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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

बीमार बच्चों की दुनिया में शीतल मुस्कान

अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे बीमार बच्चों की जिंदगी में खुशी और उम्मीद का रंग बिखेर रही क्लाउनसेलर्स की टीम

रूसी कवि-नाटककार ब्रेख्त ने जीवन के कई मर्मस्पर्शी चित्र अपने शब्दों में बयां किए हैं। वे पूरी दुनिया में पढ़े और सराहे भी जाते हैं। पर अपनी लेखन और संवेदना से जुड़ी उनकी एक बात बहुत दिलचस्प है। उन्होंने एक जगह लिखा है कि बीमार आदमी और विशेष रूप से रुग्ण बच्चे के बारे में बताना, उनकी शारीरिक-मानसिक स्थिति को शब्द देना किसी भी साहित्यकार के लिए बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि विश्व साहित्य में ऐसे पात्र बहुत कम हैं। दरअसल, ब्रेख्त जो बात कह रहे हैं, वह समझी जा सकती है। विशेष रूप से जब कोई बच्चा बीमार होकर घर से अस्पताल भर्ती होता है तो उसके लिए तो पूरी दुनिया ही बदल जाती है। उसके साथ के लोगों के लिए भी यह एक मर्मांतक अनुभव होता है। आज के दौर में एक तरफ तो अस्पतालों को पांच सितारा होटलों जैसा बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बीमारियों और बीमारों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। निजी अस्पतालों में इलाज और सुविधाएं तो अच्छी हैं, पर वे खासी महंगी भी हैं। देश की बड़ी जनसंख्या आज भी सरकारी अस्पतालों के भरोसे है। सरकारी अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक ने लगातार प्रयास किए हैं, पर कई क्षेत्रों में स्थिति आज भी अच्छी नहीं है। ऐसे में कुछ लोग और संस्थाएं अपनी तरफ से पहल करके अस्पतालों में पहुंचने वाले बच्चों की दुनिया में भरोसा और खुशी बढ़ाने के प्रयास में लगी हैं। ऐसी ही एक रोचक पहल में जुटी है ‘क्लाउनसेलर्स टीम’। इस टीम का प्रयास है अस्पतालों में पहुंच कर बच्चों की उदास दुनिया में खुशी भरना। 

यह प्रयास कितना अनिवार्य है, इसका अनुमान किसी भी आम अस्पताल का नजारा देखकर लगाया जा सकता है। ऐसा ही एक अस्पताल है दिल्ली की गीता कॉलोनी में अवस्थित चाचा नेहरु बाल चिकित्सालय। यहां लोगों की आंखों में नींद नहीं है। रात-रातभर का जागना है। मिन्नतें हैं। गिड़गिड़ाना है। ढांढस है। आंचल की आड़ में रोना है। यहां मूक-ब​धिर होकर उम्मीदों में बाट जोह रही आंखें हैं। जो कभी पिता, तो कभी मां बन जा रही हैं। सूजी हुई आंखों में जमकर पत्थर हो गई पुतलियां हैं। यहां कुछ भी ठीक नहीं है, पर सब ठीक हो जाने की आस आवश्यक है। उजले कपड़ों में टहलते फरिश्ते हैं। जो जाने-अनजाने कई बार अपना ओहदा भूल जा रहे हैं। यहां होने के नाम पर सिर्फ लंबी कतारें हैं। अपनी बारी की प्रतीक्षा है। सैकड़ों ऑक्सीजन के सिलेंडर हैं। जिंदगी के लिए लड़ाई कर रही नन्हीं सांसें हैं। कहीं निमोनिया, कहीं टायफाइड, तो कहीं बीमारी और उदासी का दूसरा और कोई नाम है। यहां दूर-दूर तक हंसी नहीं है, पर इंतजार है हर मां-बाप को, अपने बच्चों के हंसने का। पर बीमार बच्चों की इस दुनिया में दुख और अफसोस के रंग के साथ एक रंग उम्मीद का भी है। यह रंग इन बच्चों की जिंदगी में घोलने का काम कर रही है क्लाउनसेलर्स टीम। 

सामान्य नाक-नक्श की साधारण-सी लड़की  शीतल अग्रवाल इसी दल की सदस्य है। अस्पताल के बच्चों और डॉक्टरों के लिए शीतल लाॅफ्टर गर्ल (क्लाउन गर्ल) है। शीतल को अपना यह परिचय अच्छा लगता है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. और दिल्ली विश्वविद्यालय से एंथ्रोपॉलोजी में एम.फिल. करने के बाद कुछ विश्वविद्यालयों में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में काम कर चुकीं शीतल हर शनिवार तय समय पर अस्पताल पहुंचकर रोते और उदास चेहरों पर हंसी लाने में जुट जाती हैं। दिनभर सभी वार्ड में पहुंचकर वह हंसी परोसती और हंसी समेटकर बाहर आ जाती हैं।अपने अनुभव के बारे में शीतल बताती हैं, ‘मैं इन बच्चों के लिए हमेशा से क्लाउनिंग करना चाहती थी। इनके चेहरों पर हंसी देखना चाहती थी। यह ऐसी जगह है, जहां हंसी बड़ी मुश्किल से आपको ढूंढने पर मिलेगी, इसीलिए मैंने काम करने के लिए सरकारी बाल चिकित्सालय का चुनाव किया। आज यह करते महीनों बीत चुके हैं। बहुत से नए साथी भी जुड़ रहे हैं। पूरा अस्पताल खुश है। क्लाउनिंग के बाद बच्चों के हालात में तेजी से सुधार देखने के बाद डॉक्टर भी अब उनकी मदद कर रहे हैं। अब हम दूसरे अस्पतालों तक पहुंचना चाह रहे हैं।’

शीतल ने जो प्रयास पहले अपने बूते किया, वह आज एक सामूहिक इरादा और जज्बा बन चुका है। शीतल के साथ आज दस-पंद्रह लोगों की एक छोटी-सी टीम है। यह टीम ‘क्लाउनसेलर्स’ के नाम से आपको सोशल मीडिया पर मिल जाएगी। हर शनिवार इच्छुक युवा अपने-अपने काम और छुट्टियों से वक्त निकालकर हंसी कमाने के लिए शीतल के साथ हो लेते हैं। सुबह नौ बजे अस्पताल के सभाकक्ष में मिलने के बाद का एक घंटा बैलून फुलाने और चेहरे को कलर करने से लेकर नए लोगों को कुछ सुझाव देने में चला जाता है। फिर इनकी टीम अलग-अलग हिस्सों में बंटकर बारी-बारी से सभी वार्डों में घूमकर अपनी क्लाउनिंग से उदास चेहरों को हंसी में तब्दील करने में जुट जाती हैं। अपनी इस कोशिश में कभी-कभी इन्हें उदासी भी मिलती है, जब वे लाख जतन करने के बावजूद कुछ चेहरों पर हंसी नहीं ला पाते।

क्लाउनसेलर्स के साथ जुड़ी ऋषिका ऐसा ही एक अनुभव साझा करती है। उसके शब्दों में, ‘एक बार हम लाख कोशिशों के बावजूद एक बच्चे को हंसा नहीं पा रहे थे, तभी अचानक से मेरा क्लाउन नोज मेरे नाक से निकलकर नीचे गिर गया। इतना देखते ही वह बच्चा खिलखिलाकर हंसने लगा। यह देखकर सारे नर्स और डॉक्टर बहुत खुश थे। बच्चे की मां खुशी से रोने लगी। मैं आज भी उस दिन को याद करती हूं तो धन्य हो जाती हूं। यह ऐसा सौदा है, जिसमें आप अपनी हंसी के बदले हजारों हंसी अपने साथ ले जाते हैं। यह दिन बहुत खूबसूरत होता है मेरे लिए।’

क्लाउनसेलर्स टीम के सदस्यों के प्रयास कितने सार्थक और अहम हैं, इसकी गवाही वे बच्चे तो देते ही हैं, जिनके उदास जीवन में इनके प्रयास से खुशी के कुछ पल आते हैं, वे मां-बाप भी इनकी कोशिशों के शुक्रगुजार हैं, जो अपने बच्चों के उदास चेहरे लगातार देख-देखकर निराश हो जाते थे, टूट जाते थे। नौ साल की सुहानी की अम्मी तो यहां तक कहती हैं, ‘जब मैं अपनी बच्ची को इन लोगों के साथ खेलते देखती हूं तो मैं भूल जाती हूं कि मेरी बच्ची का हाथ नहीं उठता है। मुझे लगता ही नहीं कि मेरी बच्ची बीमार है। अब तो हर शनिवार यहां के बच्चों को इनकी प्रतीक्षा रहने लगी है। अल्लाह इन नेक काम करने वालों को लंबी आयु।’ क्लाउनसेलर्स के सदस्य अभी सिर्फ चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय तक ही पहुंच पाए हैं, पर उनके हौसले और इरादे देखकर लगता है कि अगले कुछ सालों में कम से कम दिल्ली और इसके आसपास के कई इलाकों के बच्चों के अस्पतालों में खुशियां बांटने पहुंचेगे। जिस तरह की सराहना क्लाउनसेलर्स को मिल रही है, उससे यह भी संभव है कि इस तर्ज पर कुछ और समूह सामने आएं।  



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