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मंगलवार, 18 जून 2019

वर्जनाओं को तोड़ विधवाओं-अस्पृश्यों ने मनाया छठ

पवित्रता और सादगी का पर्याय रहे लोकपर्व छठ को सुलभ परिवार सामाजिक समरसता बढ़ाने के अवसर के रूप में वर्षों से मना रहा है। इस अवसर पर वृंदावन की विधवा माताओं से लेकर टोंक-अलवर की पुनर्वासित महिला स्कैवेंजर्स तक सूर्य की अाराधना करती हैं

समाज और परंपरा का साझा भारतीय संस्कृति की खासियत रही है। इस खासियत ने जहां हमें एक तरफ आस्थावान बनाया है, वहीं प्रकृति के साथ साहचर्य का पाठ भी पढ़ाया है। स्वच्छता की शपथ के साथ पांच दशक पूर्व शुरू हुई सुलभ क्रांति आज देश में सामाजिक बदलाव के सबसे बड़े आंदोलन का नाम है। इस आंदोलन के जरिए एक तरफ जहां सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को मिटाने के लिए गंभीर प्रयास हो रहे हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट के कहने पर वृंदावन की विधवा माताओं के असहाय जीवन में उल्लास और उत्सव के फूल खिलाए जा रहे हैं। छठ भारत का महानतम लोकपर्व है। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने छठ को उन महिलाओं को समाज की मुख्यधारा के साथ आस्थापूर्ण तरीके से जोड़ने के अवसर के तौर पर देखा, जिन्हें विभिन्न वजहों से समाज की मुख्यधारा में स्थान नहीं दिया जा रहा था। इन महिलाओं में खासतौर पर अलवर-टोंक की वे पुनर्वासित स्कैवेंजर्स शामिल हैं, जिन्हें मंदिरों की देहरी लांघने से लेकर छठ जैसे महान लोकपर्व को मनाने के लिए सवर्ण सामाजिकता की वर्जनाओं से जूझना पड़ता है। इसी तरह सामाजिक रूढ़ि के कारण वृंदावन में वैधव्य का जीवन जी रही महिलाएं विभिन्न पर्व-त्योहारों से आमतौर पर दूर रहती हैं। इसके पीछे सामाजिक रूढ़ि के साथ उनका निस्सहाय जीवन भी एक बड़ा कारण है। सुलभ सामाजिक आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि है कि आज ये महिलाएं, जहां एक तरफ फाग के रंग से उल्लासपूर्वक सराबोर होती हैं, वहीं दीपावली के दीए भी श्रद्धा के साथ जलाती हैं। इसी कड़ी में लोकपर्व छठ भी है, जो भारतीय लोकजीवन का महापर्व है। ये महिलाएं वर्षों से छठ महापर्व मनाते हुए भगवान सूर्य की आराधना समाज के बाकी लोगों के साथ समरस भाव से कर रही हैं। सुलभ इसके लिए खासतौर पर अपने परिसर में विशेष आयोजन करता है। इस मौके पर डॉ. विन्देश्वर पाठक और अमोला पाठक सहित समस्त सुलभ परिवार उपस्थित रहता है। इस वर्ष भी सुलभ प्रणेता की प्रेरणा से यह लोकपर्व एक बड़े सामाजिक बदलाव का प्रेरक अभियान बना।

सामाजिक क्रांति का सुलभ सर्ग
देश में सामाजिक क्रांति के इतिहास में यह नया सर्ग है, जब परंपरा और आस्था के साथ सामाजिक बदलाव के सूत्र न सिर्फ विकसित किए जा रहे हैं, बल्कि वे कारगर भी हो रहे हैं। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने स्वच्छता को लेकर अपने मिशन को जारी रखते हुए सामाजिक स्वच्छता और समरसता का एक नया अभिक्रम शुरू कर देश-समाज के आगे नई मिसाल रखी है। विभिन्न तरह की सामाजिक वर्जनाओं और प्रताड़नाओं का शिकार रही महिलाएं अगर छठ जैसे लोकपर्व की आस्था के साथ जुड़ रही हैं, तो सफलता के इस प्रेरक सुलेख के जरिए देश में निस्संदेह सामाजिक क्रांति का एक नया सर्ग रचा जा रहा है।   

भारतीय चित्त और मानस
बात करें छठ की तो यह लोकपर्व एक साथ पवित्रता, सादगी और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। इसके अलावा यह लोकपर्व जल के संरक्षण और स्वच्छता के प्रश्नों को सांस्कृतिक नजरिए से देखने की समझ देता है। छठ कहीं न कहीं भारतीय लोक संस्कृति की उस विशेषता को भी रेखांकित करता है, जिस कारण भारतीय डायस्पोरा की शिनाख्त में उसके लोक संस्कार और बोली सबसे ऊपर है। भारतीय संस्कृति में परंपरा की पैरोकारी आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर वासुदेवशरण अग्रवाल तक तमाम साहित्य-संस्कृति के मर्मज्ञों ने की है। समाज और परंपरा के साझे को समझे बिना भारतीय चित्त और मानस को समझना मुश्किल है। 

जल संरक्षण का संदेश
आज जब पानी की स्वच्छता के साथ उसके संरक्षण का सवाल इतना बड़ा हो गया है कि इसे अगले विश्वयुद्ध तक की वजह बताया जा रहा है, तो यह देखना काफी दिलचस्प है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में इसके समाधान के कई तत्व हैं। जल संरक्षण को लेकर छठ पर्व एक ऐसे ही सांस्कृतिक समाधान का नाम है। अच्छी बात है कि भारतीय डायस्पोरा के अखिल विस्तार के साथ यह पर्व देश-दुनिया के तमाम हिस्सों को भारतीय जल चिंतन के सांस्कृतिक पक्ष से अवगत करा रहा है। इस सांस्कृतिक विरासत के साथ जिस तरह सुलभ ने सामाजिक परिवर्तन का एक नया अध्याय जोड़ा है, उससे इसकी महत्ता और बढ़ गई है।  
दिलचस्प है कि छठ के आगमन से पूर्व के छह दिनों में दिवाली, फिर गोवर्धन पूजा और उसके बाद भैया दूज जैसे तीन बड़े पर्व एक के बाद एक आते हैं। इस सिलसिले को अगर नवरात्र या दशहरे से शुरू मानें तो कहा जा सकता है कि अक्टूबर और नवंबर का महीना लोकानुष्ठानों के लिहाज से खास है। एक तरफ सालभर के इंतजार के बाद एक साथ पर्व मनाने के लिए घर-घर में जुटते कुटुंब और उधर मौसम की गरमाहट पर ठंड और कोहरे की चढ़ती हल्की चादर। भारतीय साहित्य और संस्कृति के मर्मज्ञ वासुदेवशरण अग्रवाल ने इसी मेल को 'लोकरस’ और 'लोकानंद’ कहा है। इस रस और आनंद में डूबा मन आज भी न तो मॉल में मनने वाले फेस्ट से भरता है और न ही किसी बड़े ब्रांड या प्रोडक्ट के सेल ऑफर को लेकर किसी आंतरिक उल्लास से भरता है। 

विदेशों में भी छठ की धूम
पिछले कुछ दशकों में एक छतरी के नीचे खड़े होने की होड़ के बीच इस लोकरंग की एक वैश्विक छटा भी उभर रही है। हॉलैंड, सूरीनाम, मॉरीशस, त्रिनिदाद, नेपाल और दक्षिण अफ्रीका से आगे छठ के अर्घ्य के लिए हाथ अब अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी उठने लगे हैं। अपने देश की बात करें तो जिस पर्व को ब्रिटिश गजेटियरों में पूर्वांचली या बिहारी पर्व कहा गया है, उसे आज बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और असम जैसे राज्यों में खासे धूमधाम के साथ मनाया जाता है। बिहार और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इस साल भी नदियों ने त्रासद लीला रची है। जानमाल को हुए नुकसान के साथ जल स्रोतों और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस पिछले कुछ सालों में और मुखर हुई है। कहना नहीं होगा कि लोक विवेक के बूते कल्याणकारी उद्देश्यों तक पहुंचना सबसे आसान है।
करीब दो दशक पहले कई देशों के संस्कृतिप्रेमी युवाओं ने 'बेस्ट फॉर नेक्स्ट’ नाम से अपने एक अभिनव सांस्कृतिक अभियान के तहत बिहार में गंगा, गंडक, कोसी और पुनपुन नदियों के घाटों पर मनने वाले छठ व्रत पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई। इन लोगों को यह देखकर खासी हैरत हुई कि घाट पर उमड़ी भीड़ कुछ भी ऐसा करने से परहेज कर रही थी, जिससे नदी का जल प्रदूषित हो। 

नदी और आस्था
लोक विवेक की इससे बड़ी पहचान क्या होगी कि जिन नदियों के नाम तक को हमने इतिहास बना दिया है, उनके नाम आज भी छठ गीतों में सुरक्षित हैं। कविताई के अंदाज में कहें तो छठ पर्व आज परंपरा या सांस्कृतिक पर्व से ज्यादा सामयिक सरोकारों से जुड़े जरूरी सबक याद कराने का अवसर है। एक ऐसा अवसर जिसमें पानी के साथ मनमानी पर रोक, प्रकृति के साथ साहचर्य के साथ जीवन जीने का पथ और शपथ दोनों शामिल हैं। 
प्रकृति के साथ छेड़छाड़ रोकने और जल-वायु को प्रदूषण मुक्त रखने की लिए किसी भी पहल से पहले यूएन चार्टरों की मुंहदेखी करने वाले अगर अपने यहां परंपरा के गोद में खेलते लोकानुष्ठानों के सामर्थ्य को समझ लें तो मानव कल्याण के एक साथ कई अभिक्रम पूरे हो जाएं। पर सबक की पुरानी लीक छोड़कर बार-बार गलती और फिर नए सिरे से सीखने की दबावी पहल ही आज हमारे शिक्षित और जागरूक होने की शर्त हो गई है। एक ऐसा शर्तनामा जिसने मानवीय जीवन के हिस्से निखार कम बिगाड़ के रास्ते को ज्यादा सुदीर्घ और चौड़ा किया है। बावजूद इसके गनीमत ही है कि लोक और माटी से जुड़े होने की ललक अब भी ढेर नहीं हुई है। 

ट्रेनों में भीड़
छठ से पहले दिल्ली, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़, अहमदाबाद और सूरत के रेलवे स्टेशनों का नजारा वैसे तो दशहरे के साथ ही बदलने लगता है। पर दिवाली के आसपास तो स्टेशनों पर तिल रखने तक की जगह नहीं होती है। इन दिनों पूरब की तरफ जानेवाली ट्रेनों के लिए उमड़ी भीड़ यह जतलाने के लिए काफी होती है कि इस देश में आज भी लोग अपने लोकोत्सवों से किस कदर भावनात्मक तौर पर जुड़े हैं। तभी तो घर लौटने के लिए उमड़ी भीड़ और उत्साह को लेकर देश के दूसरे हिस्से के लोग कहते हैं, अब तो छठ तक ऐसा ही चलेगा, भैया लोगों का पर्व जो शुरू हो गया है। 
छठ की बढ़ी लोकप्रियता का आलम यह है कि जिस महाराष्ट्र में बिहार-यूपी के लोगों को कई बार कई तरह का विरोध झेलना पड़ता है, आज दही-हांडी और गणेशोत्सव की तरह छठ को भी वहां एक बड़ी सांस्कृतिक स्वीकृति मिल रही है। यह देश में सामाजिक-सांस्कृतिक साझेपन के एक ऐसे सिलसिले को आगे बढ़ाने वाली स्थिति है, जिसमें एक तरफ सिंदूरी परंपरा है तो, वहीं दूसरी तरफ प्रकृति से जुड़ने का तार्किक तकाजा। 

स्वच्छता की राष्ट्रीय चेतना
वैसे भी जब सार्वजनिक जीवन में शुचिता और स्वच्छता जैसे मुद्दे राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनें और यह ललक दिल्ली के लाल किले से पूरे देश में पहुंचे तो इससे वाकई एक बड़ी उम्मीद बंधती है। इस उम्मीद की ही देन है कि आजादी के बाद यह देश पहली बार ऐसा अनुभव कर रहा है जब नदियों खासतौर पर गंगा की स्वच्छता और सफाई जैसे मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे का हिस्सा बने हैं और वह भी सरकारी समझ-बूझ के कारण। यहां यह समझना भी जरूरी है कि विकास के नए दौर में 'विकसित हठ’ और 'पारंपरिक छठ’ की आपसदारी अगर किसी स्तर पर एक साथ टिकी है तो यह किसी गनीमत से कम नहीं। 
यह ग्लोबल दौर में सब कुछ गोल हो जाने के खतरे से हमें उबारता भी है और अपने जुड़ाव की पुरानी जमीन के अब तक पुख्ता होने के सबूत भी देता है। 

उगते के साथ डूबते सूर्य की आराधना
याद रखें कि छठ पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला अकेला ऐसा लोकपर्व है जिसमें उगते के साथ डूबते सूर्य की भी आराधना होती है। यही नहीं चार दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान में न तो कोई पुरोहित कर्म होता है और न ही किसी तरह का पौराणिक कर्मकांड। प्रसाद के लिए मशीन से प्रोसेस किसी भी खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल निषिद्ध है। और तो और प्रसाद बनाने के लिए व्रती महिलाएं कोयले या गैस के चूल्हे की बजाय आम की सूखी लकड़ियों को जलावन के रूप में इस्तेमाल करती हैं। कह सकते हैं कि आस्था के नाम पर पोंगापंथ और अंधविश्वास के खिलाफ यह पर्व भारतीय लोकसमाज की तरफ से एक बड़ा हस्तक्षेप भी है, जिसका कारगर होना सबके हित में है।



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