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मंगलवार, 25 सितंबर 2018

हरि काका बन गए संजीव

संजीव कुमार का वास्तविक नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था। सूरत में जन्म लेकर आरंभिक सात वर्ष वहां गुजारने के बाद संजीव कुमार का परिवार मुंबई शिफ्ट हो गया। अभिनय का शौक जागने पर संजीव कुमार ने इप्टा के लिए स्टेज पर अभिनय करना शुरू किया इसके बाद वे इंडियन नेशनल थिएटर से जुड़े। ‘हम हिंदुस्तानी’ (1960) संजीव कुमार की पहली फिल्म थी। उन्होंने कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई।

दिलीप कुमार हुए प्रभावित
 1968 में रिलीज हुई 'राजा और रंक' की सफलता ने संजीव कुमार के पैर हिंदी फिल्मों में मजबूती से जमा दिए। संघर्ष (1968) में वे दिलीप कुमार के साथ छोटे-से रोल में नजर आए। छोटी सी भूमिका में उन्होंने बेहतरीन अभिनय कर अपनी छाप छोड़ी। दिलीप कुमार उनसे बेहद प्रभावित हुए।

जवानी में बूढ़े का रोल
संजीव कुमार उम्रदराज व्यक्ति की भूमिका निभाने में माहिर समझे जाते थे। 22 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने एक नाटक में बूढ़े का रोल अदा किया था। कई फिल्मों में उन्होंने अपनी उम्र से अधिक उम्र वाले व्यक्ति के किरदार निभाए और काफी पसंद किए गए।

गुलजार के साथ जोड़ी
1972 में गुलजार ने संजीव कुमार की फिल्म 'सुबह-ओ-शाम' देखी। संजीव से वे बेहद प्रभावित हुए। इसके बाद गुलजार और संजीव कुमार ने मिलकर ‘कोशिश’ (1973), ‘आंधी’ (1975), ‘मौसम’ (1975), ‘अंगूर’ (1980), ‘नमकीन’ (1982) जैसी बेहतरीन फिल्में दीं।

नूतन का थप्पड़
एक बार नूतन ने संजीव कुमार की गाल पर थप्पड़ रसीद दिया था। दरअसल नूतन और संजीव के बीच रोमांस की खबरें फैल रही थीं, जिससे नूतन के वैवाहिक जीवन में खलबली मच गई थी। नूतन को लगा कि संजीव इस तरह की बातें फैला रहे हैं, लिहाजा आमना-सामना होने पर उन्होंने संजीव को थप्पड़ जमा दिया।

फिल्म एक, किरदार नौ
‘नया दिन नई रात’ (1974) में संजीव कुमार ने नौ भूमिका अदा की और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। संजीव कुमार ने अपने करियर में हर तरह की फिल्में की। वे सिर्फ हीरो ही नहीं बनना चाहते थे। उनका मानना था कि कलाकार किसी भी भूमिका को अपने अभिनय से बेहतरीन बना सकता है और रोल की लंबाई कोई मायने नहीं रखती।

47 वर्ष ही जी पाए
संजीव कुमार के परिवार में कोई भी पुरुष 50 वर्ष से ज्यादा नहीं जी पाया। संजीव को भी हमेशा महसूस होता था कि वे ज्यादा नहीं जी पाएंगे। उनके छोटे भाई नकुल की मृत्यु संजीव के पहले हो गई। ठीक 6 महीने बाद बड़ा भाई किशोर भी चल बसा। संजीव कुमार ने भी 47 वर्ष की आयु में ही 6 नवंबर 1985 को इस दुनिया को अलविदा कहा।

इस तरह बने शोले के ‘ठाकुर’
फिल्म में ‘शोले’ ने संजीव कुमार ने ठाकुर का रोल निभाया था। यह रोल धर्मेंद्र करना चाहते थे। निर्देशक रमेश सिप्पी उलझन में पड़ गए। उस समय धर्मेंद्र हेमा मालिनी के दीवाने थे और संजीव कुमार भी। रमेश सिप्पी ने धर्मेंद्र से कहा कि तुमको वीरू का रोल निभाते हुए ज्यादा से ज्यादा हेमा के साथ रोमांस करने का मौका मिलेगा। यदि तुम ठाकुर बनोगे तो मैं संजीव कुमार को वीरू का रोल दे दूंगा। ट्रिक काम कर गई और धर्मेंद्र ने यह जिद छोड़ दी। ठाकुर के रोल के कारण संजीव कुमार को आज तक याद किया जाता है।

दोस्तों की तिकड़ी
शत्रुघ्न सिन्हा, सचिन और अमिताभ बच्चन से संजीव कुमार की बहुत अच्छी दोस्ती थी। उनके साथ अभिनय करने वाला ज्यादातर कलाकारों का मानना था कि वे सीन चुरा कर ले जाते हैं। कहा जाता है कि 'विधाता' में संजीव कुमार भारी न पड़ जाएं, इसीलिए दिलीप कुमार उनके साथ शॉट देने से बचते थे।

दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता
संजीव कुमार को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। एक बार ‘दस्तक’ (1971) के लिए और दूसरी बार ‘कोशिश’ (1973) के लिए। 14 बार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए संजीव कुमार नॉमिनेट हुए। दो बार उन्होंने बेस्ट एक्टर (‘आंधी’-1976 और ‘अर्जुन पंडित’-1977) का और एक बार बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (शिकार-1969) का अवॉर्ड जीता।

देहांत के बाद भी फिल्में
सूरत में एक सड़क और एक स्कूल का नाम संजीव कुमार के नाम पर रखा गया। 2013 में एक डाक टिकट भी संजीव कुमार की याद में जारी किया गया। संजीव कुमार की मृत्यु के बाद उनकी दस से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित हुईं। अधिकांश की शूटिंग बाकी रह गई थी। कहानी में फेरबदल कर इन्हें प्रदर्शित किया गया। 1993 में संजीव कुमार की अंतिम फिल्म 'प्रोफेसर की पड़ोसन' प्रदर्शित हुई। 



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