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सोमवार, 21 जनवरी 2019

शुद्ध और किफायती सुलभ जल

पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक युक्त और बैक्टिरिया दूषित जल की समस्या के निदान और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सुलभ इंटरनेशनल ने कोलकाता में एक सरल, सस्ता और स्वास्थ्यवर्धक समाधान प्रस्तुत किया

लगातार बढ़ते प्रदूषण का असर जलवायु परिवर्तन पर साफ दिखता है। अंधाधुंध विकास और औद्योगिकीकरण की दौड़ ने हमारे जीवन के लिए अति आवश्यक कई मूलभूत चीजों को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया है। आने वाले वक्त में सबसे बड़ी समस्या पेयजल की भारी किल्लत के साथ ही, उपलब्ध जल के लगातार दूषित होने की होगी। लेकिन हमेशा की तरह समस्या गिनाने के बजाय उसका समाधान प्रस्तुत करते हुए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक संगोष्ठी का आयोजन कर बंगाल की ग्रामीण आबादी के साथ देश में अन्य जगहों पर भूजल के आर्सेनिक प्रदूषण और सतह के पानी के जीवाणु दूषित होने के कारण होने वाली गंभीर बीमारियों को रोकने के लिए एक विकेंद्रीकृत नजरिया सामने रखा।
सुलभ ने कंबोडिया और मेडागास्कर में काम करने वाले फ्रांसीसी एनजीओ (1001 फॉन्टेंस) से प्रेरणा लेते हुए पश्चिम बंगाल के आर्सेनिक के खतरे से जूझ रहे कुछ गांवों में अपनी परियोजनाओं को लागू करने का फैसला किया। भूजल और सतह के जल के संरक्षण और शुद्ध ‘सुलभ जल’ उपलब्ध कराने को लेकर आयोजित इस संगोष्ठी में सुलभ के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक ने एक वृहद नजरिया प्रस्तुत करते हुए आर्सेनिक के खतरे के साथ-साथ उसका व्यावहारिक समाधान भी दिया।
संगोष्ठी आयोजित करने के उद्देश्य के बारे में बताते हुए डॉ. पाठक ने कहा कि सरकार 2019 के अंत तक देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लक्ष्य को लेकर चल रही है, लेकिन इसका तब तक कोई फायदा नहीं होगा जब तक लोगों को शुद्ध पीने का पानी उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि शुद्ध पेयजल के साथ-साथ हाईजीन और स्वच्छता में सुधार के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, इसके बिना ‘डब्ल्यूएएसएच (वाश)’ परियोजनाओं का व्यापक और बेहतर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इसी संदर्भ में डॉ. पाठक ने पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त दूषित भूजल के प्रदूषण का मुद्दा उठाया, साथ ही बताया कि सरकारी प्रयासों के बावजूद बड़ी संख्या में गांवों के लोगों तक आर्सेनिक मुक्त शुद्ध पानी नहीं पहुंच पा रहा है। इसीलिए सुलभ ने कुछ पायलट परियोजनाएं शुरू की हैं जो ऐसे गांवों तक पहुंचेगी जहां आर्सेनिक, फ्लोराइड और बैक्टीरिया युक्त भूजल और सतह का पानी लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। डॉ. पाठक ने बताया, ‘बुनियादी विचार यही है कि ग्रामीणों को उद्यमशीलता और प्रौद्योगिकी अनुकूलन से सशक्त बनाना है, ताकि वे पारंपरिक सतह के पानी के स्रोतों से एकत्रित पानी की गुणवत्ता को बेहतर और शुद्ध बनाकर ग्रामीण जनसंख्या तक पहुंचा सकें।’
वर्तमान में पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा और गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन के कई अन्य राज्यों में तालाबों, नदियों, झीलों, मौसमी पानी और कुओं जैसे कई बारहमासी सतह जल का स्रोत है। यदि एक बार ठीक से इसका संग्रहण और उपचार हो जाए तो ग्रामीण इलाकों में परंपरागत सतह के जल स्रोतों के संरक्षण और उपयोग के लिए यह एक लंबा रास्ता तय करेगा।

सुलभ जल और इसका स्थायित्व
सुलभ को सुरक्षित जल उपलब्ध कराने के उसके अभियान में जो एक बड़ी ताकत मिली है, वह मधुसूदनकाती (उत्तर 24 परगना), मिदनापुर और हरिदासपुर (बनगाव) में शुरू हुए ‘सुलभ जल’ मॉडल की तकनीकी और वित्तीय व्यावहारिकता और लंबे समय तक इसकी स्थिरता के सफल प्रदर्शन की कहानी में बयां हो चुकी है। इससे भी बढ़कर, इन गांवों में सुलभ की पायलट परियोजना की सफलता से प्रोत्साहित कई संगठन सुलभ की सहायक संस्था सुलभ इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एनवायरनमेंटल सैनिटेशन एंड पब्लिक हेल्थ (एसआईएईएस और पीएच) की तकनीकी सहायता के साथ अपने गांवों में समान कार्यक्रम चला रहे हैं।
डॉ. पाठक ने उम्मीद व्यक्त करते हुए कहा, ‘ऐसा लगता है कि अभिनव दृष्टिकोण ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक जल आपूर्ति प्रणालियों में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा। वास्तव में, यह बड़ी सामाजिक क्रांति से कुछ कम नहीं होगा अगर ग्रामीण स्वयं सुरक्षित और शुद्ध पानी का उत्पादन और आपूर्ति ग्रामीण समुदाय को 1 रुपया प्रति लीटर से भी कम की कीमत पर शुरू कर देते हैं।’
लेकिन सुरक्षित पेयजल की इतनी सख्त जरूरत क्यों है? इस पर डॉ. पाठक ने एक अद्भुत उत्तर दिया, ‘आकाश, धरती, जल, वायु और अग्नि - ये पांच तत्व हमारे शरीर और स्वास्थ्य का निर्माण करते हैं। यदि पानी जैसा एक महत्वपूर्ण तत्व इनमें से दूषित हो जाए, तो जिंदगी जीने का उत्साह समाप्त हो जाता है। हम अक्सर बात करते हैं और पृथ्वी के विनाश से डरते हैं। पृथ्वी जब नष्ट होगी तब या तो पूरी तरह पानी से भरी होगी या बिना पानी के होगी।’ डॉ. पाठक के इस कथन पर लोगों ने तालियां बजाकर सहमति व्यक्त की।
घाना, बांग्लादेश और वियतनाम में सुलभ की तकनीक पहले ही लागू हो चुकी है। समान रूप से एक और दिलचस्प बात श्रोताओं के साथ साझा करते हुए डॉ. पाठक ने बताया कि हाल की उनकी संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा के दौरान लोगों ने उनसे 'सुलभ जल' के बारे में पूछताछ की। उन्होंने कहा कि मुझे बताया गया था कि अमेरिका के सभी शहरों में सुरक्षित पेयजल है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका के कई ग्रामीण क्षेत्रों में तस्वीर अभी भी बहुत अलग है और वहां हमारे संयंत्र को स्थापित करने के लिए हमसे संपर्क किया गया है। यह हमारे लिए एक बड़ी सफलता है।

डॉ. पाठक ने एक चमत्कार किया है: प्रो. के.जे. नाथ
इस अवसर पर डॉ. पाठक को 'एक जादूगर, एक दूरदर्शी' बताते हुए, पश्चिम बंगाल सरकार के आर्सेनिक टास्क फोर्स के अध्यक्ष और सुलभ के विज्ञान और प्रौद्योगिकी कमेटी के अध्यक्ष प्रोफेसर के.जे. नाथ ने कहा कि डॉ. पाठक एक ऐसे व्यक्ति हैं जो न केवल हमेशा व्यावहारिक रूप अपनाते हैं, बल्कि अपने सभी विचारों को बेहतर कार्यान्वयन के स्तर तक लेकर जाते हैं। सुलभ विचार मंच ने न केवल नवीनतम तकनीक प्रदान की है, साथ ही समान रूप से कौशल विकास क्षमता को भी काफी हद तक सुनिश्चित किया है। प्रोफेसर नाथ ने मधुसूदनकाती, हिंगलेगंज और मुर्शिदाबाद के सफल संयंत्र उदाहरणों के अलावा कुछ अन्य स्थानों का भी हवाला दिया जहां ग्रामीण लोगों द्वारा जल उपचार संयंत्र चलाए जा रहे हैं और इससे आर्सेनिक प्रभावित गांवों को बहुत अधिक राहत मिली है। उन्होंने कहा, ‘यह एक तरह की क्रांति है। हमने संयंत्रों को डिजाइन किया है, लेकिन हम गांवों में उपलब्ध संसाधनों के बारे में भूल गए हैं। दूसरा, हमने कभी तालाबों को कोई महत्व नहीं दिया। डॉ. पाठक ने स्वच्छता के मोर्चे और आर्सेनिक उन्मूलन को लेकर एक तरह का चमत्कार किया है। 
स्वच्छता के साथ-साथ हमने यह महसूस किया है कि समुदायों को सुरक्षित पानी भी प्रदान किया जाना चाहिए ताकि लोगों के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यापक सकारात्मक असर पड़े। यह कई अध्ययनों में कहा गया है कि सामुदायिक स्वास्थ्य पर व्यापक और स्थाई प्रभाव के लिए स्वच्छता और सुरक्षित पानी पर एक एकीकृत दृष्टिकोण होना अत्यंत आवश्यक है। 
उन्होंने कहा कि अभी भी बड़ी संख्या में गांव आर्सेनिक युक्त पानी के खतरे से जूझ रहे हैं और यह कहना गलत होगा कि राज्य सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए काम नहीं कर रही है। लेकिन जब तक इस कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी नहीं होगी और शुद्ध और सुरक्षित पेयजल के विकास के लिए स्थाई क्षमता स्थापित नहीं की जाती, तब तक मनमाफिक परिणाम नहीं मिलेंगे। पश्चिम बंगाल सरकार एक मास्टर प्लान बना रही है जिसके अंतर्गत सभी गांवों को सुरक्षित पीने का पानी पाइप के माध्यम से देने की कल्पना की गई है। प्रोफेसर नाथ ने बताया कि 2025 तक विश्व की दो तिहाई आबादी यानी 1800 मिलियन लोग जल संकट की चपेट में होंगे।
आर्सेनिक खतरे के बारे में जागरूकता बढ़ाने का समय: सुब्रत मुखर्जी, पीएचई मंत्री
इस मौके पर पश्चिम बंगाल सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य और इंजीनियरिंग मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में 83 से अधिक ब्लॉक आर्सेनिक से संक्रमित हैं और यह प्रसार बेहद खतरनाक है। नवीनतम शोध के अनुसार, फसलों, फलों, सब्जियों और यहां तक कि इन क्षेत्रों में रहने वाली मांओं के स्तनों के दूध में भी आर्सेनिक का प्रदूषण शामिल है, जो वास्तव में बहुत खतरनाक है।
अब अन्य जिलों के अलावा कोलकाता शहर के आसपास भी आर्सेनिक का खतरा बढ़ रहा है। यह खतरा दक्षिण कोलकाता में जादवपुर के करीब भी खूब है। सुब्रत मुखर्जी ने कहा, ‘मैंने व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों को जादवपुर के एक विशिष्ट क्षेत्र में परीक्षण करने के लिए नियुक्त किया है जहां पानी में आर्सेनिक का उच्च स्तर मिला है। मंत्री ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि दुर्भाग्यवश, हम अभी भी स्थिति की गंभीरता के बारे में सचेत नहीं हैं और न ही प्रभावित लोगों या इस खतरे के बिलकुल करीब चल रहे लोगों से सही संवाद स्थापित करने के लिए कोई प्रभावी सामाजिक जागरूकता अभियान है।
सुब्रत मुखर्जी ने हास्यास्पद रूप से पानी की महत्ता को कम कर के बताने वाले विज्ञापनों के बारे में उदाहरण देकर बताया कि किसी वस्तु की बहुत सस्ती कीमत बताने के लिए हम अक्सर कहते हैं या विज्ञापन में दावा करते हैं - जलेर डोर (जिसका अर्थ है कि यह पानी के रूप में सस्ता है) – और इस तरह हम पानी के मूल्य और महत्व को कम कर देते हैं।
मंत्री ने आगे कहा, ‘कुछ उन्नत देशों ने दावा किया है कि उन्होंने परमाणु बम के प्रारूप में सुधार किया है या कुछ देश मंगल ग्रह पर यान भेजने का भी प्रचार करते हैं। लेकिन अभी भी इस बात पर संदेह है कि ये सभी देश पानी के गुणात्मक मानक को बढ़ाने में कितने सफल रहे हैं।’ मंत्री के अनुसार, पानी का उचित मूल्यांकन और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता और वितरण सुनिश्चित करना अभी भी कई देशों के लिए दूर की कौड़ी है। इस पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि अब अनावश्यक विचारों के लिए समय बर्बाद करने का वक्त नहीं है। यदि हमें मानवता को इस खतरे से बचाना है, तो यही समय है कि हम आर्सेनिक के खतरे के बारे में जागरूकता फैलाने की शपथ लें। तभी जीने की इच्छा उत्साह के साथ वापस आएगी।

सुलभ की पहल को दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाएं: सोवनदेब चटर्जी, मंत्री, बंगाल सरकार
इस महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान देते हुए पश्चिम बंगाल सरकार में बिजली और गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के मंत्री सोवनदेब चटर्जी ने देशभर में सैकड़ों और हजारों गांवों को सुरक्षित पेयजल प्रदान करने के सुलभ और डॉ. पाठक के प्रयासों की सराहना की। उनके अनुसार, यह सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है, लेकिन कोई भी सरकार अकेले ऐसा नहीं कर सकती है। उन्होंने विशेष रूप से सुलभ द्वारा वितरित की जाने वाली बेहद सस्ती पानी की बोतलों की कीमत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मुझे संदेह है कि कोई अन्य संगठन या सरकार इतनी सस्ती कीमत पर पानी मुहैया करा सकती है। मैं इसकी लागत में नहीं जाना चाहता।
इस मौके पर यूनिसेफ के साथ लंबे समय तक काम करने वाले और डब्ल्यूएसएससीसी जिनेवा के पूर्व कार्यकारी निदेशक गौरी शंकर घोष ने सुलभ के प्रयासों की सराहना करते हुए तालाब के पानी को अपने प्रमुख स्रोतों में इस्तेमाल करने के लिए सुलभ की पहल को बेहतरीन बताया। वह पश्चिम मिदनापुर जिले के मधुसूदनकाती के एक अनुभव का जिक्र कर रहे थे जहां लगभग पांच बीघा जमीन के एक टुकड़े को पानी के बड़े स्रोत में बदला जा रहा था। सुलभ द्वारा विकसित, वित्त पोषित और चलने वाले एक नए जल उपचार संयंत्र के लिए इस टुकड़े को तालाब में बदलकर पानी का प्रमुख स्रोत बनाया जा रहा था।
वर्षा जल के संग्रहण की आवश्यकता पर बल देते हुए घोष ने कहा कि यह एक अनूठी पहल है। राज्यों और केंद्र सरकारों दोनों को ग्रामीणों को बड़े स्तर पर राहत दिलाने के लिए देश के दूरदराज के इलाकों में पहुंच बनाने के लिए सुलभ की मदद करनी चाहिए और साथ मिलकर काम करना चाहिए।

बिहार में स्थिति
बिहार सरकार के महावीर कैंसर अस्पताल में रिसर्च विभाग के प्रो. और एचओडी डॉ. ए के घोष के अनुसार, आर्सेनिक के निशान जो एक समय मुख्य रूप से सिर्फ देश के पूर्वी हिस्से में मौजूद थे, अब पंजाब, बंगाल और बिहार सहित देश के दक्षिणी राज्यों में भी अपनी उपस्थिति तेजी से दर्ज करा रहे हैं। बिहार की स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 38 जिलों में से 18 जिले इस घातक खतरे से पीड़ित हैं। डॉ. घोष ने खेद व्यक्त किया कि उचित मानवीय हस्तक्षेप की कमी के कारण इस खतरे से निपटने की अधिकांश रणनीतियां अब तक विफल ही रही हैं।
स्थिति की गंभीरता को बताते हुए डॉ. घोष ने कहा कि बिहार में आर्सेनिक से पित्ताशय के कैंसर की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और पटना के महावीर कैंसर अस्पताल में भर्ती होने वाले बड़ी संख्या में मरीजों ने आर्सेनिकोसिस के लक्षण दिखाए हैं और उनमें से भी अधिकतर महिलाएं हैं। बिहार में सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिलों में से एक बक्सर है, जहां आर्सेनिक प्रदूषण प्रति लीटर 1906 माइक्रोग्राम जितना अधिक पाया गया है। यह अनुमानित सीमा से कई गुना अधिक है। बक्सर के बाद भागलपुर और पटना का स्थान है। यह देखा गया है कि गंगा बेसिन का दक्षिणी किनारा आर्सेनिक से सबसे बुरी तरह से प्रभावित है और वहां यह तेजी से फैल रहा है।
सेंटर फॉर ग्राउंड वॉटर स्टडीज के चेयरमैन डॉ. एसपी सिन्हा रॉय ने हर समय, खासकर सूखे मौसम के दौरान, तालाब के पानी के दोहन को लेकर सावधानी बरतने पर ध्यान देने को कहा क्योंकि उस अवधि के दौरान शरीर के अंदर रेत के जाने का खतरा पैदा हो जाता है। दूसरी बात जिन इलाकों में लौह सघनता का उच्च स्तर दिखाई देता है वह इलाका आर्सेनिक प्रदूषण के लिए अधिक कारक होता है।
इसके अलावा डॉ. चंद्रेयी घोष, हिजली इंस्पिरेशन, डॉ. डीएन गुहा मजूमदार, निदेशक, डीएनजीएम रिसर्च फाउंडेशन, सुलभ की वरिष्ठ उपाध्यक्ष आभा कुमार, जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंटल स्टडीज के निदेशक डॉ. तारित रॉय चौधरी जैसे अन्य गणमान्य अथितियों ने भी संगोष्ठी में अपनी बातें रखीं। 



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