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शनिवार, 25 मई 2019

किंगकांग को अखाड़े में किया चित

पंजाब के किसान परिवार में जन्मे दारा सिंह भारतीय फिल्मों से जुड़े उन कुछ सितारों में शामिल हैं, जिन्होंने लोकप्रियता का शीर्ष फिल्मों में आने से पहले ही देख लिया था। दारा को यह लोकप्रियता कुश्ती से मिली थी

बचपन में हमारे लिए ‘दारा सिंह’ एक विशेषण हुआ करता था। आपसी लड़ाई-झगड़ों में हम अक्सर एक दूसरे से कहते थे, ‘तू बहुत दारा सिंह है क्या?’ या ‘ज्यादा दारा सिंह मत बन।’ उस समय हमें पता ही नहीं था कि दारा सिंह क्या है, कौन है, हमारा बस यही अर्थ होता था कि ज्यादा दादागिरी मत दिखा। बड़े होने पर ‘दारा सिंह’ शब्द की हकीकत पता चली तब समझ आया कि इस नाम को हम विशेषण के रूप में क्यों इस्तेमाल करते थे। समय के साथ दारा सिंह से जुड़े किस्से-कहानियां पढ़-सुनकर हमारे दिलो-दिमाग में उनकी एक विराट छवि बनती चली गई। मुंबई आकर ‘सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन’ (सिन्टा) की सदस्यता ली तो एसोसिएशन की आमसभा में उन्हें पहली बार सामने मंच पर बैठे देखा। फिर एकाध बार सिंटा के कार्यालय में मुलाकात हुई जो महज दुआ-सलाम तक सीमित रही। और फिर बहुत जल्द वो दिन भी आया जब मैं जुहू के एबी नायर रोड स्थित उनके घर पर उनके साथ बैठकर उनका इंटरव्यू कर रहा था।

किसान परिवार में जन्म 
दारा सिंह अमृतसर जिले के धर्मूचक गांव के एक किसान परिवार से थे। उनका जन्म 19 नवंबर 1928 को उनके ननिहाल रतनगढ़ में हुआ था। दो भाइयों में दारा सिंह बड़े थे। उनके अनुसार पीढ़ी दर पीढ़ी बंटते-बंटते उनके परिवार के पास बहुत थोड़ी जमीन रह गई थी इसीलिए उनके पिता और चाचा रोजी-रोटी के सिलसिले में सिंगापुर आते-जाते रहते थे। दारा सिंह 18 साल की उम्र तक गांव में ही रहकर खेतीबाड़ी और शौकिया पहलवानी करते रहे और फिर 1947 में चाचा के साथ सिंगापुर चले गए। उनका असली नाम दीदारसिंह रंधावा था। सिंगापुर के रास्ते में मद्रास (चेन्नई) बंदरगाह पर कागजात में उनके नाम को आसान करके दारा सिंह लिख दिया गया था। आगे चलकर वो इसी नाम से मशहूर हुए। 

सिंगापुर में कुश्ती     
दारा सिंह का कहना था, ‘सिंगापुर में कुश्ती का खेल बहुत पसंद किया जाता था। वहां ‘हैप्पी वर्ल्ड’ और ‘ग्रेट वर्ल्ड’ नाम के दो मशहूर अखाड़े थे। मेरी कद-काठी और पहलवानी के शौक को देखकर लोगों ने मुझे प्रोफेशनल पहलवान बनने के लिए प्रेरित किया। मैं छह महीने तक ‘हैप्पी वर्ल्ड’ के एक उस्ताद जी की मालिश करता रहा लेकिन मुझे वहां कुश्ती लड़ने का मौका ही नहीं दिया गया। फिर एक दिन ‘ग्रेट वर्ल्ड’ अखाड़े के उस्ताद हरनाम सिंह जी ने मुझे अपना शागिर्द बना लिया। पहलवानी के लिए अपने दम पर जरूरी खुराक का इंतजाम कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था, लेकिन सिंगापुर में रह रहे पंजाबियों की मदद से ये समस्या भी हल हो गई।’
तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद दारा सिंह ने सबसे पहले 1950 में मलेशियन चैंपियनशिप जीती। फिर इंडोनेशिया और बर्मा में कुश्तियां लड़ीं। लेकिन उनका नाम तब हुआ जब उन्होंने 1951 में श्रीलंका में हुए मुकाबले में हंगरी के रहने वाले मशहूर पहलवान किंगकांग को हराया। 1953 में डेढ़ सौ पहलवानों के बीच लगातार तीन साल तक चले मुकाबलों के फाइनल में टाइगर जोगिंदर को हराकर वो भारत के चैंपियन बने। उसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप जीती और फिर 1968 में अमेरिका के पहलवान को हराकर वो वर्ल्ड चैंपियन बन गए। इससे पहले भारत के सिर्फ गामा पहलवान ने ये खिताब जीता था। दारा सिंह ने 1983 में कुश्ती से संन्यास लिया था और तब तक वर्ल्ड चैंपियन का ये खिताब उन्हीं के पास रहा।

परदे पर कुश्ती
दारा सिंह का फिल्मों में आना भी अचानक और बिना किसी योजना के हुआ। दरअसल 1954 में बनी फिल्म ‘पहली झलक’ में एक सीन था जिसमें ओमप्रकाश सपना देखते हैं कि वो दारा सिंह के साथ कुश्ती लड़ रहे हैं। दारा सिंह को न तो अभिनय करना था और न ही कोई संवाद बोलना था, इसीलिए वो सीन बिना किसी परेशानी के ओके हो गया। करीब 6 साल के बाद उन्हें एक बार फिर से 1960 की फिल्म ‘भक्तराज’ में दादा भगवान के साथ कुश्ती लड़ने का ऑफर मिला। लेकिन इस बार उन्हें छोटे-छोटे 4-5 संवाद भी बोलने थे।
दारा सिंह का कहना था, ‘मैं संवाद बोल ही नहीं पा रहा था जिसकी वजह से रीटेक पर रीटेक होते जा रहे थे। आखिर में निर्देशक ने कहा, आप कुश्ती लड़ते रहो और गलत-सही जैसा भी हो बोल दो, हम किसी और से डब करा लेंगे। मुझे समझ ही नहीं आया कि ये डब करना क्या होता है। मेरे साथी पहलवान ने कहा, तुझे कौन सा हीरो बनना है, काम कर और भूल जा। और मैं सब भूलकर फिर से पहलवानी में जुट गया।’

फिल्मी पारी
दारा सिंह का फिल्मी सफर सही मायनों में 60 के दशक के साथ शुरू हुआ जब निर्माता देवी शर्मा ने उनसे कुश्तियों पर बनने जा रही अपनी फिल्म के लिए संपर्क किया। दारा सिंह ने बताया था, ‘मैंने देवी शर्मा जी से कहा, एक्टिंग मेरे बस की बात नहीं है। उन्होंने जवाब दिया आप बस हां कह दीजिए, एक्टिंग तो हम करा लेंगे। मुझे डर था कि कहीं लोग मजाक न उड़ाएं कि लो, पहलवान चला हीरो बनने। और वैसे भी हम पहलवानों के लिए फिल्म देखना तक वर्जित था। उस्ताद कहते थे कि ये तमाशबीनों का काम है। लेकिन दूसरी तरफ गामा पहलवान का उदाहरण हमारे सामने था जिनका बुढ़ापा बहुत बुरे हालात में गुजरा था। उधर, कोल्हापुर के नामी बुलेट पहलवान को भी अपने आखिरी दिनों में तांगा चलाना पड़ा था। सो इस डर से कि बुढ़ापे के लिए कोई इंतजाम नहीं किया तो कहीं मेरा हाल भी और पहलवानों जैसा न हो जाए, मैंने शर्माजी को हां कह दी। साल 1962 की वो फिल्म ‘किंगकांग’ सुपरहिट रही और मेरे पास निर्माता-निर्देशकों की कतार लग गई।’

पहले पहलवानी, फिर फिल्म
फिल्म का प्रस्ताव लेकर आने वाले तमाम निर्माता-निर्देशकों के सामने दारा सिंह ये शर्त रखते थे कि पहलवानी से समय मिलेगा तभी वो शूटिंग पर आएंगे और उनकी शर्त मान ली जाती थी। दारा सिंह के अनुसार, ‘भाषा मेरी माशाअल्लाह, सो उर्दू और हिंदी सिखाने के लिए उस्ताद रखे गए। ‘किंगकांग’ की रिलीज के बाद मुझे एक प्रशंसक का खत मिला जिसमें लिखा था, ‘तुम भारत के भीम हो, बजाते क्यों बीन हो?’ इस व्यंग्य ने कुश्ती का वर्ल्ड चैंपियन बनने की मेरी जिद को और मजबूती दी और मैंने ये जिद 1968 में पूरी कर ही ली।’

80 फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं
दारा सिंह ने ‘किंगकांग’, ‘सैमसन’, ‘महाभारत’, ‘शेरदिल’, ‘लुटेरा’, ‘ठाकुर जरनैलसिंह’, ‘संगदिल’, ‘नसीहत’, ‘बलराम श्रीकृष्ण’, ‘द किलर्स’, ‘तुलसी विवाह’, ‘हर- हर महादेव’, ‘जय बोलो चक्रधारी’ और ‘हरिदर्शन’ जैसी करीब 80 फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं कीं। इनमें ज्यादातर स्टंट और कुछ धार्मिक फिल्में थीं। 1982 में बनी ‘रूस्तम’ बतौर नायक दारा सिंह की आखिरी फिल्म थी जिसके बाद वो चरित्र भूमिकाएं करने लगे थे।

आखिर में चरित्र अभिनेता
दारा सिंह के शब्दों में, ‘1985-86 में प्रदर्शित हुई फिल्मों ‘मर्द’ और ‘कर्मा’ से मैं चरित्र अभिनेता बना। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर प्रदर्शित हुए रामानंद सागर के मेगाहिट सीरियल ‘रामायण’ में हनुमान के रोल में दर्शकों ने मुझे बहुत पसंद किया। ये मेरा पहला सीरियल था। आगे चलकर मैंने ‘विक्रम और वेताल’, ‘लवकुश’, ‘नीयत’, ‘तकदीर’, ‘हद कर दी’ और ‘क्या होगा निम्मो का’ जैसे कई और सीरियलों में काम किया।’

पारिवारिक जीवन
दारा सिंह की 2 शादियां हुई थीं। उनकी पहली शादी 1937 में महज 9 साल की उम्र में कर दी गई थी। लेकिन पहली पत्नी से कुछ सालों बाद उनका तलाक हो गया। उस शादी से दारा सिंह का एक बेटा प्रद्युम्न सिंह हैं, जिनका जन्म 1945 में हुआ था। प्रद्युम्न ने रामानंद सागर की फिल्म ‘आंखें’ में अकरम नाम के किरदार से अभिनय की शुरुआत की थी। 1969 में बनी फिल्म ‘बंदिश’ में वो ‘शैलेंद्र’ के नाम से सोनिया साहनी के अपोजिट हीरो बनकर आए। ‘बंदिश’ गायक जसपाल सिंह की भी डेब्यू फिल्म थी, जो आगे चलकर फिल्म ‘गीत गाता चल’ के गीतों से मशहूर हुए। प्रद्युम्न ने 1971 की ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ में भी एक रोल किया था। प्रद्युम्न अब मेरठ में रहते हैं।
दारा सिंह की दूसरी शादी मई 1961 में अमृतसर की सुरजीत कौर औलख से हुई। इस शादी से उनकी तीन बेटियां कमल, लवलीन, दीपा और दो बेटे विरेंदर सिंह और अमरीक सिंह हैं। विरेंदर सिंह भी अभिनेता हैं और विन्दु के नाम से मशहूर हैं। दारा सिंह के छोटे भाई सरदारा सिंह भी पहलवानी में नाम कमाने के बाद फिल्मों में आ गए थे। उन्होंने ‘रंधावा’ के नाम से अपनी पहचान बनाई थी। उन्होंने अभिनेत्री मुमताज की छोटी बहन मल्लिका से शादी की। रंधावा और मल्लिका के अभिनेता बेटे शाद रंधावा ‘वो लम्हे’, ‘आवारापन’, ‘आशिकी-2’ और ‘मस्तीजादे’ जैसी कुछ फिल्मों में काम कर चुके हैं।        

सिंटा के अध्यक्ष   
दारा सिंह ने ‘नसीहत’, ‘नानक दुखिया सब संसार’, ‘मेरा देश मेरा धरम’, ‘किसान और भगवान’, ‘धन्ना जट्ट’, ‘करण’ और ‘रूस्तम’ जैसी करीब एक दर्जन हिंदी और पंजाबी फिल्मों का निर्माण भी किया। ‘महावीरा’, ‘ऐलाने जंग’, ‘अजूबा’, ‘अनमोल’, ‘दिल्लगी’, ‘कहर’, ‘कल हो न हो’, ‘जब वी मेट’ समेत 50 से ज्यादा फिल्मों में वो बतौर चरित्र अभिनेता नजर आए। 2012 में प्रदर्शित हुई ‘अता पता लापता’ उनकी आखिरी फिल्म थी। दारा सिंह कई साल ‘सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन’ (सिंटा) के अध्यक्ष भी रहे।  उनका निधन 12 जुलाई 2012 को मुंबई में हुआ। 



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