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शनिवार, 19 अगस्त 2017

सर्वे भवंतु सुखिन: 

बेदाग, निष्पक्ष और कर्मठ व्यक्तित्व के धनी देश के नवनिर्वाचित महामहिम पुरानी महान लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करने के साथ एक नई इबारत लिखने की तैयारी में हैं

‘मिट्टी के घर में पलकर और गरीबी से उठ कर आज यहां तक पहुंचा हूं। राष्ट्रपति भवन में ऐसे गरीबों का प्रतिनिधि बनकर जा रहा हूं। इस पद पर चुना जाना न कभी मैंने सोचा था और न कभी मेरा लक्ष्य था, लेकिन देश के लिए अथक सेवा भाव मुझे यहां तक ले आया। इस पद पर रहते हुए संविधान की रक्षा करना और उसकी मर्यादा बनाए रखना मेरा कर्तव्य है। राष्ट्रपति पद पर मेरा चयन भारतीय लोकतंत्र की महानता का प्रतीक है। मैं देश के लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की तरह मैं भी बिना भेदभाव के देश की सेवा में लगा रहूंगा।’ देश के 14वें राष्ट्रपति चुने जाने के बाद रामनाथ कोविंद ने जब ये बातें कहीं, तो साफ हो गया कि राष्ट्रपति भवन में बैठ कर वे गरीबों और वंचितों के हित में सदैव सक्रिय रहेंगे। बेदाग, निष्पक्ष और कर्मठ व्यक्तित्व के धनी देश के नवनिर्वाचित महामहिम पुरानी महान लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करने के साथ एक नई इबारत लिखने की तैयारी में हैं, इसीलिए उन्होंने यह भी कहा, 'जिस पद का मान डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी जैसे महान विद्वानों ने बढ़ाया है, उस पद के लिए मेरा चयन मुझे बहुत बड़ी जिम्मेदारी का अहसास करा रहा है।' यह कोविंद के स्वभाव और छवि की ही देन है कि राष्ट्रपति के रूप में उनके निर्वाचित होने की खबर आते ही पूरे देश में खुशी की लहर फैल गई। सबसे ज्यादा हर्ष तो उन ग्रामीण अंचलों में देखने को मिला, जिनके बीच से निकल कर एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद को सुशोभित करने जा रहा है। कोविंद इसे ही भारतीय लोकतंत्र की महानता कहते हैं।   

व्यवहार में बेहद सौम्य और शालीन रामनाथ कोविंद ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बेहतरी और दलितों के उत्थान के लिए काम करते रहे हैं। दलित नेता होने के साथ वे स्वभाव से काफी मिलनसार हैं और उनका हमेशा से ही संगठित होकर काम करने में विश्वास रहा है। राज्यसभा में सांसद रहते हुए रामनाथ कोविंद ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विकास और विस्तार के लिए सबसे ज्यादा कार्य किया। उनके 12 साल के सांसद निधि के रिकार्ड को जब देखा गया तो यह तथ्य सामने आया कि उन्होंने सांसद निधि का अधिकतर पैसा गांवों में शिक्षा के क्षेत्र पर खर्च किया है। देश के दलितों की भलाई के लिए वे हमेशा तत्पर रहने वाले नेताओं में रहे। उन्होंने ही एक बार 1000 के नोट पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर छापने की मांग की थी। भाजपा में होने के साथ वे पार्टी के दलित मोर्चा के प्रमुख भी रहे। जहां राजभवन हमेशा से ही राजनीतिक पार्टियों की लड़ाई का अखाड़ा बना रहता है, वहीं बिहार के राज्यपाल के तौर पर उनकी भूमिका की सराहना सभी ने की। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद को निष्पक्ष और सबसे बेहतरीन राज्यपाल की संज्ञा दी। रामनाथ कोविंद बहुत शांत स्वभाव के हैं, लेकिन जब कोई सार्वजनिक कार्यक्रम या फिर किसी निर्णय लेने की बात आती है तो वे हमेशा रुल बुक के मुताबिक ही निर्णय लेते हैं। उनके लिए नियम से ऊपर कोई नहीं है।  

बिहार के राज्पाल पद पर रहने के दौरान उन्होंने विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर सुधार किया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2012-13 में उप-कुलपतियों की नियुक्ति रद्द होने के बाद राज्यपाल बने कोविंद ने नियुक्तियों में  न सिर्फ पारदर्शिता बरती, बल्कि  विश्वविद्यालयों के शैक्षिक कैलेंडर में भी सुधार किया और इसे सख्ती से लागू किया। वर्षांे से बंद दीक्षांत समारोह को उन्होंने अपनी देख-रेख में फिर से शुरू भी करवाया। शालीन और सौम्य व्यक्तित्व के रामनाथ कोविंद चार दशक से भी ज्यादा वक्त से राजनीति और सेवा कार्यों में लगातार सक्रिय हैं। कर्मठ, कर्मनिष्ठ, कर्तव्य पारायण और कृतसंकल्पित कोविंद व्यवहार कुशल भी हैं। कानपुर के परौंख गांव से रायसीना तक पहुंचना, एक साधारण व्यक्ति और समर्पित कार्यकर्ता की असाधारण उपलब्धियों और सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने की ऐसी कहानी है जो सभी के लिए प्रेरणादायक है। उनका बचपन गरीबी में गुजरा, पर इन सभी मुसीबतों को भेदते हुए वे आज उस मुकाम पर खड़े हैं, जहां उनकी कलम से भारत की तकदीर लिखी जाएगी। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘मुझे ये जिम्मेदारी दिया जाना देश के ऐसे हर व्यक्ति के लिए संदेश है जो ईमानदारी और प्रमाणिकता के साथ अपना काम करता है। इस पद पर चुना जाना न ही मेरा लक्ष्य था और न ही मैंने सोचा था, लेकिन अपने समाज और देश के लिए अथक सेवा भाव मुझे यहां तक ले आया है, यही सेवा भाव का ही नतीजा है।’

साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले रामनाथ कोविंद समाज सेवी, वकील, राज्यसभा सांसद और राज्यपाल  के तौर पर काम कर चुके हैं। कानपुर देहात की डेरापुर तहसील के गांव परौंख में जन्मे रामनाथ कोविंद ने सुप्रीम कोर्ट में वकालत से अपने करियर की शुरुआत की थी। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव बने थे। उन्होंने जनता पार्टी की सरकार में सुप्रीम कोर्ट के जूनियर काउंसलर के पद पर भी कार्य किया। इसके बाद वे भाजपा नेतृत्व के संपर्क में आए। वर्ष 1994 से 2006 के बीच दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुके रामनाथ कोविंद दो बार भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व राष्ट्रीय प्रवक्ता और उत्तर प्रदेश के महामंत्री भी रह चुके हैं। इससे पूर्व उन्होंने दिल्ली में रहकर आईएएस की परीक्षा पास की, मुख्य सेवा के बजाय एलायड सेवा में चयन होने पर नौकरी ठुकरा दी। इसी तरह अपनी राह में आए तमाम अवरोधों से पार पाते हुए रामनाथ कोविंद ने सबसे पहले गरीबी को पछाड़ते हुए वकालत की शिक्षा पूरी की। नामी वकील बने तो भी वे नेकदिल बने रहे। 

गरीबी की वजह से बचपन में रामनाथ कोविंद 6 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे और फिर पैदल ही वापस घर लौटते थे। घास-फूस की झोपड़ी में उनका पूरा परिवार रहता था। जब कोविंद की उम्र 5-6 वर्ष की थी तो उनके घर में आग लग गई, जिसमें उनकी मां की मृत्यु हो गई। मां का साया छिनने के बाद पिता ने ही उनका लालन-पालन किया। देश के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बारिश के दिनों में टपकती  अपनी फूस की छप्पर को कभी नहीं भूले। भीगने से बचने के लिए अपने भाई बहनों के साथ मिट्टी की दीवारों से चिपककर बारिश के खत्म होने का इंतजार करना उन्हें आज भी याद है। राष्ट्रपति भवन में बैठ कर जब अपनी कलम से वे देश का भविष्य रचेंगे, उनकी ये यादें हमेशा उनके साथ होंगी।  



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