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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

ऐसे थे क्रांतिधर्मी ‘पंडित जी’

क्रांतिधर्मी चंद्रशेखर आजाद न सिर्फ तब, बल्कि आज भी तरुण भारत के सबसे बड़े रोल मॉडल हैं

भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सबसे चमकती इबारत निस्संदेह उन क्रांतिवीरों ने लिखी, जिन्होंने अपनी कुर्बानी से देश में जहां एक तरफ देशभक्ति के जज्बे को बढ़ाया, वहीं सबको फिरंगी हुकूमत से भिड़ने की निर्भीक प्रेरणा दी। आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की तरुणाई अपने उद्यम और क्षमता से कई क्षेत्रों में भारतीय मेधा का लोहा मनवा रही है। पर यहां गौर करना जरूरी है कि आज जिस आजाद भारत में हम सांस ले रहे हैं और कई तरह की सहूलियतें हासिल कर पा रहे हैं, उसके पीछे संघर्ष का एक लंबा इतिहास है।  इतिहास के ये पन्ने किताबों में तो हैं ही, इन्हें सदा हमारी स्मृतियों में भी होना चाहिए। वैसे भी भारत का स्वतंत्रता संग्राम कई मायनों में विलक्षण है। पहली विलक्षणता तो यही कि देश में पहले सांस्कृतिक नवजागरण का अखल जगा, फिर स्वराज की मांग उठी। महात्मा गांधी के आगमन से पहले देश में लाल-बाल-पाल स्वराज की ललकार को इतना ऊंचा उठा चुके थे कि भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने का भरोसा अंग्रेज हुक्मरान भी खो चुके थे। सबसे बड़ी विलक्षणता तो यह रही कि जिस भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के न सिर्फ शुरुआती, बल्कि इसके आगे के कई पन्ने बलिदानी लहू से लिखे गए। भारतीय स्वाधीनता संग्राम की यह दो अलग-अलग झांकियां नहीं, बल्कि एक विकास यात्रा है, जिसे एक साथ देखते हुए हम राष्ट्र, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रवाद के भारतीय साझे को 

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं। खासतौर पर ऐसे समय में जब सूचना क्रांति की तेजी ने मर्म और संवेदना के कई धरातल अनजाने ही हमसे छीन लिए हैं। यह देखना, जानना और समझना बहुत जरूरी है कि एक दौर में देश के वीर सपूतों ने किस तरह का जोश और जज्बा दिखाते हुए देश और समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। 

यशपाल ने एक अद्भुत पुस्तक लिखी है, नाम है- ‘फांसी के फंदे तक’। इसमें क्रांतिकारियों के जीवन से जुड़े कई रोचक प्रसंग और संस्मरण हैं। 23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की जयंती है। हमारे लिए यह मौका है खासतौर पर उन नौजवानों की जिंदगी में झांकने और उनके जीवन प्रसंगों से सीखने का, जिनका नाम लेते आज भी हमारे मन में राष्ट्र प्रेम का बलिदानी रोमांच अंगड़ाई लेने लगता है। आजाद अपने करीबियों के बीच ‘पंडित जी’ के रूप में प्रसिद्ध थे। पंडित जी की देशभक्ति के कई किस्से मशहूर हैं। उनके सामने एक ही लक्ष्य था, भारत की आजादी। इस लक्ष्य के सामने बाकी सारे मुद्दे गौण थे। मुल्क की आजादी के लिए उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की थी और शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव एवं बटुकेश्वर दत्त आदि इसके सदस्य बने। 

एक बार की बात है जब भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त इलाहाबाद में प्रवास कर रहे थे, तभी एक दिन सुखदेव कहीं से एक कैलेंडर ले आए जिस पर शायद किसी सिने तारिका की मनमोहक तस्वीर छपी थी। सुखदेव को कैलेंडर अच्छा लगा। उन्होंने उसे कमरे की दीवार पर टांग दिया और बाहर चले गए। उनके जाने के बाद पंडित जी वहां पहुंचे। ऐसे कैलेंडर को देखकर उनकी भृकुटी तन गई। उनके गुस्से को देखकर वहां मौजूद अन्य साथी डर गए। सभी पंडित जी का मिजाज जानते थे। पंडित जी ने किसी से कुछ नहीं कहा, पर कैलेंडर को फाड़कर फेंक दिया। कुछ समय बाद सुखदेव वापस आ गए। दीवार पर कैलेंडर न देख वे इधर-उधर देखने लगे। थोड़ी ही देर बाद उन्हें उसके अवशेष दिखाई दिए तो वे क्रोधित हो गए। वे भी गर्म मिजाज के थे। उन्होंने गुस्से में कहा कि किसने उनके लाए कैलेंडर की यह दशा की है? पंडित जी ने शांत स्वर में उनसे कहा, ‘हमने किया है?’ सुखदेव थोड़ा कसमसाए, परंतु पंडित जी के सामने क्या बोलते। सो धीरे से बोले कि अच्छी तस्वीर थी। पंडित जी ने कहा, ‘यहां ऐसी तस्वीरों का क्या काम।’ उन्होंने सुखदेव को समझा दिया कि ऐसे किसी भी आकर्षण से लोगों का ध्यान ध्येय से भटक सकता है।

पंडित जी के जीवन से जुड़ी ऐसी ही एक और घटना बीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत की है। अंग्रेजों का दमन चक्र तेजी से चल रहा था और जनता में खासा रोष था। एक दिन महिलाएं इलाहाबाद में जुलूस निकाल रही थीं और सामने पड़ जाने वाले किसी भी पुरुष पर यह कहते हुए खासी लानत भेज रही थीं कि वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आजाद अपने किसी साथी के साथ वहां से गुजर रहे थे। महिलाओं ने उन्हें घेर लिया और एक महिला ने गरजते हुए उन पर शब्दों से आक्रमण कर दिया, ‘आप लोगों से कुछ होने वाला नहीं है, आप सब मर्दों को चूड़ी पहन कर घर बैठ जाना चाहिए।’ एक दो महिलाओं ने आगे बढ़कर आजाद के हाथ पकड़ लिए और कहने लगीं कि इन्हें चूड़ियां पहनाओ। जाहिर था कि उन्होंने पंडित जी को पहचाना नहीं था। आजाद मुस्कुराए और उन्होंने अपनी कलाइयां बढ़ाते हुए कहा कि लो बहन पहना लो चूड़ियां। कद्दावर शरीर के मालिक आजाद के हृष्ट-पुष्ट हाथों के चौड़े गट्टों में भला कौन सी चूड़ी चढ़ सकती थी? नतीजतन, कुछ देर में महिलाएं शर्मिंदा हो गईं। 

जिन लोगों को पंडित जी के बारे में थोड़ी भी जानकारी है, वे यह जानते हैं कि पंडित जी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए आत्मरक्षा के प्रति कितना तत्पर और सचेत रहते थे। देश के इस अमर बलिदानी ने अपने जीवन की अंतिम सांस तक इस सचेत तत्परता को बनाए रखा और फिरंगी पुलिस से घिर जाने के बावजूद वे उनकी नहीं, अपनी गोली से शहीद हुए। उनकी इस प्रवृत्ति से जुड़ी एक दिलचस्प घटना भी है। 

पंडित जी चाकू चलाने में माहिर एक उस्ताद से चाकू चलाना सीखा करते थे। उस्ताद जी पंडित जी को छत पर चाकू चलाना सिखाते थे। पास ही स्थित एक दूसरे घर की छत से, जो इस घर की छत से थोड़ा ऊंची थी, रोज एक युवती और उसका छोटा भाई इस ट्रेनिंग को देखा करते थे। दोनों नियत समय पर छत पर आकर बैठ जाते और आजाद को देखते थे। एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि सीखते हुए आजाद का ध्यान थोड़ा हट गया और उस्ताद जी का चाकू उनके शरीर को छीलता हुआ निकल गया। उस्ताद जी और उनके शागिर्द पंडित जी के घाव को देख रहे थे कि उस दूसरी छत से बहुत सारी चीजें वहां बरसनी शुरू हो गईं। जो भी उसके हाथों में आ रहा था, युवती उसे निशाना साध कर उस्ताद जी के ऊपर फेंक रही थी और उसका छोटा भाई भी उसकी सहायता कर रहा था। उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुए पंडित जी से कहा, ‘लगता है लड़की का दिल लग गया है तुमसे।’ इस पर पंडित जी मुस्कुराए भर, लेकिन साथ में यह भी साफ हो गया कि उनकी जिंदगी की मंजिल देश की स्वाधीनता भर है। बाकी चीजें उनके लिए महत्वहीन हैं। एक युवा के लिए इस तरह के गुण, शील और स्वभाव का होना, कितनी बड़ी बात है। इसे आज के खुलेपन के दौर में हम ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। 

बताना यह भी जरूरी है कि सिद्धांतप्रिय आजाद आजीवन स्त्रियों के प्रति अगाध आदर रखने वाले व्यक्ति रहे। साफ है कि क्रांतिधर्मी पंडित जी देश के स्वराज के लिए एक ऐसे व्रती बने, जिनके शील, गुण धर्म सब प्रेरक संस्कारों से भरे थे। वे सही मायनों में न सिर्फ तब, बल्कि आज भी तरुण भारत के सबसे बड़े रोल मॉडल हैं।  



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