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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

चांद होगा धरती का आठवां महादेश

चांद और अंतरिक्ष को लेकर अभी सारी वैज्ञानिक गुत्थियां भले न सुलझी हों, पर इस बीच कई ऐसी तैयारियां शुरू हो गई हैं जिसमें चांद और धरती की दूरी तो कम होगी ही, इनके बीच व्यावसायिक रिश्ता भी कायम हो सकेगा

चांद और अंतरिक्ष को लेकर वैज्ञानिक खोज अब दिलचस्प दिशा की तरफ मुड़ गई है। अब इसमें कई ऐसी संभावनाओं को स्थान मिल रहा है, जिससे चांद और अंतरिक्ष को लेकर लोगों की सैकड़ों सालों से रही फैंटेसी को सच कर दिखाया जाए। ऐसी ही एक संभावना है चांद पर मानवीय जीवन के लिए अनुकूलताओं की खोज। इससे जुड़े कई अनुसंधान तो चल ही रहे हैं, साथ में कई ऐसे विकल्पों को लेकर भी कार्य शुरू हो गए हैं, जिससे चांद और मनुष्य के बीच की दूरी कम हो। इन्हीं कोशिशों के बीच चांद को दुनिया का आठवां महादेश बनाने की तैयारी भी की जा रही है। इस तरह की तैयारी में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा तो अपने तरह से जुटी ही है, विकसित देशों की कई निजी कंपनियां भी ऐसी योजनाओं में दिलचस्पी दिखा रही हैं। खासौतर पर निजी कंपनियां चांद पर पानी से लेकर हीलियम तक तलाशने का काम शुरू करने वाली हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि चांद पर मौजूद हीलियम को धरती पर लाने में सफलता मिलती है तो विश्व में आने वाले एक हजार साल तक की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। दरअसल, धरती पर तेजी से खत्म हो रहे प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए कुछ लोग इसकी वैकल्पिक तलाश में जुटे हैं और इस लिहाज से चांद उन्हें काफी आकर्षित करता है। ऐसे ही एक प्रयास में जुटी है ‘मून एक्सप्रेस’ कंपनी। यह अमेरिकी कंपनी चांद पर खुदाई का काम शुरू करने वाली है, ताकि वहां पर मौजूद संसाधनों का उपयोग पृथ्वी पर किया जा सके। इस कंपनी के मालिक रिचर्ड बताते हैं, ‘चांद पृथ्वी के आठवें महादेश की तरह है। अभी पूरी तरह से इसके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है। मैं और मेरे जैसे कुछ साहसी लोग उन शुरुआती अग्रदूतों की तरह हैं जो पूरी तरह से एक नयी दुनिया की तलाश में चांद पर जा रहे हैं।’ 
 चांद पर मौजूद ध्यानाकर्षण वाले संसाधनों में प्लेटिनम और हीलियम-3 है। कुछ लोगों का मानना है कि चांद पर पानी का भंडार भी है। इसके अलावा इरेडियम व पैलेडियम को लेकर भी लोग आशान्वित हैं। इन धातुओं में एक विशेष गुण होता है, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के लिए काफी उपयोगी होता है। ऐसे तत्व पृथ्वी पर काफी कम मात्रा में उपलब्ध हैं। लेकिन, संभव है कि चांद पर यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो। रिचर्ड को उम्मीद है कि बहुत जल्द चांद पर बहुमूल्य संसाधनों की मौजूदगी के बारे में सबको खबर होगी। यह अलग बात है वहां मिलने वाला कौन सा संसाधन सबसे अधिक उपयोगी होगा, यह भविष्य बताएगा। मून एक्सप्रेस अकेली ऐसी कंपनी नहीं है, जिसने चांद पर मौजूद संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने का मन बनाया है। इस दौड़ में विश्व के कई देश और वहां की निजी कंपनियां शामिल हैं। मून एक्सप्रेस के रिचर्ड एक बात को लेकर और भी दावा करते हैं कि सूर्य के चारों ओर एक घेरे के रूप में मौजूद क्षुद्र ग्रह पर बर्फ के रूप में पानी मौजूद है। इन क्षुद्र ग्रहों से अंतरिक्ष में पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है। 

चांद पर पानी 
‘आइस्पेस’ एक जापानी कंपनी है और वह चांद पर पानी की तलाश शुरू करने वाली है। 2016 के आखिर में आइस्पेस ने जापान नेशनल स्पेस एजेंसी के साथ चांद पर माइनिंग, ट्रांसपोर्ट और चांद के संसाधनों के उपयोग को लेकर एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया है। शुरुआती चरण में 2018 से 2023 के बीच यह कंपनी चांद का पूर्वेक्षण करेगी। इसके तहत चांद पर खोजी रोबोट उतारे जाएंगे, जो वहां की सतह पर पानी की तलाश करेंगे। कंपनी का चांद पर व्यावसायिक काम 2024 में शुरू होगा। 

क्षुद्र ग्रह पर रोबोट
अमेरिका की दो कंपनियां ‘प्लेनेटरी रिसोर्सेस’ और ‘डीप स्पेस इंडस्ट्री’ क्षुद्र ग्रह पर खुदाई के काम को लेकर योजना बना रही है। डीप स्पेस के चेयरमैन रिक टिमलिसन कहते हैं कि उनकी कंपनी की योजना 2020 तक पहले किसी क्षुद्र ग्रह पर एक पूर्वेक्षण रोबोट उतारने का है। यह क्षुद्र ग्रह पर संभावित जल संसाधनों का अध्ययन व खोज करेगा। इसके बाद वह वहां से एक टुकड़ा लेकर आएगा। इस टुकड़े को सौर शक्ति से उसका वाष्पीकरण कर पानी के रूप में परिवर्तित किया जाएगा, क्योंकि क्षुद्र ग्रहों से पानी का दोहन करना काफी आसान है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक होता है तो 21वीं सदी के मध्य तक संसाधनों का बड़ी मात्रा में उत्पादन संभव हो सकेगा। प्लेनेटरी रिसोर्स कंपनी की योजना भी जल की खोज पर केंद्रित है। इसके सीइओ क्रिस लेविकी कहते हैं कि सौर ऊर्जा से क्षुद्र ग्रह की सतह को गर्म कर वहां से पानी उत्सर्जित किया जा सकता है। 

‘रिटर्न टू द मून’
जापान के अलावा चीन भी चांद को उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। खासकर चीन की दिलचस्पी चांद पर मौजूद हीलियम-3 में है। हीलियम-3 का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में आसानी से किया जा सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि सूर्य से जारी होने वाले आइसोटॉप सौर हवाओं में तैरते हुए पृथ्वी की ओर जरूर आते हैं, लेकिन यहां के वायुमंडल के कारण यह सतह तक नहीं पहुंच पाते हैं। वहीं इसे चांद पर पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं होती है। इसीलिए चांद की सतह पर यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। 
दरअसल, हीलियम-3 एक नान रेडियोएक्टिव एजेंट है। यह कोई भी खतरनाक तत्व उत्सर्जित नहीं करता है। चीनी वैज्ञानिक सलाहकार प्रो ओयांग जियुन का मानना हैं कि अगर चांद पर मौजूद हीलियम-3 का इस्तेमाल ऊर्जा के रूप में किया जाए, तो पृथ्वी पर 10000 साल तक की ऊर्जा की जरूरत पूरी हो सकती है। चांद पर हीलियम-3 की खुदाई की वकालत हैरीसन स्मिथ ने भी की है। हैरीसन एक भूविज्ञानी हैं और नासा के अपोलो-17 मिशन के दौरान चांद पर जा चुके हैं। उन्होंने इस बात का जिक्र 2006 में लिखी अपनी किताब ‘रिटर्न टू द मून’ में किया है। वह कहते हैं कि हीलियम-3 का ऊर्जा में रूपांतरण संलयन प्रौद्योगिकी से संभव है,लेकिन इसे शोधकर्ता लंबे समय से टालते आए हैं। 

स्पेस में कॉलोनियां 
 प्लेनेटरी रिसोर्स और डीप स्पेस जैसी कंपनियां अंतरिक्ष में भवन निर्माण सामग्री ले जाने की भी योजना बना रही हैं। इससे अंतरिक्ष में तैरने वाली संरचना का निर्माण किया जा सकेगा। इसे पृथ्वी से लांच करने की आवश्यकता नहीं होगी। अंतरिक्ष में विशालकाय संरचनाओं का निर्माण ठीक उसी प्रकार से किया जा सकेगा, जैसा कि साइंस फिक्शन फिल्मों में देखने को मिलता है। इस निर्माण में चांद व क्षुद्र ग्रह से मिलने वाले धातु और पानी की सहायता ली जाएगी। साथ ही थ्रीडी प्रींटिंग जैसे तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इन तकनीकों का इस्तेमाल आज तक पृथ्वी पर इस पैमाने पर नहीं हो सका है। इसी तरह एलेन 
मुस्क और जेफ बिजोस जैसे बड़े कारोबारी भी अंतिरक्ष में और मंगल पर कॉलोनी बनाने की योजना पर विचार कर रहे हैं। वे इसके लिए अंतरिक्ष में माइनिंग की वकालत कर रहे हैं। इसी माइनिंग से कॉलोनी निर्माण में पानी, ईंधन व कच्चे माल की आपूर्ति होगी। 

भारी निवेश 
जाहिर है कि अंतरिक्ष से जुड़ी इन तमाम योजनाओं पर काफी खर्च आएगा। स्पेस वेंचर्स को लेकर 2015 में करीब 1.8 बिलियन डॉलर निवेश किया गया। करीब 50 से ज्यादा वेंचर्स ने अंतरिक्ष से जुड़े सौदों के लिए निवेश कर दिया है। एक छोटे से यूरोपीय देश लग्जमबर्ग ने भी इन मामलों में 25 मिलियन यूरो प्लेनेटरी रिसोर्स के साथ मिलकर प्रोस्पेक्टर एक्स के लिए निवेश किया है। साफ है कि चांद और अंतरिक्ष को लेकर खोज और वैकल्पिक योजनाओं के लिए कहीं से भी वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं दिख रही है। 

 

'अर्थ 2.0' की खोज
अमेरिकी वैज्ञानिकों को एक ऐसे ग्रह का पता चला है जो धरती से काफी मिलता जुलता है। जीवन की संभावनाएं जगाने वाला यह ग्रह सूर्य जैसे ही एक सूदूर तारे की परिक्रमा कर रहा है। धरती से आकार में करीब 60 फीसदी बड़ा यह ग्रह उससे करीब 1,400 प्रकाशवर्ष दूर स्थित ‘साइग्नस’ नाम के एक तारा समूह में स्थित है। खगोलविदों ने नासा के केपलर के स्पेस टेलिस्कोप से इसकी खोज की है। यह ग्रह एक ऐसे तारे के चारों ओर चक्कर लगाता दिखा है, जो आकार और तापमान में धरती के सूर्य जैसा ही है, लेकिन उम्र से उससे भी बड़ा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के एमीज रिसर्च सेंटर के खगोलविद जोन जेंकिंस ने बताया, ‘मेरे विचार में, हमंत धरती के समान एक ग्रह जैसी सबसे नजदीकी चीज मिली है।’
इस ग्रह का नाम केपलर-452बी रखा गया है और यह जिस सूर्य जैसे तारे के चारों ओर घूम रहा है, वह करीब छह अरब साल पुराना है। हमारी धरती के सूर्य की उम्र लगभग 4.6 अरब साल आंकी गई है। जेंकिंस कहते हैं, ‘यह जानना एक अद्भुत अनुभव है कि कि इस ग्रह ने छह अरब साल इस तारे के आसपास हैबिटेबल जोन में बिताए हैं।’ हैबिटेबल जोन किसी तारे के चारों ओर के उस क्षेत्र को माना जाता है, जिसमें परिक्रमा कर रहे ग्रह पर जीवन के आधार पानी के द्रव्य रूप में होने की संभावना हो।
इस ग्रह पर जीवन होने की संभावना पर जेंकिंस कहते हैं, ‘उसकी सतह या सागरों में जीवन की उत्पत्ति के लिए इतना समय और अवसर काफी होना चाहिए, अगर धरती की तरह वहां जीवन के लिए बाकी जरूरी सामग्री और परिस्थिति भी मिले।’ केपलर-452बी की अपने सूर्य से दूरी लगभग उतनी ही है जितनी धरती की हमारे सूर्य से। वह अपने सूर्य का एक चक्कर 385 दिनों में लगाता है, जबकि धरती को 365 दिन लगते हैं। केंद्रीय तारे से इतनी दूरी पर ग्रह का तापमान पानी के लिक्विड रूप में रखने लायक माना जा रहा है। पहले भी वैज्ञानिक कुछ और धरती जैसे ग्रहों की पहचान कर चुके हैं, लेकिन उनके तारों का तापमान और आकार इससे कम पाया गया। नासा ने 2009 में केपलर टेलिस्कोप को इसी मकसद से भेजा था कि धरती के सबसे नकदीकी तारों का पता लगा सके। केपलर को ऐसे ग्रहों का पता लगाना था कि क्या आकाशगंगा में धरती जैसे ग्रह होना आम है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अर्थ 2.0 कहा जा रहा यह नया ग्रह धरती की ही तरह चट्टानी हो सकता है। यह धारणा सांख्यिकीय गणनाओं और कंप्यूटर मॉडलिंग पर आधारित है और इसका अभी कोई सीधा साक्ष्य नहीं मिला है। 'दि एस्ट्रोनॉमिकल जर्नल' में प्रकाशित इस रिसर्च में कहा गया है कि यह ग्रह धरती से पांच गुना भारी और दोगुने गुरुत्व बल वाला ग्रह हो सकता है। वैझानिकों को लगता है कि इसका अपना वायुमंडल, बादलों वाला आकाश और सक्रिय ज्वालामुखी हो सकते हैं। इसके वायुमंडल के बारे में पता लगाने के लिए केपलर से भी अधिक संवेदनशील स्पेस टेलिस्कोप की जरूरत होगी। केपलर टेलिस्कोप से अब तक 1,000 से भी ज्यादा ग्रहों की पहचान की जा चुकी है और 4,700 ग्रह जैसी चीजें इस कतार में हैं। इस लंबी सूची में ऐसे 11 अन्य ग्रह हैं जो धरती जैसे हो सकते हैं। 



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