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रविवार, 16 जून 2019

डॉ.पाठक की संपूर्णता का व्याख्यान है ‘कुलकमल’

समीक्षित कृति :कुलकमल कृतिकार :पंडित गंगा प्रसाद झा प्रकाशक :प्रतिभा प्रकाशन, केदारनाथ रोड, मुजफ्फरपुर,बिहार पृष्ठ-संख्या :88 सहयोग-राशि :1101/- रुपए

‘कुलकमल’ नामक मैथिली महाकाव्य संस्कृत और मैथिली साहित्य के विद्वान पंडित गंगा प्रसाद झा की सद्यः प्रकाशित कृति है। सुलभ-स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित करता हुआ यह काव्य मिथिला, बिहार और देश की अनेक ज्वलंत समस्याओं पर हमारा ध्याना खींचता है।
प्रस्तुत महाकाव्य का नायक डॉ. पाठक धीरोदात्त गुण से संपन्न हैं। इन्होंने देश में ही नहीं, विश्व में स्वच्छता का परचम लहराया है। एतदर्थ कवि ने ‘कुलकमल’ से इनकी उपमा कही है। कमल कीचड़ में खिलता है, किंतु यह स्वच्छता का प्रतीक है। डॉ. पाठक का जन्म एक कुलीन मैथिल ब्राह्मण-परिवार हुआ, किंतु वे समाज के वंचित, उपेक्षित, तिरस्कृत और हाशिए पर खड़े एक वर्ग विशेष को उनका मानवाधिकार, उनकी गरिमा लौटाने, उन्हें पुनः प्रतिष्ठित करने तथा सम्मानजनक आजीविका से जोड़ने के लिए कार्य करते हैं। एतदर्थ कवि लिखता है-

समाजक सेवा मे समर्पित जे, से कुलकमल कहबै छ।
इतना ही नहीं, डॉ. पाठक का कर्म केवल दलितों के उद्धार तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि दो गड्ढेवाली सुलभ शौचालय तकनीक के आविष्कार, विकास और प्रचार-प्रयोग से वैश्विक स्तर पर स्वच्छता के क्षेत्रा में एक बड़ा परिवर्तन लाया है। कवि लिखता है-
मलक त्याग सं जन-जीवन सतत स्वच्छ रहै छ।
मल-त्याग से तो हम स्वच्छ होते ही हैं, किंतु उस मल का निपटान भी आवश्यक होता है, यदि ऐसा नहीं होगा तो यह वसुमती वसुधा आवास्य नहीं रहेगी। डॉ. पाठक इसकी चिंता करते हैं। कवि लिखता है
कमलक कुशल कर्म कसौटी पर पर्यावरण रहय सुरक्षित।
वह स्वच्छता भी कैसी हो? तो कवि लिखता है कि नदी के स्वच्छ जल की तरह, जो चांदी की तरह चमकती हुई हो और वह नदी भी निरंतरता के साथ बहती धारा वाली हो 
शुचिता सरिताक स्वच्छ पानी सन धारक नहि हो अस्त।
डॉक्टर पाठक केवल मानव-मल के निपटान के प्रति ही चिंतित नहीं हैं, बल्कि उन्हें पेड़ों के कटने, गंगादि नदी-जल के प्रदूषित होने और वायु-प्रदूषण के साथ-साथ विनष्ट होती हुई प्राकृतिक संपदा, यथा,पर्वत आदि की भी चिंता है
प्रस्तरक शिलाखंड सं नित्य होइछ गृह-निर्माण।
गामक गाछक काटि-काटि स्वर्ण लंका केर तैयारी।
सुन्दरि सीताक पंचवटी मे मानवता पर दानवता भारी।।
सुन्दरि सुरसरि संग असह्य प्रदूषणक बलात्कार।
अधहे जरल लास पफेक दै छ मध्य शुचि धारा।।
कनति कहथि शुचिता, कमल करह कनेक विचार।
नहि हो दूषित पवन-प्रणय से करह कोनो चमत्कार।
जलक संग हो न्याय, तखनहि पीबि सकब चाय।

डॉ. पाठक की दृष्टि में अस्वच्छता का संबंध अज्ञान से भी है। लापरवाही के कारण भी लोग गंदगी फैलाते हैं, इसीलिए कवि माता सरस्वती से इस अज्ञान को नष्ट करने के लिए प्रार्थना करता है-
हे शुचिते सरस्वति! स्वीकार करू कवि गंगाक प्रणाम।
हो अंत अज्ञानक अमल धवल हमर हृदय-धाम।।

कवि का मानना है कि यदि इस अज्ञान का अंत हो जाए और घर में शुचिता के साधन हो जाएं ;जैसा कि डॉ. पाठक चाहते हैं, तो बलात्कार-जैसी घटनाएं भी
काफी हद-तक कम हो सकती हैं-
सरस्वती साक्षात् सरिपहु शुचिता, नहि हार-मांस केर नारी।
जनिक साधना सं नहि टपि सकत कतहु व्यभिचारी।।

कवि-कर्म की एक प्रमुख विशेषता है-प्रच्छन्नता। कवि गंगा प्रसाद झा ने इस विषय में भी अपने पांडित्य का पूर्ण प्रदर्शन किया है। महाकाव्य के अलग-अलग सर्गों में इन्होंने नायक का परिचय तो दिया है, किंतु प्रच्छन्नता के साथ। वे लिखते हैं-
मिथिला-प्रदेशक कर्मनिष्ठ, रमाकान्त सन साधक सिक्त।
तनिक गृहणी कुल कमल, तनय विन्देश्वर अलंकृत।।
...
कश्यप गोत्रा मिथिलामहीक मध्य सं आयल कमल-परिवार।
समयान्तर अभिहित गाम गुंजित रामपुर-पोहियार।
माध्यमिक शिक्षाक सम्पादन गामहि मे बालाम्बुज कएल।
उच्च ज्ञान पिपासा शान्ति-हेतु नगर पाटलिपुत्रा पहुंचल।

डॉक्टर पाठक महात्मा गांधी के अनुयायी रहे हैं, उन्हीं के पद-चिह्नों पर चलकर इन्होंने देश से अस्पृश्यता ;छुआछूत और खुले में शौच की समस्या के निदान में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। लोगों ने इन्हें आधुनिक गांधी से संबोधित किया है। कवि लिखता है-
मोहन सनक समाजसेवी सम्पादक अछि पोरबन्दर।
तहिना आइ गौरवान्वित रामपुर गाम पाबि विन्देश्वर।
...
हां धरती मांगि रहल छथि, आइ गांधीक सुन्दर विचार।
सब सुखी हो सब नीरोग हो, आ नहि रहय कियो लाचार।

डॉ. पाठक-द्वारा मैला ढोने की प्रथा की समाप्ति हेतु किए गए प्रयत्न पर कवि की पंक्ति है-
अंतिम टीन उठाय मलक ओ सकुचि घरक दिशि चलली।
कोई भी व्यक्ति समाज के अंदर ही रहकर उठना, बैठना, बोलना, खाना, पढ़ना-लिखना इत्यादि सीखता है। किंतु यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जो व्यक्ति समाज के लिए कार्य करता है, समाज उसका अभिनंदन करता है, उसे पुरस्कृत करता है। डॉ. पाठक के साथ भी ऐसा ही हुआ है-
कुलकमलक शुचि कार्य देखि कं, लोक देलक प्रतिवेदन।
शासन जागल, जनता जागल, भेल हुनक अभिनंदन।।

डॉ. पाठक का सम्मान, केवल उनके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं है, बल्कि उनके सम्मान से मिथिलांचल का सम्मान हुआ है, संपूर्ण भारतवर्ष सम्मानित हुआ है-
धन्य-धन्य विन्देश्वर, मिथिला सेहो धन्य।
भरत धरित्रा सेहो धन्य अछि, केओ नहि एहन अन्य।।

‘महाकाव्य’ की परिभाषा में ‘साहित्य-दर्पण’ में आचार्य विश्वनाथ लिखते हैं-
सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रौको नायकः सुरः।...
इस दृष्टि से भी यह एकादश सर्गात्मक महाकाव्य है। काव्य का कथानक सज्जन व्यक्ति से संबंध रखनेवाला है। इसके नायक देवत्व गुण संपन्न प्रख्यात गांधीवादी डॉ. विन्देश्वर पाठक विगत 5,000 वर्षों से चली आ रही अमानवीय प्रथा को दूर कर समाज में एक नया सवेरा ला रहे हैं। वे विश्व में एक नवयुग का सूत्रापात करना चाहते हैं। यहां मुझे कविवर सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियां याद आ रही हैं-
जग-जीवन में जो चिर महान
सौंदर्य पूर्ण औ’ सत्य-प्राण
मैं उसका प्रेमी बनूं नाथ
जो हो मानव के हित समान।

काव्य-कला की दृष्टि से यह महाकाव्य अपनेआप में पूर्ण है। कुछेक काव्यगत दोषों को छोड़कर इसमें संप्रेषणीयता, पद्यगत भाव-भंगिमा, आलंकारिक चमत्कार और विभिन्न रसों का समावेश दिखाई पड़ता है। ‘अग्निपुराण’ की एक पंक्ति है-‘अपारे काव्य संसारे कविरेक प्रजापतिः। यथा वै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते। अर्थात इस अपार काव्य-संसार में कवि भी विश्व के स्रष्टा ब्रह्मा के समान आचरण करता है। जिस प्रकार ब्रह्मा इस विश्व में अपनी इच्छा के अनुसार,परिवर्तन करता है, वैसे ही कवि भी अपनी मर्जी का मालिक होता है।  अंत में इसी पुस्तक से-
धन्य कुलकमल विन्देश्वर, तोहर सुकीर्तित्व अमर हो।
शुचिताक सुसंग्राम संपूर्ण विश्व मे सदिखन सफल हो। 

 



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