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मंगलवार, 18 जून 2019

वृंदावन में विधवा माताओं की ग्रीन दिवाली - सूखे पेड़ में हरी पत्तियां जीवन में एक नया उल्लास, नई उमंग इन्हें भी है जीने एवं खुशियां मनाने का अधिकार

वृंदावन की विधवा माताओं ने सुलभ के अंदाज में दिवाली मनाई। इस दौरान सभी के चेहरे पर खिली मुस्कान ने एक हरी-भरी, पर्यावरण के अनुकूल दिवाली मनाने का संदेश पूरे देश को दिया

हवा में फूलों की एक मिठी महक थी। मिट्टी के दीयों के साथ चमकदार रोशनी हर तरफ जगमगा रही थी। दूर से ही मंत्रमुग्ध कर देने वाले भजन कानों तक पहुंच रहे थे। हर तरफ हंसी थी, खुशी थी। हर चेहरे पर एक चमकीली और खूबसूरत मुस्कुराहट थी। यह शाम किसी परीकथा से कम नहीं थी। और यह ऐसा हो भी क्यों न? आखिरकार यह वाकई एक विशेष दिन था। यह वृंदावन की विधवा माताओं की ‘ग्रीन दिवाली’ का उत्सव जो था।
लगातार छठे साल वृंदावन की हजारों विधवा माताएं प्रकाश का उत्सव मना रही थीं। पहली बार ऐसा था कि पटाखे जलाने की बजाय विधवा माताओं ने खुशियों की फुलझड़ी जलाई। दिवाली मनाने का यह नया विचार सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक का है। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक एक समाज सुधारक हैं, जिनके प्रयासों से ही किसी भी पवित्र उत्सव में विधवा माताओं के भाग न लेने की लंबे समय से चली आ रही प्रथा छह वर्ष  पहले टूटी थी।

पटाखे नहीं, खुशियों की फुलझड़ी
इस अवसर पर अपना संदेश देते हुए डॉ. पाठक ने कहा, ‘हम सभी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण पर काबू पाने लिए पटाखों पर आंशिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। इसीलिए मैंने सोचा कि हमें दिवाली मनाने के लिए पटाखों की जरूरत ही नहीं है, इसके बदले में हम लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट ला सकते हैं और अपने परिवेश को उल्लास से भर सकते हैं। इसीलिए यहां हमने प्रकाश के त्योहार को इको-फ्रेंडली तरीके से मनाने की पहल की है। फायर क्रैकर्स के स्थान पर हमने संगीत से भरी एक शाम का आयोजन किया, जहां भजनों की धुन, मिट्टी के दीपक की रोशनी और लोगों के चेहरे पर छाई खुशियों ने इसे यादगार बना दिया।’
पारिस्थितिकी के अनुकूल दिवाली मनाने की प्रेरक पहल ने पूरे देश को रास्ता दिखाया है कि अगर लोगों के चेहरों पर उज्ज्वल और चिर मुस्कान है तो पटाखों के बिना भी दिवाली बहुत प्रकाशमय हो सकती है। इस अवसर पर जिस तरह विधवा माताओं ने भजन गाए, नृत्य किया, दीए जलाए और रोशनी के उत्सव को पूर्ण उत्साह से मनाया, वह यादगार क्षण था।

उदास जीवन में रोशनी भरना
दिवाली आंतरिक प्रकाश को उभारने का प्रतीक है, जो हमें अंधेरे और बुराई से बचाती है। वृंदावन के ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर में यही हुआ। इस दुनिया में हर दुखी आत्मा की देखभाल भगवान और उनके फरिश्ते करते हैं। इन विधवा माताओं के लिए डॉ. विन्देश्वर पाठक ऐसे ही फरिश्ते हैं। उन्होंने इन महिलाओं के उदास और दुखी जीवन में रोशनी भर दी है। वे उनके साथ मिलते हैं, उनकी परेशानियों को सुनते हैं, उनके दुख-दर्द को साझा करने के लिए हाथ बढ़ाते हैं और उन्हें अंधेरे से बाहर निकाल लेते हैं। उन्होंने उन्हें समाज के बुरे रीति-रिवाजों से बचाया है।
इस अवसर पर सुलभ प्रणेता ने कहा, ‘हमारे समाज में कुछ रीति-रिवाज बहुत बुरे हैं। विधवाओं से जुड़े रीति-रिवाज या टैबू उनमें से ही एक है। अगर किसी व्यक्ति की पत्नी का देहांत हो जाता है, तो वह अपने जीवन को पूर्ण आनंद के साथ आगे ले जाने के लिए स्वतंत्र है। पर यदि कोई महिला विधवा हो जाती है तो उसे एकांत और प्रतिबंधों से लदा जीवन जीने के लिए विवश कर दिया जाता है। उसे हंसने, गाने या नृत्य करने की अनुमति नहीं है। वह सिर्फ भगवान के नाम का जप करने और अपनी मृत्यु का इंतजार करने के लिए जिंदा रहती है।’
उन्होंने कहा, ‘हमने इन विधवा माताओं को बताया कि उनके पास भी खुशहाली से जीवन जीने का अधिकार है। आप को भी हंसना, नृत्य करना और गाना चाहिए। आज हम यहां हैं। सारी विधवा माताएं दिवाली मना रही हैं। उन्हें पहले दिवाली मनाने, दीये जलाने या होली खेलने की इजाजत नहीं थी। अब वे यह सब खुशी-खुशी कर रही हैं।’
इस अवसर पर मौजूद सबसे उम्रदराज विधवा माता कनक लता ने कहा, ‘लाल बाबा (डॉ. पाठक) ने हमें सच्ची खुशी के साथ आशीर्वाद दिया है। पहले हमारे जीवन में काफी दुख-दर्द थे। भगवान ने हमारे अंधेरे जीवन में प्रकाश लाने के लिए लाल बाबा को भेजा है। हम गरीब लोग हैं। हम आज सामान्य रूप से रह रहे हैं। इससे अधिक खुशी हमें नहीं मिल सकती थी। यह हमारे लिए सच में शांति पाने जैसा है। जय लाल बाबा, जय गोपीनाथ। भगवान ने पाठक जी को हमारे लिए भेजा है।’ कनक लता की उम्र 100 साल से अधिक है, लेकिन वह अब भी पूरे उत्साह से दिवाली हजारों लोगों के साथ मनाती हैं।

भगवान ने डॉ. पाठक के रूप 
में भेजा फरिश्ता - ओ. पी. यादव

इस अवसर पर वृंदावन के पूर्व डीपीओ ओम प्रकाश यादव भी उपस्थित थे, जो इन विधवा माताओं को खुशियां मनाते देख आनंद से भर गए थे। उन्होंने बताया कि 2011 में जब उन्होंने डीपीओ के रूप में प्रभार संभाला, उस समय इन विधवा माताओं की हालत दयनीय थी। वे आश्रय घरों में रहती थीं और उन्हें अपने पेट भरने के लिए बहुत काम करना पड़ता था।
पूर्व वृंदावन डीपीओ ने याद करते हुए कहा, ‘एक दिन मुझे एंबुलेंस की जरूरत थी, लेकिन दो दिनों तक कोई भी सुविधा नहीं मिली। मैंने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की और सवाल किया कि जब मैं एंबुलेंस की व्यवस्था करने में भी सक्षम नहीं हूं, तो मुझे यहां क्यों भेजा गया है? लेकिन जैसा कि लोग कहते हैं कि भगवान के अपने तरीके होते हैं। भगवान कृष्ण, कुछ लोगों या अन्य स्रोतों के माध्यम से लोगों की समस्याओं को हल करते हैं। वह अपना काम करने के लिए फरिश्तों को भेजते हैं।’
उन्होंने आगे कहा, ‘इन सभी परेशानियों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस अॉर्गेनाइजेशन से पूछा जाए कि क्या वह इन विधवा माताओं को भोजन की सुविधा प्रदान कर सकता है। डॉ. विन्देश्वर पाठक ने तुरंत इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। ऐसा लगता है कि भगवान कृष्ण ने इन विधवा माताओं की दुर्दशा को सुधारने के लिए डॉ. पाठक को भेजा है।"
यादव ने कहा कि डॉ. पाठक जब वृंदावन आए, इन विधवा माताओं से मुलाकात की, उनकी परेशानियों को सुना और उनकी आवश्यकताओं का अध्ययन किया तो पहले दिन ही उन्होंने इन माताओं को पांच एंबुलेंस उपहार में दिए। इसके बाद उन्होंने कई और पहल शुरू की। इससे भोजन के साथ सिलाई मशीन आदि जैसी सुविधाएं और मदद इन माताओं तक पहुंची। उनके ही शब्दों में, ‘हम यहां एक एंबुलेंस के लिए लालायित थे और अचानक पांच मिल गईं थीं। चुटकी में ही यह समस्या खत्म हो गई। पूरा परिदृश्य बदल गया है और यह हमारी आंखों के सामने है। यहां कुछ समय पहले ही मैंने उस विधवा माता को देखा है, जिसकी उम्र 100 साल से अधिक है। वह आनंद, खुशी और हंसी के साथ पल बिता रही हैं। 90 वर्ष की एक और विधवा माता मेरे बगल में नृत्य कर रही थीं। कौन सोच सकता था कि दुख भरे वर्षों को इस तरह इतनी जल्दी मिटा दिया जा सकता है? यह केवल डॉ. पाठक के प्रयासों के कारण ही संभव हो पाया है। मुझे यकीन है कि सुलभ उन्हें और भी ऊंचाइयों तक ले जाएगा।’

पीली पत्तियां फिर से हरी हो गईं
इस मौके पर डॉ. पाठक ने बताया कि 2012 से पहले इन विधवाओं को दो जून का खाना मांग कर जुटाना पड़ता था। उन्हें भजन गाने पर केवल 4 से 8 रुपए मिलते थे। उनके लिए कोई चिकित्सा की सुविधा नहीं थी। 
सबसे बुरी बात यह थी कि मृत्यु के बाद उनके शरीर को बोरों में भर यमुना नदी में फेंक दिया जाता था। क्योंकि उनके अंतिम संस्कार के लिए कहीं से कोई आर्थिक मदद नहीं थी। विधवा माताओं की यह दुखद स्थिति ‘द हिंदू’अखबार में प्रकाशित हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया। 
सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) से पूछा कि सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन, जो कि एक एक गैर-लाभकारी स्वैच्छिक परोपकार सामाजिक संगठन है, क्या इन माताओं के भोजन की जिम्मेदारी उठा सकता है?
डॉ. पाठक ने कहा, ‘फिर मुझे उनसे एक पत्र प्राप्त हुआ। मैंने कहा कि यह एक अच्छा अवसर है। 2012 में मैं वृंदावन आया, इन माताओं से मुलाकात की। वे अपने दुख व्यक्त करने के लिए रोती थीं। यहां तक कि मैं कई बार उनकी परेशानियां सुनकर रोया। वे सभी कहती थीं कि वे मरना चाहती हैं। इसके बाद मैंने न केवल उनके लिए भोजन सुनिश्चित किया, बल्कि एंबुलेंस सुविधाएं, शिक्षा के अवसरों, फ्रिज, टीवी इत्यादि भी प्रदान किए। मैं उन्हें कई जगहों पर ले गया, उनसे उनके जीवन में घर बना लेने वाले एकांत को दूर करने के लिए त्योहारों का जश्न मनाने का आग्रह किया।’
2012 में सुलभ ने विधवा माताओं को फिर से अपनी जिंदगी जीने में मदद की। उन्हें वो खुशी मिलने लगी जो किसी को अपने माता-पिता के घर में मिलती है। उस दिन से  इन विधवा माताओं ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
डॉ. पाठक मुस्कुराते हुए कहते हैं, ‘ये पत्तियां सूख गई थीं, लेकिन हमने इनमें हरियाली बहाल कर दी है। यह किसी रोने वाले व्यक्ति को हंसाने जैसा है। हमारी मां और बहनें जो विधवा हो गई थीं, एक साथ दिवाली मना रही हैं। यह हम सभी के लिए एक सुखद अवसर है। इस खुशी को व्यक्त करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है, मैं उन्हें खुश देख रहा हूं।’ 



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