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रविवार, 16 जून 2019

कोल्लानी - खुद की तलाश पूरी हुई...

जिंदगी की नाव जब डगमगाती है, तो ऐसी लहरों की थपेड़ों पर छोड़ती है, जहां संभलना बहुत मुश्किल होता है। कोल्लानी के जीवन की खूबसूरत नाव भी ऐसे ही हादसे का शिकार हो गई

मशहूर शायर राना अकबराबादी ने कुछ लोगों का दर्द यूं बयां किया है, ‘दुनिया भी मिली है गम-ए-दुनिया भी मिला है, वो क्यूं नहीं मिलता जिसे मांगा था खुदा से।’ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की रहने वाली कोल्लानी पाल की खूबसूरत जिंदगी में भी किस्मत ने कुछ ऐसे ही खेल खेले कि उन्हें सबकुछ मिलते हुए भी कुछ न मिला और उनकी जिंदगी दोराहे पर खड़ी हो गई, जहां से एक रास्ता सिर्फ विरह और वेदना का था तो दूसरा कान्हा की नगरी वृंदावन में ले जाकर संतुष्टि का भाव स्फुटित करता था। और कोल्लानी ने दूसरा रास्ता चुना।
नाजुक उम्र में शादी के पवित्र बंधन में बंधी, कोल्लानी जिस बेहतर और खूबसूरत जिंदगी के ख्वाब संजोती थीं, वह उसके कदमों में थी। पति एक अच्छे ऑफिस में काम करते थे और उसकी आमदनी बेहतर थी। साथ ही पारिवारिक खेती भी थी। इसीलिए, आय के दो स्रोत थे और आर्थिक रूप से उनका जीवन सबल था।
इस तरह सुकून की छांव में और मोहब्बत की राहों में आगे बढ़ते हुए, कोल्लानी ने एक लड़के और दो लड़कियों को जन्म दिया। अब जिंदगी में जज्बातों और श्रृंगार के प्रेम की जगह ममत्व की छांव ने ले ली थी। कोल्लानी अपने बच्चों के खुशियों से भरे भविष्य के प्रति सचेत थी।
कोल्लानी और उसके पति ने दिन-रात मेहनत करके अपने बच्चों का भविष्य संवार दिया। उन्हें प्यार से भरा बेहतर बचपन दिया, पढ़ाया-लिखाया, फिर धूम-धाम से उनकी शादी की। कोल्लानी को लगा कि उसने अपने दायित्वों का निर्वाह कर लिया है, लेकिन यहीं से उसकी नियति बदलने वाली थी।
एक दिन पति की तबियत खराब हो गई, इलाज चला, कई जतन किए गए, लेकिन पति के स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ और दिन पर दिन उसकी तबियत बिगड़ती जा रही थी। डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसके पति को कैंसर है और उसके पास ज्यादा दिन शेष नहीं हैं। इतना सुनते ही, कोल्लानी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, तूफान के थपेड़े उसे आगोश में लेने लगे, उसे लगा कि जैसे उसने इसी पल में जो इतने दिन कमाया था, सब खो दिया। 
कोल्लानी बताती हैं कि मैं उस पल को आज तक नहीं भूली, जब डॉक्टर ने मुझे बताया था कि तुम्हारे पति को कैंसर है। मैंने पहले भी इस खतरनाक बीमारी का नामा सुना था, इसीलिए मुझे पता था कि इसमें बचने के मौके बहुत कम होते हैं। उस पल ऐसा लग रहा था कि या तो सब कुछ अभी ठीक हो जाए या भगवान मुझे भी मौत दे दे।
फिर वही हुआ, जिसका डर था। कोल्लानी के पति की जिंदगी को कैंसर ने लील लिया । अब कोल्लानी के पास बचा था, तो वैधव्य का सफेद रंग और यादें। साथ में, अपने पति को न बचा पाने का एक ऐसा खाली दर्द था, जिसे भरना शायद नामुमकिन था। 
कोल्लानी विरह के भाव चेहरे पर लाते हुए कहती हैं कि वैधव्य का दर्द बांटा नहीं जा सकता है, इसे महसूस नहीं किया जा सकता। वह कितने मेहरबान थे, कि हजारों खुशियों से हमें नवाज गए, लेकिन हम उन्हें चाहकर भी बचा न पाए। हमारी हर कोशिश बेकार गई। मेरे पास अब केवल मेरा बेटा और बहू थे।
लेकिन पति की मौत के साथ शायद सबकुछ बदलने लगा था। बहू से कोल्लानी के रिश्ते अब वैसे नहीं रहे, उन दोनों में बिलकुल भी नहीं पटती थी। बेटे ने कोशिशें भी की, लेकिन रिश्तों में जो दरार आई थी, वह गांठ में बदल चुकी थी, जिसका खुलना मुमकिन न था।
कोल्लानी कहती हैं, ‘मेरा बेटा बहुत अच्छा है और मुझे बहुत मानता है लेकिन बहू से मेरी अनबन शुरुआत से रही, धीरे-धीरे में उसके साथ रहना, उसे खटकने लगा। मैं अपने दर्द के घेरे और विरह की आंधी से निकलकर बाहर जाना चाहती थी, लेकिन आए दिन खराब होते रिश्तों ने ऐसा होने न दिया और फिर मैंने एक दिन घर छोड़ दिया।’
कोल्लानी ने पहले से वृंदावन के बारे में सुना था कि वहां दीन-दुखी और सताए हुए लोगों को जिंदगी का नया मर्म मिलता। अध्यात्म और संतुष्टि के सुगम रास्ते इसी पवित्र माटी से ही निकलते हैं। फिर कोल्लानी 13 साल पहले, सब कुछ छोड़कर वृंदावन आ गईं। यहां आकर पहले मीरा बाई आश्रम में रहीं, जहां कपड़े सिलती थी, जिससे खाना और पैसा मिलता था, उसी से गुजारा चलता था। शुरुआत में कई मुश्किलें आईं, लेकिन धीरे-धीरे सब सही हो गया।
कोल्लानी कहती हैं, ‘राधा-रानी की कृपा से मेरी हर राह आसान होती गई। अब गुरुकुल आश्रम में रहने लगी हूं, जबसे लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) की शरण में आई हूं, कोई कमी न रही। अब कपड़ा और खाना सब मुफ्त मिलता है, साथ में अन्य किसी जरुरत के लिए 2 हजार रुपए भी हर महीने मिलते हैं। मैं राधा-रानी का भजन गाती हूं और खुद को तलाशती हूं।’
कोल्लानी पहले अथाह पीड़ा में तपी, लेकिन वृंदावन की छांव ने उसके जीवन को सार्थक बनाते हुए पूरा कर दिया, अब वह बची हुई जिंदगी वृंदावन में शांति से बिताना चाहती हैं।
कोल्लानी अपने बूढ़ी संवेदनाओं को समेटे चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान लाते हुए कहती हैं कि बेहद खूबसूरत जिंदगी से गुजरते बेइंतहां दर्द को महसूस किया मैंने, लेकिन इस शहर की मिट्टी ने आखिर में सब घावों को भर दिया। अब शायद मेरी खुद की तलाश भी पूरी हो जाए।



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