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शुक्रवार, 22 मार्च 2019

चरित्र और अनुशासन

जिस प्रकार प्राण के बिना इंद्रियां अर्थहीन हो जाती हैं, वैसे ही व्यक्ति के सुधार बिना समाज-सुधार का स्वप्न बेकार होता है

नैतिकता एक शाश्वत मूल्य है। इसकी अपेक्षा हर युग में रहती है। सतयुग में भी ऋषि-मुनि होते थे। वे धर्म और नैतिकता की चर्चा किया करते थे। रामराज्य भी इसका अपवाद नहीं था। उस समय भी धर्म के उपदेशक थे। जिस युग में धर्म और नीति के पांव लड़खड़ाने लगे हों, सांप्रदायिकता, धार्मिक असहिष्णुता, जातिवाद, छुआछूत, बेरोजगारी, कालाबाजारी, मिलावट, दहेज आदि बीमारियां सिर उठाए खड़ी हों, उस समय तो नैतिकता की आवाज उठाना और इसकी जरूरत को रेखांकित करना और अधिक जरूरी हो गया है। आज सब कुछ है- ट्रेन है, प्लेन है, कारखाने हैं, मिलें हैं, स्कूल हैं, कॉलेज हैं, भोगोपभोग की तमाम सामग्रियां हैं। पर अच्छा आदमी नहीं है। इस एक कमी के कारण सब उपलब्धियां बेकार हो रही हैं। सब कुछ है, पर जब तक आदमी सही अर्थ में आदमी नहीं है, तब तक कुछ भी नहीं है।
एक साधारण व्यक्ति किसी सेठ के पास गया। उसके घर में लड़की की शादी थी। बारात का आतिथ्य करने के लिए उसे किसी चीज की जरूरत हुई। सेठ जी का नाम उसने बहुत सुना था। मन में बड़ी आशा संजोकर वह सेठ जी के घर पहुंचा और बोला, मुझे दो-चार दिन के लिए अमुक चीज की जरूरत है। आप दे सकें तो बड़ी कृपा होगी। सेठ जी मसनद के सहारे आराम से बैठे थे। उन्होंने इधर-उधर देखा और कहा, आप कुछ समय बाद आना। कुछ समय बाद आने पर भी उसे वही बात सुनने को मिली। जब वह तीसरी बार आया और सेठ ने फिर टालमटोल किया तो आगंतुक अधीर हो उठा। वह अपनी अधीरता का गोपन करता हुआ बोला, भाई साहब! बात क्या है? मुझे और भी कई काम करने हैं। आप मेरी दुविधा को समाप्त कीजिए। सेठ साहब सुनकर गंभीर हो गए और अपनी कठिनाई बताते हुए बोले, भाई! तुम अन्यथा मत समझो। मैं क्या करूं? यहां कोई आदमी नहीं है। आगंतुक व्यक्ति ने छूटते ही कहा, मैं तो आपको आदमी समझकर ही आया था।
सेठ जी के पास सब कुछ था। एक आदमी नहीं था, इसीलिए कुछ भी नहीं था। इसका मतलब यह नहीं है कि आदमी पैदा नहीं होते। पैदा होते हैं, किंतु वे बनते नहीं। क्योंकि माता-पिता जन्म तो दे सकते हैं, पर जीवन नहीं दे सकते। जीवन के बिना जन्म की अर्थवत्ता भी क्या है? आदमी आदमी न हो तो उसके आदमी बने रहने का प्रयोजन ही क्या है? इस प्रश्न ने धर्मगुरुओं, धर्माचार्यों, संतों और धर्म संस्थाओं को चुनौती दी कि या तो वे कोई ऐसा नुस्खा ईजाद करें, जो आदमी को आदमी बना सके, अन्यथा धर्म और धर्मगुरुओं की उपयोगिता विवादास्पद बन जाएगी। 
देश आजाद हुआ और इसके साथ ही देश में अनुशासनहीनता और चरित्रहीनता को भी आजादी मिल गई। इसका इलाज तो जरूरी है। इसके लिए हमें प्रयास करना होगा। कई बार मन में आता है कि कितना प्रयास करें। हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लोग हैं कि समझते ही नहीं। तब सूर्य को देखो। सूर्य से मत पूछो कि उसने आज तक कितना अंधकार मिटाया, उसका काम अंधकार मिटाने का है। रात को फिर अंधकार घिर आता है। इसकी वह चिंता नहीं करता। शाम ढलते ही प्रतिदिन अंधकार अपना साम्राज्य जमा लेता है, इस बात की परवाह किए बिना सूरज अगली सुबह फिर अपना दायित्व निभाने आ जाता है।
यदि हमें आदमी बनाना है तो वह समाज से नहीं, व्यक्ति से बनेगा, व्यक्ति-सुधार से समाज-सुधार की बात जितनी युक्तिसंगत है, उतनी ही सरल भी। आदमी के सुधार बिना सारी योजना विफल हो जाती है, सारा चिंतन अर्थहीन रह जाता है। जिस प्रकार प्राण के बिना इंद्रियां अर्थहीन हो जाती हैं, वैसे ही व्यक्ति के सुधार बिना समाज-सुधार का स्वप्न बेकार होता है। 



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