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सोमवार, 21 जनवरी 2019

‘डॉक्टर पाठक का काम अनोखा है’

प्रो. अनिल कुमार राय का सुलभ सभागार में दिया गया वक्तव्य

‘सुलभ इंटरनेशनल के माध्यम से डॉ. विन्देश्वर पाठक जी एक बड़ा काम कर रहे हैं। मैं लंबे अरसे से आपसे और आपके काम से परिचित हूं। दुनिया-भर में आपका जो काम है, वह आपकी तरह ही अनोखा है।’ ये बातें अपने उद्बोधन में 17 नवंबर, 2018 को  महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के नवनियुक्त कुलपति प्रो. अनिल कुमार राय ने कहीं। वे सुलभ-सभागार में पधारे थे।  प्रोफेसर अनिल को महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति नियुक्त किए जाने पर सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के सभागार में शॉल और पुस्तकें समर्पित कर स्वागत और सम्मान किया गया। इस अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में सभागार को जानकारी दी गई। सभागार में स्वागत-सम्मान के पश्चात उन्होंने सुलभ की विविध गतिविधियों को देखा। उन्होंने सुलभ पब्लिक स्कूल, सुलभ व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्र, सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ टॉयलेट्स, सुलभ टू-पिट पोर फ्रलश कंपोस्ट टॉयलेट के विभिन्न मॉडल्स, सुलभ बायोगैस तकनीक, सुलभ वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट, सुलभ वॉटर एटीएम एवं सुलभ स्वास्थ्य केंद्र की जानकारी प्राप्त की। प्रोफेसर राय ने सुलभ की सारी गतिविधियों को देखने के बाद आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि हम सिर्फ यह जानते रहे हैं कि सुलभ शौचालय और सामाजिक सेवा का ही कार्य करता है, किंतु यहां देखकर इसके बहुआयामी प्रकल्पों की भी जानकारी मिली, जो देश और समाज के विकास के लिए बहुत उपयोगी हैं। 
मैं सुलभ इंटरनेशनल सोसाइटी को एक परिवार ही मानता हूं। यहां के विद्यार्थी हों, शिक्षक हों, कर्मी हों या अधिकारी,सभी इस परिवार के अंग हैं। इस परिवार में आकर मुझे सच में प्रसन्नता हो रही है। मैं अशोक जी का आभारी हूं कि उनकी वजह से मुझे आपलोगों से रू-ब-रू होने का अवसर मिला। जिस प्रार्थना को हम सभी लोगों ने अभी दोहराया, वह प्रार्थना अपने-आपमें मूल भावना और पूरी अवधारणा को ले करके सुलभ की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की संकल्पना का भाव इस प्रार्थना में छुपा हुआ है। इसीलिए इस प्रार्थना को रोज सुबह-सुबह दोहराते हैं, ताकि वह हमारे संस्कार और आचरण का हिस्सा बन सके। उसके अनुसार जो बात हम बार-बार करते हैं, वो फिर हम करना शुरू कर देते हैं। जब हम करने के लिए आगे बढ़ जाते हैं तो उसे ही ‘एक्शन’ कहते हैं, जिसको एक्शन सोशियोलॉजी का नाम दिया है या जो फंक्शनल है। क्योंकि थ्योरी अपनी जगह है और सिद्धांत अपनी जगह। लेकिन उसका जो व्यावहारिक पक्ष है, वो ज्यादा ही महत्त्वपूर्ण है। 
सुलभ इंटरनेशनल सोसाइटी के माध्यम से डॉ. विन्देश्वर पाठक जी एक बड़ा काम कर रहे हैं। मैं लंबे अरसे से आपसे और आपके काम से परिचित हूं। दुनिया-भर में आपका जो काम है, वह आपकी तरह ही अनोखा है। जैसा आपने बताया कि स्वच्छता अभियान की शुरुआत तो चार साल पहले भारत सरकार के माध्यम से की गई है, लेकिन स्वच्छता और सफाई का काम तो जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है-समाज और घर के साथ। दुर्भाग्य से हम इसमें पिछड़े हुए हैं। हमारा देश बहुत खूबसूरत है। जितना खूबसूरत हमारा देश है, उतना ही खूबसूरत हमारा परिवेश और मौसम है-जो प्रकृति से मिला हुआ है। जो प्राकृतिक सौंदर्य देश का है, उसकी खूबसूरती सिर्फ स्वच्छता की कमी की वजह से छिप जाती है। दुनिया के तमाम हिस्से हैं, लेकिन वो हमारे देश की प्रकृति और वातावरण से अपने देश की तुलना नहीं कर सकते। लेकिन स्वच्छता के मामले में हम कहीं-न-कहीं पीछे हैं। उसका कारण यह है कि हम यह सोचते हैं कि स्वच्छता रखना दूसरे का काम है। सफाई करना सफाईकर्मी का काम है। हमसे यहीं पर गलती हो गई कि घर में झाडू लगाना मां, बाई या दाई का काम है। सफाई का काम दूसरे का नहीं, बल्कि अपना काम है। हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वच्छता अभियान का हिस्सा बनेंगे, सफाई करेंगे और गंदगी नहीं होने देंगे। गंदगी न होने देने का संकल्प एक बड़ा संकल्प है। लेकिन हमें प्रयास करना चाहिए कि गंदगी हो ही नहीं। दूसरी बात कि यह सफाईकर्मी का काम है, यह कहना कि जिसका काम है, वो आकर करेगा। हमें उसे अपना काम मानना चाहिए। जिस तरह हम अपने शरीर, बिस्तर और घर की सफाई करते हैं, उसी तरह हमें अपने घर के बाहर की भी सफाई करनी चाहिए। 
मैं महाराष्ट्र से आता हूं, जहां का कल्चर बड़ा सुंदर है। वहां का हर आदमी अपने घर के साथ-साथ अपने घर के बाहर सड़क की सफाई करता है, जैसे हम अपने घर के आंगन की सफाई करते हैं। अब तो शहरों में आंगन बचा ही नहीं। गांव में तो आंगन हुआ करता है। लोग आंगन की सफाई करते हैं। महाराष्ट्र में हर आदमी अपने घर के बाहर सड़क साफ करता है- एक तरफ से आधी सड़क, दूसरी तरफ से आधी सड़क। लोग उसकी धुलाई करते हैं। पानी की कमी होने के बावजूद कम पानी से नहाएंगे, लेकिन सड़क पर पानी का छिड़काव अवश्य करेंगे। वहां तुलसी रख देंगे, दीपक जलाए रखेंगे, ताकि कोई गंदगी न करे। 
पहले मैं उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में काम करता था। वहां इतनी गंदगी थी कि उधर से गुजरना मुश्किल था। वहां की सीढ़ियां, जहां से रोज वाइस चांसलर गुजरते थे, वहां पर पूरी दीवार रंगी हुई होती थी अलग-अलग रंगों से। लोग पान खाते और पान खा करके थूक देते। तो उसको साफ कैसे किया जाए! हमलोग उसकी सफाई करवाते थे तो अगले दिन दीवार फिर गंदी हो जाती। तो हमलोगों ने वहां पर कुछ देवी-देवताओं के चित्रें को चिपकाना शुरू किया, ताकि लोग देवी-देवताओं के ऊपर नहीं थूकेंगे। लेकिन ऐसा क्यों है कि देवी-देवता को देखकर के हम गंदा नहीं करेंगे? ऐसा नहीं होना चाहिए। हम अपने-आपसे डरें और डरना भी क्यों है, हम सम्मान करें न! अगर स्वच्छ वातावरण रहेगा तो हम स्वस्थ रहेंगे। और हम अपनी पीढ़ी को एक स्वच्छ एवं सुंदर वातावरण देंगे। उस स्वच्छता और सुंदरता से जो अनुभूति होगी, वो हमारे व्यक्तित्व को विकसित करेगी। हमारी पर्सनाल्टी को डेवलप करेगी। मुझे लगता है कि जो स्वच्छता का अभियान है, अगर हम इसी अभियान को पकड़ लें और सुलभ शौचालय के माध्यम से स्वच्छता अभियान की एक अनोखी पहल है। जिस शौचालय की बात गांधी जी हालांकि तब करते थे, गांधी जी ने अपने समय उसी सफाई की बात की और खुद से सफाई की। ये नहीं कि दूसरा कोई और करेगा। गांधी जी खुद अपनी सफाई करते थे, टॉयलेट की भी। उस स्वच्छता का जो काम गांधी जी ने शुरू किया, उस स्वच्छता का काम जो पाठक जी ने किया, उसी को भारत सरकार ने किया। वो इन सबका ही काम नहीं, बल्कि हम सबका काम है। जब हम उसको अपना कर्तव्य मान लेंगे तो मुझे लगता है कि उस लक्ष्य को हम हासिल करेंगे।  अच्छी स्थिति है कि सुंदरता दिख रही है, सफाई दिख रही है। सड़कों पर जाइए, दिखता है। रेलवे स्टेशन, शहरों के गली-मुहल्ले में जो शौचालय का अभियान सरकार के माध्यम से चल रहा है, वह संतोषजनक है।
 सुलभ शौचालय बनाकर डॉ. पाठक ने जो अभियान चलाया है,  वह उनकी व्यापक स्वच्छता दृष्टि का परिणाम है। शौचालय नहीं होने का कष्ट उन्हीं से पूछा जा सकता है, जो उन स्थितियों में होते हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि यह एक बड़ा अभियान है और यह धरती अच्छे लोगों से ही चलती है। धरती पर अच्छे लोगों की कमी नहीं है, सिर्फ उन अच्छे लोगों को साथ हो करके आगे आ जाने की जरूरत है। यह एक अच्छी स्थिति है कि पाठक जी ने एक बड़ा परिवार तैयार किया है, जो पूरे एक्शन में है। मुझे पूरी उम्मीद है कि ये जो अभियान है, वो अपनी सफलता पर जरूर पहुंचेगा। हम सभी उसका हिस्सा बनेंगे। हम सभी अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं, उसपर विचार और संकल्प करेंगे और अगले दिन से करना शुरू कर देंगे। इसी के साथ, क्योकि प्रार्थना का समय है, अपनी बात समाप्त करता हूं। 



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