे मंदिर की जमीन पर बने तालाब में ले जाया जाता था। जिस मंदिर की जमीन पर नालों की खुदाई हुई थी, उसे मुआवजे के तौर पर एक एकड़ जमीन प्रदान की गई थी। एक अन्य घटना में किसी मंदिर की अधिकृत अनुपजाऊ जमीन को 1952 में कर मुक्त कर दिया गया था, जिसके बाद मंदिर के संचालकों ने उसे उपजाने और सुधार के लिए ठेके पर दे दिया।

अभिलेखों में वर्णन
विजयनगर के पुराने अभिलेख से पता चलता है कि राज्य और किसी एक मंदिर के संचालकों ने उस जमीन को कर मुक्त कर दिया था, जिसकी मंदिर के तालाब से सिंचाई होती थी और जिसके लिए एक स्थानीय व्यापारी ने कोष दिया था। इस व्यापारी को इस जमीन से प्राप्त आय दो साल तक दी गई, जिसके बाद जमीन और तालाब, दोनों मंदिर को वापस मिल गए। इसका एक छोटा भाग दासवंडा अनुदान के तौर पर व्यापारी को दिया गया, क्योंकि उसने तालाब का निर्माण करवाया था।
1410 के मैसूर के अभिलेखों में गांवों के संगठनों और मंदिरों के बीच सिंचाई के साधनों के निर्माण में सहयोगी होने का उदाहरण मिलता है। गांव वालों ने एक नदी पर बांध बनाया, जिसे उन्होंने अपनी जमीनों पर खोदे गए जलमार्गों से मंदिर तक जोड़ा। ऐसा तय किया गया था कि दो-तिहाई पानी का इस्तेमाल मंदिर की अधिकृत जमीन पर किया जाएगा और शेष एक-तिहाई गांव की जमीन पर। इसके खर्च का अनुपात भी इसी तरह बांटा गया। सन‍् 1424 के एक अभिलेख के अनुसार, 1410 में गांव वालों की ओर से तैयार किया गया बांध टूट गया था। एक सैन्य अधिकारी की सहायता से इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। दक्षिण भारत में मंदिरों द्वारा सिंचाई के विकास में योगदान के ये कुछ उदाहरण हैं। उन्हें कभी राज्य के प्रशासकों से सहायता मिलती थी तो कभी लोगों से। विजयनगर राज्य के बाद सबसे ज्यादा जमीन पर मंदिरों का ही आधिपत्य था। सिंचाई के अलावा, मंदिरों के संचालक नई जमीन पर खेती कराने और उनसे प्राप्त आमदनी मंदिरों को चलाने में खर्च करते थे। इनका प्रयोग त्योहारों और देवताओं के चढ़ावे में सबसे अधिक किया जाता था।

चढ़ावे से कृषि विकास
नौंवी शताब्दी में बना तिरुपति मंदिर अनुयायियों के चढ़ावे के धन का कृषि के विकास में उपयोग करने का एक महत्वपूर्ण  उदाहरण है। मंदिर ने विजयनगर इलाके में छोटे सिंचाई साधनों को बढ़ावा दिया। सोलहवीं सदी तक लगभग 150 गांवों को इस नीति से सहायता मिली। इस व्यवस्था से कार्य करने का एक उदाहरण 1429 में राजा देवराय द्वितीय (1423-1446) द्वारा एक स्थानीय मंदिर को तीन करमुक्त गांव दान देने में मिलता है। इसमें एक ब्राह्मण गांव विक्रमादित्यमंगला भी शामिल था। इन गांवों की आय को त्योहारों में इस्तेमाल किया जाता था। हर साल मंदिर का कार्यालय (जिसे तिरुप्पनभण्डारम कहा जाता था) गांवों से प्राप्त होने वाली आय का एक हिस्सा मंदिरों में भेंट चढ़ाने के लिए अलग से बचाकर रखता था। कंडडायी रामानुज आयंगर नामक व्यक्ति ने अपने दान किए गए 6500 पणम (मुद्रा) में से 1300 पणम को विक्रमादित्यमंगला में सिंचाई मार्गों के निर्माण के लिए रखा। इस सिंचाई से प्राप्त आमदनी मंदिरों को मिलने वाली थी। इस तरह विक्रमादित्यमंगला गांव की स्थायी आमदनी बढ़ी और यह दो दानों से ही संभव हो सकी। मंदिरों के कोष से गांवों में सिंचाई के अलग-अलग स्रोतों का निर्माण किया जाता था। इससे इन गांवों से प्राप्त आमदनी में बढ़ोत्तरी होती थी, जिसे धार्मिक कार्यों में खर्च किया जाता था। इस व्यवस्था से कृषि संरचना पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा,
 क्योंकि गांवों की जमीन और सिंचाई के संसाधनों का प्रबंध खेतिहर मजदूर ही करते थे।

विजयनगर साम्राज्य
तिरुपति क्षेत्र में किसी एकाधिकारी के न होने के कारण विजयनगर साम्राज्य के शुरू के दिनों में मंदिर ने 1390 के आस-पास न्यासियों को स्वतंत्र संचालक संगठन बनाने में सफलता हासिल की, जिसे स्थानों के नाम से जाना जाता था। संगठन के पास बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां थीं। इसका स्थापित होना इस क्षेत्र के विकास के लिए पहला बड़ा कदम था। 15वीं शताब्दी के मध्य तक तिरुपति मंदिर वैष्णवों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। चूंकि इस समय तक तिरुपति में धार्मिक काम बढ़ गए थे, इसीलिए राज्य की ओर से दी गई जमीन और धन में भी बराबर बढ़ोत्तरी हुई। चढ़ावे और दान में प्राप्त धन का इस्तेमाल करीब सौ गांवों में सिंचाई के कार्यों के विकास में किया जाता था। सोलहवीं सदी में मंदिर को प्रदान किए गए गांवों में से करीब नब्बे प्रतिशत राज्य दान में मिले थे।

राज्य संरक्षण
मंदिर के महत्व को स्थापित करने में राज्य का संरक्षण बहुत जरूरी था, लेकिन मंदिर में धार्मिक कार्यों को चलाने के लिए उसके जमीन और धन सुरक्षित आमदनी के स्रोत बने रहें, इस बात का आश्वासन मंदिर द्वारा गांवों में सिंचाई की व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु खर्च किए गए धन से मिलता था। इससे छोटे न्यासी भी आश्वस्त रहते थे।  
 



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