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शुक्रवार, 22 मार्च 2019

सिर्फ 10,000 समर्पित लोग चाहिए, गंगा बचाओ अभियान सफल हो जाएगा: डॉ. विन्देश्वर पाठक

यह न केवल स्वच्छता सुनिश्चित करेगा बल्कि लोगों को रोजगार भी प्रदान करेगा और प्रक्रिया को पारदर्शी भी बनाएगा। यह एक 'सुलभ समाधान’ है

सुलभ स्वच्छता और सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक के पास एक ऐसा क्रांतिकारी विचार है, जिससे गंगा को पहले से भी बेहतर और निर्मल बनाने के साथ उसे जीवंतता प्रदान की जा सकती है। गंगा आगे बढ़ती है, गंगा कल-कल बहती है। गंगा सबको भगवान के चरणों तक ले जाती है। गंगा जीवन रेखा है। वह गंगा है। गंगा बचाइए, वह हमें बचाएगी।  
गंगा का महत्व और भारतीय सभ्यता के विकास का पालन-पोषण और उसकी सहायता गंगा ने कैसे की है, यह कोई छिपी कहानी नहीं है। इसीलिए कई विचारों, अवधारणाओं और परियोजनाओं को वर्षों से इस पवित्र नदी को स्वच्छ करने और इसके सौंदर्य तथा इसकी निर्मलता को प्रदूषण से बचाने के लिए लागू किया जा रहा है। 
1905 से 2018 तक हमने कई महत्वाकांक्षी प्रयास देखे हैं, जैसे 1905 में गंगा महासभा की शुरुआत, 1985 में गंगा कार्ययोजना का शुभारंभ, 2009 में नेशनल रीवर गंगा बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) की स्थापना, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई उद्योगों को बंद करना, 2014 में एकीकृत गंगा विकास परियोजना 'नमामि गंगे' की शुरुआत, 2016 में स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन की स्थापना आदि। प्रयास बहुत सारे हुए हैं, लेकिन स्थिति अभी भी कठिन बनी हुई है और एक परिदृश्य बदलने वाली योजना की अभी भी प्रतीक्षा की जा रही है। एक ऐसा विचार जो लागू करने में आसान हो और बहुत असरदार हो, साथ ही परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दे।
सुलभ स्वच्छता और सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक, नवाचारों के व्यक्तित्व हैं - उदाहरण के लिए दो गड्ढे वाले शौचालयों के बारे में उनका विचार ही देख लें, जो न केवल खुले में शौच से मुक्ति में सहायक है, बल्कि हाथों से मैला ढोने की कुप्रथा को भी खत्म करता है। एक ऐसा ही अभिनव विचार डॉ. पाठक के पास है, जो स्वच्छ बहती हुई गंगा को प्राप्त करने के लिए मंत्र की तरह है। यह पवित्र नदी को फिर से जीवंत कर सकता है और इसे सदियों पहले वाली शुद्ध पवित्र नदी में फिर से बहाल कर सकता है। 

डॉ. पाठक का विचार: गंगा को 10,000 जिम्मेदार, उत्तरदायी लोगों/स्वयंसेवकों को समर्पित करें और यह जल्द ही 100 फीसदी स्वच्छ हो जाएगी और इसी तरह बनी रहेगी।
कैसे? डॉ. पाठक के खुद के शब्दों में पढ़िए:

1 एक 'सुलभ' समाधान
‘हिंदी में एक लोकप्रिय कहावत है, जिसके शब्द हैं कि यदि कोई व्यक्ति रोजाना अपने खेत और मवेशियों की देखभाल नहीं करता है, तो वह दोनों को खो देगा। इसी तरह गंगा को साफ रखने के लिए लोगों को खुद ही इससे जुड़ना होगा। क्षेत्रों को निकटता के आधार पर आवंटित किया जाना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को अपने विशेष क्षेत्रों के लिए उत्तरदायी होना चाहिए।
गंगा की लंबाई 2525 किमी है और गंगोत्री की शुरुआत से ही जितने लोगों की जरूरत होगी वह कुछ इस तरह है - प्रति व्यक्ति आधा किलोमीटर यानी नदी के एक किनारे पर केवल 5000 लोगों की जरूरत होगी, कुल 10,000 लोग चाहिए होंगे और गंगा साफ हो जाएगी।
ऐसे लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, जिन्हें या तो दंडित किया जा सकता है या सम्मानित किया जा सकता है। यह उनकी जिम्मेदारी होगी कि अगर उनके क्षेत्र में कोई कारखाना या शराब फैक्ट्री है, तो यह सुनिश्चित करें कि नदी में कोई अपशिष्ट नहीं फेंका जाना चाहिए। यह बहुत ही साधारण-सी अनिवार्य बात होनी चाहिए। यह न केवल स्वच्छता सुनिश्चित करेगा बल्कि इन लोगों को रोजगार भी प्रदान करेगा और प्रक्रिया को पारदर्शी भी बनाएगा। यह एक 'सुलभ' समाधान है।’

2 मुख्यधारा को उसके हिसाब से बहने दें
‘मृत शव को जला दिया जाता है और फिर उसकी राख को गंगा में विसर्जित किया जाता है। हमने देखा है कि गंगा की मुख्यधारा प्रदूषित नहीं है। इसकी गुणवत्ता या विशेषता है कि यह प्रदूषित नहीं हो पाती है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि इसकी मुख्यधारा प्रदूषण का ख्याल रखने में सक्षम है।
इस तरह की व्यवस्था की जानी चाहिए कि किसी ऐसी जगह पर राख को विसर्जित किया जाए, जो मुख्यधारा से 200 मीटर दूर हो। जब 200 मीटर के बाद राख मुख्यधारा तक पहुंचेगी, तब उसका मुख्यधारा के द्वारा खुद ख्याल रखा जाएगा। अन्यथा अभी क्या हो रहा है कि सभी विसर्जित पदार्थ इन नदियों के किनारे ही जमा रहते हैं।’

3 दैनिक और तत्काल एक्शन
‘बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय ने कहा था कि सरकार या संगठन द्वारा सामाजिक कार्य अकेले ही नहीं किया जा सकता है। यदि दोनों हाथ मिलाते हैं, तभी केवल मिशन पूरा किया जा सकता है। यह सच है। अगर सब एक साथ आते हैं, तो यह किया जा सकता है।
हम सब पवित्र गंगा की प्रार्थना करते हैं। हमें ऐसा करने के लिए कोई नहीं कहता है, हम इसे खुद ही करते हैं। इसी प्रकार गंगा को साफ रखने के लिए जो कुछ भी कोई स्वयं कर सकता है, उसे अपना योगदान देना चाहिए।
एक क्षेत्र चुनें और इसकी सफाई की जांच के लिए रोजाना वहां जाएं। इसे साफ रखने के लिए अपने परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों को जोड़ें। यदि फंड की आवश्यकता है, तो आप दान के लिए पर्यटकों और तीर्थयात्रियों से पूछ सकते हैं। आप वित्त-पोषण के लिए सरकार से भी संपर्क कर सकते हैं। लेकिन आपको रोजाना क्षेत्र की देखभाल करनी होगी।
दुनियाभर में जब शवों या कंकालों को नदियों में फेंक दिया जाता है, तो उन्हें तत्काल बाहर निकाला जाना चाहिए। हम (सुलभ) ने एक घाट साफ किया है - अस्सी घाट, जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं साफ किया और बाद में सुलभ ने इसे आगे बढ़ाया। 
आज, हम इसकी देखभाल करते हैं। अगर अस्सी घाट के चारों ओर कोई गंदगी होती है या नदी में कुछ फेंक दिया जाता है, तो हम तुरंत इसे हटा देते हैं। हमारे लोग नौकाओं पर बैठते हैं और जब भी कोई फूल, फल या कुछ और फेंकता है, तो हम उन्हें तुरंत नदी से बाहर निकाल देते हैं।
जब तक गंगा की लगातार हर वक्त देखभाल नहीं की जाएगी, तब तक कुछ भी संतोषजनक नहीं होगा।’

4 परंपराओं को न बदलें, आदतों को बदलें
‘हम लोगों को दीया या फूलों के साथ पवित्र गंगा की प्रार्थना करने से नहीं रोक सकते हैं, लेकिन हम कम से कम पूजा होने के तुरंत बाद इसे नदी से बाहर निकालने और अलग किनारे पर रखने के लिए आग्रह तो कर ही सकते हैं। बाद में देखभाल करने वाला उसे वहां से हटा सकता है।
सुलभ व्यावहारिक और पारस्परिक समाधान देने में विश्वास करता है - मानव व्यवहार क्या है और हम इसे पारस्परिक रूप से कैसे बदल सकते हैं, उन्हें कैसे समझा सकते हैं। ऐसे समाधान लंबे समय तक काम करेंगे। आजकल फूल अच्छे खाद के रूप में या होली रंग निकालने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। 
जो लोग फूलों से निष्कर्षण करते हैं, वे इन फूलों को नदी के किनारों से एकत्र कर सकते हैं और अपने मनमाफिक पुन: उपयोग में ला सकते हैं।’

5 उपचार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना संरक्षण
‘अपशिष्ट जल का उपचार (ट्रीटमेंट) बहुत जरूरी है। आज 732 शहर हैं, जिनके सीवेज का पानी सीधे नदियों में चला जाता है। क्लास -1 शहर लगभग 500 हैं, क्लास -2 शहर 232 हैं। क्लास -1 शहरों में उपचार का कवरेज औसत है लगभग 32 प्रतिशत। द्वितीय श्रेणी के शहरों में उपचार केवल 8 फीसदी है। दिल्ली में उपचार 69 प्रतिशत है। जबकि शेष जल नदियों में चला जाता है। गंगा भी एक ऐसी ही नदी है।
गंगा की सफाई के लिए यह महत्वपूर्ण है कि सीवेज के पानी और चमड़े के कारखाने व शराब फैक्ट्री से निकले अपशिष्ट जल का 100 फीसदी उपचार और प्रशोधन किया जाए।
सभी शुरुआती सभ्यताएं नदियों के तट पर बस गईं, क्योंकि पानी पीने और व्यापार व वाणिज्य के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता थी और इस्तेमाल किए गए पानी का चाहे शौचालय का हो या रसोई का या अन्य कहीं का, उन नदियों में ही निपटान भी कर दिया जाता था। इससे पहले जनसंख्या कम थी और इसीलिए शौचालयों का उपयोग भी सीमित था। लेकिन अब क्या हुआ है कि एक शहर में ही लाखों और करोड़ों लोग रह रहे हैं।
आज सुलभ मानव उत्सर्जन का पुन: उपयोग में लाकर इससे बायोगैस पैदा करता है। इससे लैंप जलता है, भोजन बनता है, बिजली के उत्पादन सहित अन्य कई काम करता है और जिस पानी को हम अपने संयंत्र के माध्यम से साफ करते हैं वह बहुत ही साफ है। इसके लिए एक तकनीकी शब्द है - बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) प्रति लीटर प्रति मिलीग्राम – हमारे साफ जल में 10 बीओडी है, जो बहुत साफ पानी में होता है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम है और खेती जैसे विभिन्न गतिविधियों के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है, जहां यह खाद के रूप में कार्य करेगा, या नदियों में भी छोड़ा जा सकता है।
इस तरह नदी भी स्वच्छ और प्रदूषण से मुक्त रह सकती है। इस तरह के उपचार संयंत्र जो कि यहां सुलभ ग्राम में हैं, इन उपचार संयंत्रों को इस तरह से लगाया और उपयोग में लाया जाना चाहिए कि सीवेज का पानी नदी में प्रवेश करने से पहले ही हाथोहाथ साफ हो जाए। तब पानी नदियों में छोड़ा जा सकता है और उससे कोई प्रदूषण भी नहीं होगा।’

6 शौचालय कभी मत भूलना!
‘जैसा कि आप देख सकते हैं, प्रदूषण से पर्यावरण को बचाने के संदर्भ में घरों और सार्वजनिक स्थानों पर बनाए गए शौचालय आज भारत में जितनी भी स्वच्छता दिखती है, उसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण हैं। आप खुद अपने लिए यह कल्पना कर सकते हैं कि अगर 50 साल पहले की स्थिति आज भी बनी रही होती, तो वर्तमान परिदृश्य क्या होता? अगर सुलभ शौचालय का आविष्कार नहीं हुआ होता, तो न ही खुले में शौच से मुक्ति मिलती और न ही हाथों से मैला ढोने (मैनुअल स्केवेंजिंग) की कुप्रथा समाप्त हो सकती थी।
उत्तराखंड सरकार और सुलभ के संयुक्त प्रयासों के माध्यम से उत्तराखंड में विशेष रूप से गंगोत्री में शौचालय बनाए गए। उत्तराखंड सरकार चाहती थी कि सुलभ शौचालय गंगोत्री में बनाए जाएं, ताकि तीर्थयात्रियों को इधर-उधर घूमकर खुले में शौच के लिए न जाना पड़े, क्योंकि इससे इलाके में प्रदूषण होता है और गंगा जल भी दूषित होता है।
गंगा के किनारे या उसके आस - पास बने सभी घर या उसके जलग्रह क्षेत्रों वाले घरों में शौचालय होना चाहिए, ताकि वहां कोई भी खुले में शौच के लिए न जाए और पवित्र नदी में मानव मल न जमा हो। इसके अलावा, सिर्फ शौचालय का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है, उसकी देख-रेख भी बहुत जरूरी है। यह साफ होने चाहिए और लोगों को इसके उपयोग के बारे में जानकारी देकर जागरूक किया जाना चाहिए।’



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