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रविवार, 16 जून 2019

स्वच्छता का मॉडल देश

स्वीडन आर्थिक तौर पर तो काफी संपन्न है, लेकिन स्वच्छता की दृष्टि से भी वह दुनिया का आदर्श देश बन गया है

एक देश अगर स्वच्छता के हर तरह के मानकों पर खुद को तकरीबन सौ फीसद खरा उतार पाने में कामयाब हो तो उस देश की व्यवस्थागत खूबियों के साथ वहां के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर दिलचस्पी स्वाभाविक है। स्वीडन एक ऐसा ही देश है, जो आर्थिक तौर पर काफी संपन्न होने के साथ स्वच्छता की दृष्टि से दुनिया का आदर्श देश बन गया है।  

स्वच्छता में अव्वल
बात अकेले स्वच्छता की करें तो पूरे स्वीडन में 99 फीसद से ऊपर आबादी तक उन्नत और सुरक्षित स्वच्छता सेवाओं की पहुंच है। वहां बमुश्किल एक फीसद आबादी ऐसी है, जो असुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं का अब भी प्रयोग कर रही है। गौरतलब है कि स्वीडन में स्वच्छता को लेकर यह स्वावलंबी स्थिति इसीलिए भी आई है क्योंकि स्वच्छता और जलापूर्ति का सीधा संबंध है और जल प्रबंधन के नजरिए से यह देश काफी आगे है। 

सबको शुद्ध जल 
स्वीडन दुनिया के उन चंद देशों में शामिल है जहां जल प्रबंधन इतना कारगर है कि वहां की पूरी आबादी तक न सिर्फ पानी की पहुंच है, बल्कि वहां का हर आदमी स्वच्छ जल इस्तेमाल कर रहा है। जल और स्वच्छता को लेकर स्वीडन की सफलता या उसके स्वावलंबन के पीछे एक बड़ी वजह वहां के लोगों की आदतें और उनके स्वच्छ संस्कार हैं। पूरी दुनिया में स्वीडिश लोगों के लिए यह माना जाता है कि वे न सिर्फ सफाई पसंद हैं, बल्कि उनकी जीवनशैली काफी अनुशासित और जिम्मेवार है।  

शहरों में सिमटा देश
31 मार्च 2018 तक स्वीडन की कुल आबादी 10,142,686 थी। वहां 85 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। राजधानी स्टॉकहोम की जनसंख्या 950,000 है (शहरी क्षेत्र में 1.5 मिलियन और महानगरीय क्षेत्र में 2.3 मिलियन)। दूसरे और तीसरे सबसे बड़े शहर गोथनबर्ग और मालमो हैं।
नॉरलैंड, जो लगभग 60 प्रतिशत स्वीडिश क्षेत्र को कवर करता है, में बहुत कम जनसंख्या घनत्व है (5 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर के नीचे)। पहाड़ और दूरस्थ तटीय क्षेत्र अधिकांशतः गैर आबादी वाले हैं। 1820 से 1930 के बीच लगभग 1.3 मिलियन स्वीडिश यानी देश की आबादी का एक तिहाई उत्तरी अमेरिका में जा कर बस गए, जिनमें से अधिकांश अमेरिका में बसे। 2006 के अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के अनुमान के अनुसार 4.4 मिलियन से अधिक स्वीडिश-अमेरिकी हैं। कनाडा में स्वीडिश लोगों का समुदाय 330,000 से अधिक है।
स्वीडन को लेकर जातीयता का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। लेकिन स्वीडन के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, 2017 में स्वीडन में लगभग 3,193,089 (31.5 फीसदी) निवासी विदेशी पृष्ठभूमि के थे, जिसमें या तो वे खुद विदेश में पैदा हुए थे या उनके माता-पिता में से कम से कम एक विदेश में पैदा हुए हैं। स्वीडन आकर बसे लोगों में सीरिया (1.70%), फिनलैंड (1.4 9%),
इराक (1.39%), पोलैंड (0.90%), ईरान (0.73%) और सोमालिया (0.66%) आदि देशों के प्रमुख हैं।

कचरा मुक्त देश 
स्वीडन में स्वच्छता का आलम यह है कि पूरे यूरोप में पर्यावरण के प्रति सबसे जागरूक कहा जाने वाला यह देश अब इस कदर कचरा मुक्त हो गया है कि उसे अब अपने रिसाइक्लिंग संयंत्रों को चलाते रखने के लिए आसपास के देशों से कचरा आयात करना पड़ रहा है। वैसे स्वच्छता को लेकर यह जागरूकता यूरोप के अन्य देशों में भी कमोबेश है। जर्मनी, नॉर्वे, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे देशों में भी कूड़े से बिजली बनाने के 420 से ज्यादा प्लांट न सिर्फ शुरू हुए बल्कि पर्याप्त मात्रा में बिजली सप्लाई भी करने लगे हैं। 

रीसाइक्लिंग की नई समस्या
अकेले स्वीडन को लें तो वह आज एक ऐसा देश है, जिसकी रिसाइक्लिंग संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ते देखकर अब उसे सबसे बड़ी चिंता अधिक मात्रा में कचरा हासिल कर उसे संयंत्र तक पहुंचाने की है। यह एक नई तरह की स्थिति है, जिसमें स्वच्छता को लेकर शुरू की गई व्यवस्था इतनी कारगर है कि अब वह व्यवस्था या तो गैरजरूरी दिख रही है या फिर उसे कायम रखने के लिए अलग से प्रयास करने पड़ रहे हैं।  
स्वीडन में इस तरीके के करीब 78 संयंत्र कार्यरत हैं। जिन-जिन शहरों के ये संयंत्र बिजली बना रहे हैं उन नगरपालिकाओं में इस बात पर झगड़ा मचा हुआ है कि वे अपने शहर का कूड़ा दूसरे शहर को क्यों दें, क्योंकि राष्ट्रव्यापी जागरूकता के चलते इन शहरों के पास इतना कूड़ा पैदा ही नहीं हो रहा कि वे अपनी जरूरत की पूरी बिजली पैदाकर कूड़े को दूसरों को दें। इस समय वे सभी कचरा पाने के लिए इंग्लैंड की ओर कातर निगाहों से देख रहे हैं। दूर-दराज के देशों से कचरा मंगवाना काफी खर्चीला और आव्यावहारिक है।
यूरोप के देशों में जमीन में कचरा गाड़ने पर रोक है और भारी जुर्माना भी है, इसीलिए कई देश इन कचरों को स्वीडन जैसे देशों को कचरा देना ज्यादा बेहतर समझते हैं। लेकिन आज नहीं तो कल उनकी भी हालत स्वीडन जैसी ही होनी है। यूरोप के कई देश केवल कचरे से बिजली ही नहीं बना रहे, बल्कि कचरे के साथ ही साथ इस रिसाइकलिंग की प्रक्रिया से पैदा होनेवाली ऊष्मा को भी इकट्ठा कर लेते हैं, जिससे इसका उपयोग बेहद ठंड से निपटने में किया जाए। इस प्रकार कचरा की हर तरह से उपयोगिता अर्जित की जा रही है।

जागरूक नगरपालिकाएं
वर्तमान हालात और भविष्य को देखते हुए ही स्वीडन की नगरपालिकाएं रिहायशी इलाकों से ऑटोमेटिक वैक्यूम सिस्टम से कचरा संग्रह तकनीक, संग्रहीत कचरे को तुरंत संयंत्र पहुंचाने के परिहन की पूरी व्यवस्था और नागरिकों को दुर्गंध से बचाने के लिए जमीन के भीतर कचरे को संग्रहीत करने के कंटेनर सिस्टम में काफी निवेश कर रही हैं। इस समय उस देश की आधी बिजली की आपूर्ति इन्हीं तरीकों से की जा रही है। यहां का रीसाइकलिंग सिस्टम इतना अत्याधुनिक है कि जमा किए गए घरेलू कचरे का सिर्फ एक प्रतिशत ही जमीन में गाड़ने लायक बचता है।
इस बेहतर स्थिति का सबसे बड़ा कारण है- स्वीडिश लोगों के अंदर प्रकृति और पर्यावरण को लेकर व्याप्त जागरूकता। नागरिकों को यह अहसास करवाने पर पूरा जोर दिया गया कि वे कचरा न फेंकें जिससे उनका पुन: प्रयोग कर नागरिकों को ही फायदा पहुंचाया जा सके। वे जब एक बार आम आदमी के गले में यह बात उतारने में सफल रहे तब तो कंपनियों और उद्योगों पर यह लागू करना बेहद आसान था। स्वीडन उन देशों में है, जिसने 1991 में ही जीवाश्म ईंधन पर भारी टैक्स और पेनल्टी लगाकर जनता को हतोत्साहित किया और आज परिणाम सामने हैं। 



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