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रविवार, 16 जून 2019

आधी दुनिया के सवाल

नमिता सिंह की यह किताब महिलाओं से जुड़े ऐसे ही कुछ यक्ष प्रश्नों को दर्ज करने की कोशिश करती है

अगर हम देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं की बात करें तो उसके सामने यक्ष प्रश्नों का भंडार है। उनके जीवन से जुड़े इन सवालों के जवाब सदियों से अनसुलझे हैं और अब भी सही समाधान की तलाश में हैं। नमिता सिंह की यह किताब महिलाओं से जुड़े ऐसे ही कुछ यक्ष प्रश्नों को दर्ज करने की कोशिश करती है। नमिता ने सवाल तो बहुत बुनियादी उठाए हैं, लेकिन जरा लचर तरीके से।
उत्तर भारत की जाति पंचायतों ने महिलाओं के जीवन को और ज्यादा संकटमय बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिन पंचायतों का निर्माण समाज में न्याय की स्थापना के लिए किया गया था, वे महिलाओं के मामले में अक्सर ही बेहद अन्याय भरे निर्णय लेती हुई नजर आती हैं। नमिता बहुत सारी पंचायतों के महिलाओं से जुड़े क्रूर निर्णयों के उदाहरण देते हुए अपनी बात कहती हैं।
वे लिखती हैं,‘शर्मनाक घटनाओं पर भी राष्ट्रीय शर्म की बात तब बनती है, जब खाप-पंचायतें समाधान हेतु अपना फरमान सुनाती हैं। खाप पंचायतें ऐसी हिंसक अमानवीय घटनाओं के गुनहगारों के लिए कोई सजा, बहिष्कार नहीं सुझातीं। ...खाप पंचायत जैसे जाति-धर्म आधारित सामाजिक समूह जो अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, उन्हें प्रतिबंधित किया जाए, उनकी वैधता भंग की जाए।’ खासतौर से महिलाओं से जुड़ी किसी भी समस्या के मामले में पूरा समाज, सारी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन के सिर पर डालकर निश्चिंत सा बैठा नजर आता है। लेखिका इस बारे में काफी साफ हैं कि महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य या सम्मान से जुड़ी समस्याएं समाज के स्तर पर ही ठीक की जा सकती हैं। और यह कुछ सालों का नहीं, बल्कि सदियों तक चलने वाला प्रयास है, जिसकी शुरूआत आज ही होनी चाहिए और अनवरत चलना चाहिए।
किताब में कुछ ऐसे भी लेख हैं, जो अपने शीर्षक से जैसी अपेक्षा जगाते हैं, उस पर जरा भी बात नहीं करते। महिलाओं से जुड़े गंभीर सवालों पर यह किताब एक विमर्श को आगे बढ़ाने की दरकार जरूर पूरा करती है, पर उसे बहुत आगे नहीं ले जा पाती है।



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