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गुरुवार, 20 जून 2019

एजरा पाउंड - कविता का नया तर्क और विमर्श

अंग्रेजी साहित्य परंपरा और इतिहास में एजरा एक नए वैचारिक उभार के कवि थे। उनकी इसी खासियत ने आज भी साहित्य प्रेमियों के साथ आलोचकों की दुनिया में उनकी प्रासंगिकता को बहाल रखा है

उत्तर आधुनिकता का विचार और इससे जुड़ी शब्दावली तो 20वीं सदी के आखिरी दशक में प्रचलन में आई। इसी दौर में उत्तर आधुनिक विमर्श ने भी वैश्विक जोर पकड़ा। पर इससे पहले जिन साहित्यकारों की आलोचना और उनके विचारों को लेकर आधुनिकता से आगे की शब्दावली इस्तेमाल की गई, उनमें प्रसिद्ध कवि एजरा पाउंड का नाम अहम है। एजरा पाउंड प्रवासी अमेरिकी कवि और आलोचक थे। उनके विचार और साहित्य को लेकर जहां एक तरफ काफी विवाद उभरा, वहीं उन्होंने दुनिया के सामने ऐसे क्रांतिकारी विचार रखे, जिन्हें अति आधुनिक माना गया। अंग्रेजी साहित्य परंपरा और इतिहास में एजरा एक नए वैचारिक उभार के कवि थे। उनकी इसी खासियत ने आज भी साहित्य प्रेमियों के साथ आलोचकों की दुनिया में उनकी प्रासंगिकता को बहाल रखा है।

नितांत नूतन लेखन 
एजरा एक ऐसे लेखन से दुनिया को परिचित करा रहे थे, जो नितांत नूतन था। उनकी प्रयोगधर्मिता ने साहित्य को लेकर एक नई समझ की दरकार दुनिया के सामने रखी। इस दरकार पर खरा उतरने का जोखिम तब जितना कठिन था, आज भी उससे कम नहीं। दिलचस्प यह कि अब जबकि एजरा को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, खासकर उनकी कविताओं को समझने के लिए कई आलोचकीय सूत्र विकसित हो चुके हैं, तो भी एजरा का साहित्य खुद को नितांत नई दृष्टि के साथ देखे-पढ़े जाने की चुनौती पेश करता है।

‘इमेजिज्म’ की स्थापना
एजरा अपने लेखन और विचारों के साथ हमें 20वीं सदी की पूरी यात्रा कराते हैं। उनका कुछ साहित्य 20वीं के पूर्वार्ध में सामने आया जबकि बाकी का साहित्य उन्होंने इस सदी के उत्तर काल में लिखा। उनकी एक बड़ी खासियत यह भी रही कि उन्होंने साहित्य के एकांत को तोड़ा और उसके लेखन से लेकर विचार तक को अपने दौर की सबसे प्रबुद्ध कार्रवाई का दर्जा दिया। उनके साहित्यिक अवदान में उनका लेखन तो शामिल है ही, पर इसके अलावा वे उस समूह की स्थापना के लिए भी चर्चा में रहे, जिसे उन्होंने साहित्य लेखन और उसके आस्वादन के सर्वथा नए अनुभव के लिए बनाया था। इस समूह का नाम था- इमेजिज्म (छविवाद)। इमेजिज्म की स्थापना उन्होंने 1913 में की थी। 

विरोधाभासों का कवि
कुछ आलोचक एजरा को विरोधाभासों का कवि मानते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह रहा इमेजिज्म की स्थापना और इससे जुड़े उद्देश्यों से खुद एजरा का अलग होना। एजरा इमेजिज्म की स्थापना के साथ 20वीं सदी में जिस अत्याधुनिक कविता के आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे, उसमें क्लासिकल चीनी और जापानी कविताओं को अहम स्थान दिया गया था। यह आंदोलन कविता को बिंब और रूपक से बाहर संवेदना की हूबहू प्रस्तुति पर जोर देता था। यही नहीं विस्तृत और अनावश्यक विस्तार की जगह कविता में शब्दों की फिजूलखर्ची का भी यह आंदोलन प्रखर विरोध करता था। 

लंबी कविता ‘द कैनटॉस’
दिलचस्प है कि खुद एजरा की ख्याति के पीछे उनकी एक लंबी कविता ‘द कैनटॉस’ भी है। मशहूर अंग्रेजी आलोचक रिबेका बेस्ले बताती हैं कि यह कविता उन्होंने 1915 में लिखनी शुरू की थी। पर 1972 तक वे इसे अंतिम तौर पर पूरा नहीं कर पाए। गौरतलब है कि 1972 में उनका देहांत हो गया था। इस दौरान इसके कई अपूर्ण पाठ चर्चा में रहे। यह बिल्कुल उसी तरह की स्थिति है जैसी हिंदी के सर्वाधिक आधुनिक और विचारप्रवण ठहराए गए कवि मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ को लेकर रही। ‘अंधेरे में’ कविता पहली बार हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका ‘कल्पना’ में छपी थी। पर इसके बाद भी वे इस कविता को लगातार संशोधित-संपादित करते रहे। आलम यह रहा कि उनका इसी कविता के नाम पर जो काव्य संग्रह उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ, उसको लेकर भी यह विवाद बना ही रहा कि यह कवि द्वारा लिखित कविता का एक और पाठ है या अंतिम।   
    
आधुनिक महाकाव्य का दर्जा
बात अकेले एजरा की लंबी कविता ‘द कैनटॉस’ की करें तो जो सबसे विस्तृत पाठ इसका दुनिया के सामने आया उनमें 120 खंड हैं। कविता के इस विस्तार के कारण कई लोग इसे एक आधुनिक महाकाव्य का भी दर्जा देते हैं। रिबेका कहती हैं कि ‘द कैनटॉस’ अत्याधुनिक मानवीय विमर्श की कविता के साथ उस ऊहापोह की भी कविता है, जो एजरा अपने भीतर मानवीय संवेदना की नियति का अंतिम भाष्य लिखते-समझते हुए महसूस कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में ‘द कैनटॉस’ आधुनिक मनुष्य के विकास बनाम उसके विरोधाभासों के विकास की कविता है। इस कविता में एजरा ने यांत्रिकता और विकास के संजाल के बीच बुद्धि और संवेदना की सुरक्षा का सवाल उठाया है।  

दिग्गज साहित्यकारों के समकालीन
बहरहाल ‘द कैनटॉस’ के साथ कई और कृतियां भी हैं, जिनके कारण एजरा पाउंड आज भी न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि विश्व साहित्य के बड़े हस्ताक्षर बने हुए हैं। एजरा ने 20वीं सदी की शुरुआत में कई अमेरिकी साहित्यिक पत्रिकाओं का लंदन में संपादन किया था। साहित्य की दुनिया को उनका एक बड़ा अवदान यह भी है कि अपने कई समकालीन दिग्गज साहित्यकारों की कृतियों के संपादन के साथ उनकी कई अप्रकाशित रचनाओं से उन्होंने साहित्य प्रेमियों को परिचित कराया। इन साहित्यकारों में टीएस इलियट, जेम्स ज्वाइश, राबर्ट फ्रॉस्ट और अर्नेस्ट हेमिंग्वे शामिल हैं। 

ब्रिटेन से मोहभंग
जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो एजरा का ब्रिटिश संस्कृति और सोच को लेकर इतना बड़ा मोहभंग हुआ कि उन्होंने ब्रिटेन छोड़ने तक बड़ा फैसला कर लिया। उन्हें लगता था कि विश्व युद्ध के रूप में मानवता के आगे आई विभीषिका के पीछे सबसे बड़ी वजह वैश्विक पूंजीवाद का बढ़ा जोर है। ब्रिटेन छोड़कर वे 1924 में इटली पहुंचे। यहां वे तीस और चालीस के दशक तक न सिर्फ टिके बल्कि रचनात्मक और वैचारिक रूप से काफी सक्रिय भी रहे। यहां तानाशाह और फासिज्म के विचारों के चक्कर में वे पड़े। उन्हें लगा कि पूंजीवाद से निपटने के लिए अतिवादी होना समय की मांग है। इसी दौर में उन्होंने सर ओस्वाल्ड मोस्ली के साहित्य के प्रकशन का कार्य किया। 

विचलन से निधन तक 
कुछ आलोचकों की नजर में पहले से दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में एजरा ने जिस तरह का जीवन जिया और कार्य किया, वह उनकी रचनात्मक श्रेष्ठता की जगह विचलन की मनोदशा को दर्शाता है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान तो उन्हें इटली की हुकूमत बजाप्ता इस तरह के रेडियो टेलीकास्ट के लिए पैसे दे रही थी, जिसमें वे अमेरिका की जोरदार निंदा करते थे। 1945 में उन्हें अमेरिकी फौज ने राजद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। कैद करके अमेरिका ले जाने के बाद उन्हें कई तरह की सैन्य यातनाएं दी गईं, जिससे वे मानसिक रूप से तकरीबन विक्षिप्त हो गए। जीवन के आखिरी 12 वर्षों तक वाशिंगटन के एक अस्पताल में उनका मनोरोग का इलाज चलता रहा। गौरतलब है कि उनकी ख्याति का एक बड़ा आधार उनकी लंबी कविता ‘द कैनटॉस’ गिरफ्तारी और सैन्य यातना के दिनों की ही देन है।



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