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गुरुवार, 20 जून 2019

ऑस्कर वाइल्ड - झूठी नैतिकता की धज्जियां उड़ाने वाला लेखक

19वीं सदी ब्रिटिश औपनिवेशिकता के साथ उनकी सांस्कृतिक दुर्दशा की भी सदी रही है। साहित्य में यह बात सबसे तीखे ढंग से ऑस्कर वाइल्ड ने कही थी। इस रचनात्मक साहस ने ही उन्हें साहित्य की दुनिया में अमर बना दिया

कई बार लोग जब आपके चरित्र के बारे में टिप्पणी करते तो कह जाते हैं कि तुम लॉर्ड हेनरी की तरह हो। हमेशा गलत ही बोलते हो, पर कभी गलत करते नहीं। दरअसल, हेनरी ऑस्कर वाइल्ड की किताब का एक पात्र है। खासतौर पर एक युवा होते दिमाग के लिए ऑस्कर वाइल्ड से अच्छी खुराक नहीं हो सकती। हेनरी तो ऑस्कर वाइल्ड के एकमात्र उपन्यास ‘द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे’ का एक पात्र है। ऑस्कर ने कहा था कि दुनिया उनको हेनरी समझती है, वो खुद को बेसिल की तरह देखते हैं पर वो खुद डोरियन ग्रे बनना चाहते हैं। पर मैं इनमें से कोई नहीं था। मैं हमेशा ऑस्कर वाइल्ड बनना चाहता था जो समाज की किसी भी चीज पर सवाल कर सकता है।

आइरिश मूल के
1854 में ऑस्कर वाइल्ड का जन्म हुआ था। वे आइरिश मूल के थे। उस वक्त ब्रितानी राज में सूरज नहीं डूबता था और शायद इसी चीज को दिखाने के लिए उन लोगों ने इंडिया में उसी वक्त पहली ट्रेन भी चलवाई थी। ऑस्कर के माता-पिता दोनों अच्छी हैसियत रखते थे। माताजी तो लिखती भी थीं। ऑस्कर को किसी चीज की कमी नहीं रही थी। उस दौर में ब्रिटिश समाज पाखंड पर जीता था। सामाजिक पाखंड कूट-कूट कर भरा था। 

फ्लोरेंस से प्रेम
ऑस्कर वाइल्ड पढ़ने में बहुत ही तेज थे। ट्रिनिटी, ऑक्सफोर्ड सब में पढ़े थे और वहीं तय कर लिया था कि लेखक बनेंगे। ग्रेजुएट होने के बाद ऑस्कर आयरलैंड के डबलिन चले गए, अपनी बचपन की दोस्त फ्लोरेंस से रोमांस करने। पर फ्लोरेंस ने ब्रैम स्टोकर से शादी कर ली। स्टोकर ने बाद में बेहद प्रसिद्ध उपन्यास ‘ड्रैकुला’ लिखा था। 1879 में ऑस्कर वापस लंदन आ गए। 1881 में ‘पोएम्स’ नाम से पहली किताब खुद ही प्रकाशित की। खूब ​िब​की यह किताब। ऑस्कर का नाम प्रसिद्धि पाने लगा। इनके लेखन में जबरदस्त व्यंग्य रहता था। उस समय उलटा बोलने वाले यही एक थे ब्रिटेन में। उन्होंने तभी कहा था कि पत्रकारिता और साहित्य में अंतर यह है कि पत्रकारिता पढ़ने लायक नहीं है और साहित्य को कोई पढ़ता नहीं। वे इतने मशहूर हो गए कि कई अभिनेत्रियों से दोस्ती हो गई। फिर नाटक भी लिखने लगे। इस चक्कर में पेरिस और अमेरिका भी हो आए। बहुत सारे दोस्त और दुश्मन दोनों बना लिए। 1884 में कॉन्स्टैंस मैरी लॉयड से शादी कर ली। फिर एक पत्रिका में काम करने लगे। पहले खूब लिखा, फिर संपादक बन गए।

‘द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे’
कला जीवन का प्रतिरूप होती है। ये बात ऑस्कर के संदर्भ में ज्यादा सच है। शुरुआत में तो ऑस्कर वाइल्ड भी वैसी ही चीजें लिखते थे, जिसमें हमेशा असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की जीत होती थी। पर धीरे-धीरे उनके अंदर का राक्षस उनके बाहर के संत से लड़ने लगा। जैसा कि हमारे अंदर का राक्षस हमारे बाहर के संत से लड़ता है। और तब हम यह कहकर कि जमाना खराब है, साफ बच निकलते हैं। ऑस्कर ने इसे छुपने नहीं दिया। 1891 में उनका पहला और आखिरी उपन्यास आया- ‘द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे’। यह उनके पुराने लिखे हुए का परिमार्जित और ज्यादा विवादास्पद संस्करण था। इस उपन्यास में डोरियन ग्रे नाम का बेहद खूबसूरत नौजवान है जो लगातार सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में भरोसा रखता है। उसका एक पेंटर दोस्त बेसिल उसकी एक पेंटिंग बनाता है। यह इतनी खूबसूरत होती है कि ग्रे सोचता है कि वो हमेशा इस पेंटिंग की ही तरह रह जाए। वह कहता है कि ऐसा बने रहने के लिए वो सब कुछ दे देगा। अपनी आत्मा भी और उसकी ये इच्छा पूरी हो जाती है। ग्रे धीरे-धीरे हर गलत काम करने लगता है। उसको कोई पकड़ नहीं पाता। पर इन सारे कामों का नतीजा उसकी पेंटिंग पर पड़ता है। पेंटिंग दिनों-दिन खराब और कुरूप होती जाती है। बहुत दिनों के बाद जब ग्रे जिंदगी से निराश हो जाता है तो वो पेंटिंग को खत्म करने का निश्चय करता है। पर अंत में पता चलता है कि फर्श पर बूढ़े हो चुके ग्रे की लाश पड़ी हुई है और पेंटिंग पहले की तरह जवान हो चुकी है।

लॉर्ड हेनरी का पात्र
इस कहानी में लॉर्ड हेनरी का पात्र भी बहुत महत्वपूर्ण है। वह डोरियन ग्रे को लगातार बहकाता रहता है कि जीवन में मजे के अलावा कुछ नहीं रखा है। ये अलग बात है कि हेनरी कभी खुद कुछ नहीं करता, सिवाय बोलने के। उसकी जिंदगी का मजा है कि ग्रे उसके कहने पर कुछ-कुछ करता रहता है। बेसिल हेनरी के प्रभाव से ग्रे को बचाने की कोशिश करता है। पर असफल रहता है। फिर एक दिन ग्रे बेसिल को मार देता है।

‘द इंपॉर्टेंस ऑफ बीइंग अर्नेस्ट’
फिर 1895 में आया ऑस्कर वाइल्ड का नाटक ‘द इंपॉर्टेंस ऑफ बीइंग अर्नेस्ट’। यह उस वक्त की विक्टोरियन सोसाइटी पर एक हमला था। विक्टोरियन मतलब पाखंडी समाज। जो एकदम संकीर्ण मानसिकता का था। शादी के लिए ये लोग सिर्फ पैसे और परिवार की इज्जत पर भागते थे। लड़के-लड़की के दिल में क्या है, इससे कोई मतलब नहीं था। लड़कियों की इज्जत पर विशेष जोर था। इतना कि लड़कियां कॉर्सेट पहनती थीं। इतना टाइट कि शरीर खराब हो जाता था इससे। तमाम बीमारियां हो जाती थीं। सुंदर दिखने पर इतना जोर था कि भयानक डाइटिंग करती थीं। इतना कि पेट में कीड़े पाल लेती थीं, यह सोचकर कि मोटापा नहीं होगा इससे। ऑस्कर ने अपने समाज का बहुत मजाक बनाया इसमें। मजाक ही वो जरिया था, जिससे ऑस्कर ब्रिटिश समाज पर हमला कर सकते थे। आगे यह सही भी साबित हुआ। लोगों ने इस नाटक को खूब देखा। इस नाटक में ऑस्कर ने ये भी लिखा था कि स्वर्ग में तलाक होते हैं। ये ‘स्वर्ग में जोड़ियां बनती हैं’ पर किया गया व्यंग्य था। ये भी लिखा कि सच्चाई शायद ही पवित्र होती है और सिंपल तो कतई नहीं होती।
इसके पहले ऑस्कर वाइल्ड ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर एक लेख लिखा था। उनके विचारों को उनकी पत्नी कॉन्स्टैंस ने आंदोलन सा बना दिया था। कुछ और साल लगे, फिर लड़कियों को भी अपनी पसंद के कपड़े पहनने का हक मिल गया। तभी एक ऐसी घटना हुई जिसने ऑस्कर वाइल्ड के जीवन को एकदम बदल दिया। बदल क्या दिया, खत्म ही कर दिया।

कोर्ट का चक्कर
1895 में जब उनके नाटक चरम पर थे, उसी वर्ष ऑस्कर वाइल्ड पर सोडोमाइट होने का आरोप लगाया गया। सोडोमाइट का मतलब वही था कि ये आदमी लड़कों में दिलचस्पी रखता है। विक्टोरियन समाज में ये अपराध बेहद गंभीर था। इस अपराध के लिए जान से भी मारा जा सकता था। यह बात इतनी बढ़ गई कि ऑस्कर वाइल्ड ने मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। हर किस्म की नैतिकता पर तलवार चलाने वाले ऑस्कर वाइल्ड को कोर्ट में जाकर नैतिक बनना पड़ा। जज ने कहा कि इतना गंदा मुकदमा तो मैंने जिंदगी में नहीं देखा। 

अकेलेपन में मौत 
इस मामले ऑस्कर वाइल्ड को दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई। जेल में भी ऑस्कर ने लिखने-पढ़ने का काम किया। अपराधियों के ऊपर एक बहुत ही मार्मिक कविता लिखी। पर जेल से छूटने के बाद जिंदगी खत्म हो गई। पैसा नहीं था, इज्जत चली गई थी। पेरिस के एक छोटे से कमरे में किराए पर रहने लगे। तीन साल बाद 1900 में ऑस्कर की अकेलेपन में मौत हो गई। पत्नी और बच्चों को समाज के ताने से डरकर आयरलैंड चले जाना पड़ा था। बाद में ऑस्कर वाइल्ड का सम्मान करते हुए आयरलैंड गे मैरिज को कानूनी शक्ल देनेवाला दुनिया का पहला देश बना। 



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