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मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

भारतीय भाल पर चमकता तिलक

हिंदू राष्ट्रवाद के पिता कहे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक एक साथ प्रखर राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक, वकील और वीर स्वाधीनता सेनानी थे

भारतीय स्वाधीनता संघर्ष ने देश को सिर्फ फिरंगी दासता से आजादी नहीं दिलाई, बल्कि राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र चरित्र की बुनियाद भी मजबूत की। जिन लाल-बाल-पाल की तिकड़ी का जिक्र स्वाधीनता संघर्ष में काफी प्रमुखता से होता है, उसकी खासियत यही थी कि वे स्वाधीनता के साथ देश को सांस्कृतिक तौर पर भी समृद्ध करने के प्रण के साथ आंदोलनरत थे। इस तिकड़ी में शामिल हैं-लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल। ये तीनों महापुरुष देश में स्वराज और संस्कृति का साझा किस तरह विकसित कर रहे थे, इसकी ही मिसाल है कि लोकमान्य तिलक ने जहां गणेश उत्सव को राष्ट्रीयता का पर्व बना दिया, वहीं विपिनचन्द्र पाल ने दुर्गा पूजा और लाला लाजपत ने श्री रामलीला के जरिए देश में सांस्कृतिक एकता के सूत्र मजबूत किए। इन तीनों में लोकमान्य तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता हुए। ब्रिटिश सत्ता उनके नाम से इतना खौफ खाती थी कि उन्हें ‘भारतीय अशांति के पिता’ के नाम से पुकारती थी। इसके उलट वे लोगों के बीच खासे लोकप्रिय और सम्मानित थे। देश की जनता ने ही उन्हें आदर से ‘लोकमान्य’ कहना शुरू किया था। लोकमान्य को हिंदू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है। दरअसल वे एक साथ एक प्रखर राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक, वकील और एक स्वाधीनता सेनानी थे। तिलक ब्रिटिश राज के दौरान स्वराज की मांग सबसे सबसे पहले और मजबूती से उठाने वालों में थे। उनका मराठी में दिया गया नारा ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच’ (स्वराज यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा) बहुत प्रसिद्ध हुआ।

जब तिलक मात्र एक साल के थे, वह समय भारतीय के लिए ऐतिहासिक क्षण था। भारत की आजादी की पहली लड़ाई हुई, जिसे 1857 की क्रांति के नाम से जाना जाता है। हालांकि उस समय तिलक बहुत छोटे थे परंतु इस क्रांति ने उनके बाल मन पर अमिट छाप छोड़ी। आगे चलकर तिलक ने देश की तत्कालीन परिस्थितियों पर बहुत गहरा चिंतन किया। उन्होंने महसूस किया कि यदि देश को गुलामी की वर्तमान अवस्था से बाहर निकालना है तो इसके लिए भारत की शिक्षा पद्धति में सुधार करना आवश्यक है, क्योंकि अंग्रेजों द्वारा जिस पद्धति के आधार पर भारतियों को शिक्षा दी जा रही है, वह केवल इतनी ही है जिससे अंग्रेज हम पर लंबे समय तक शासन कर सकें। तिलक ब्रिटिश प्रेरित भ्रष्ट और मूर्ख बनाने वाली शिक्षा के भारतीय मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों से पूरी तरह परिचित थे। इनका मानना था कि ब्रिटिशों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा पूर्व व पश्चिम की नस्लवादिता पर आधारित थी। इसीलिए उन्होंने सबसे पहले राष्ट्रीय शिक्षा पर बल दिया। एक सम्मानित शिक्षाविद के रूप में प्रसिद्ध महादेव गोविंद रानाडे का भी यही मानना था कि देश को जब तक आजाद नहीं कराया जा सकता तब तक कि इसके पास अमेरिका की तरह राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति और राष्ट्रीय प्रेस न हों।

न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना 

राष्ट्रीय शिक्षा की योजना को कार्यान्वित करने के लिए धन की आवश्यकता थी। इसके लिए जन-धन का प्रबंध करने का निश्चय किया गया। इसी बीच इनकी मुलाकात विष्णु शास्त्री चिपलूणकर से हुई। चिपलूणकर मराठी के प्रसिद्ध लेखक थे। 1873 में इन्होंने सरकारी शिक्षक के रुप में नौकरी कर ली। इसी बीच, इनके मन में अपने देश के युवाओं के हृदय में राष्ट्रीय चेतना जगाने की इच्छा हुई, जिसके लिए ये एक विद्यालय खोलना चाहते थे। जब गंगाधर तिलक ने इन्हें अपनी राष्ट्रीय शिक्षा योजना के बारे में बताया तो ये तुरंत मदद करने के लिए तैयार हो गए।

इस तरह तिलक ने आगरकर, चिपलूणकर, एम.बी. नामजोशी के सहयोग से जनवरी 1880 में पहले प्राइवेट स्कूल ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ की स्थापना की। इस स्कूल के संस्थापकों की प्रतिष्ठा के कारण आस-पास के जिलों के विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। प्रारंभिक वर्षों में स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या 336 थी जो अगले 5 सालों में बढ़कर 1900 हो गई। चिपलूणकर और तिलक दोनों ही धार्मिक थे, लेकिन स्कूल के पाठ्यक्रम में कोई भी धार्मिक विषय शामिल नहीं किए गए। दोनों ही चाहते थे कि देश का प्रत्येक वर्ग (बच्चे, युवा, वृद्ध सभी) देश की वर्तमान परिस्थितियों को जानें। इस स्कूल ने पूना की सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों में एक नया इतिहास रचा था।

1882 में विलियम हंटर की अध्यक्षता में एजुकेशन कमीशन बंबई प्रेसीडेंसी में आया तो न्यू इंग्लिश स्कूल के कार्यकर्ताओं ने उनके मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा। इस स्कूल के कार्यकर्ताओं के कार्य से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीयों की उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज स्थापित करने के लिए भी प्रेरित किया। सर विलियम हंटर ने न्यू इंग्लिश स्कूल की शिक्षा प्रणाली से प्रभावित होकर टिप्पणी की थी, ‘इस विद्यालय की प्रगति देखते हुए मैं निश्चित कह सकता हूं कि पूरे भारत में इसकी बराबरी करने वाला एक भी स्कूल मेरी नजर में नहीं आया। बिना किसी सरकारी सहायता लिए ये स्कूल सरकारी हाई स्कूल की न केवल बराबरी करेगा, बल्कि उससे प्रतियोगिता भी कर सकता है। यदि हम दूसरे देशों के स्कूलों से इसकी तुलना करें तो भी ये ही प्रथम आएगा।’

‘केसरी’ और ‘मराठा’

जब बाल गंगाधर तिलक ने बड़ौदा के महाराज मल्हार राव को भी अंग्रेज सरकार के सामने बेबस देखा तो उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा। ब्रिटिश सरकार ने महाराज मल्हार राव पर अभियोग लगाया कि उन्होंने रेजीडेंट कर्नल फेयर को जहर देने की कोशिश की है। इस अभियोग की जांच के लिए सरकार ने कमीशन नियुक्त की, जिसमें उन्हें दोषी ठहराकर राज्य से वंचित कर दिया और सारी संपत्ति भी जब्त कर ली। दूसरी घटना दिल्ली दरबार में घटित हुई, जिससे यह बिल्कुल साफ हो गया कि अंग्रेज भारतीयों के लिए क्या सोचते हैं। 1877-78 में एक ओर तो भारत में भयंकर अकाल के कारण लोग भूखे मर रहे थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिशों ने दिल्ली में दरबार लगाकर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को ‘केसर-ए-हिंद’ की उपाधि देकर भारत की साम्राज्ञी घोषित किया। अंग्रेजों के इस कार्य से भारतीयों के मन में क्रोध भर गया, जिसके परिणामस्वरूप महाराष्ट्र में बलवंत फाकड़े के नेतृत्व में विद्रोह हुआ, पर यह विद्रोह अंग्रेजों के दमन का शिकार हुआ।  

इन तीन प्रमुख घटनाओं ने तिलक को देश के स्वराज्य प्राप्ति के लिए नए सिरे से सोचने पर विवश कर दिया। वैसे यह स्पष्ट हो गया था कि सिर्फ क्रांति द्वारा ही अंग्रेजों की गुलामी से आजादी नहीं पाई जा सकती। इसके लिए लोगों को देश की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराना अति आवश्यक हैं। अतः तिलक ने पत्र प्रकाशन करके लोगों को जागरूक करने का लक्ष्य बनाया। इस तरह तिलक ने अपने साथियों चिपलूणकर, नामजोशी और आगरकर के साथ समाचार पत्र निकालने का विचार किया। 1881 में समाचार पत्र के प्रकाशन के लिए आर्यभूषण प्रेस खरीदा गया। इस प्रेस में चिपलूणकर की निबंधमाला प्रकाशित होती थी। इसके 66वें अंक में लोगों को सूचना दी गई कि ‘केसरी’ और ‘मराठा’ दो समाचार पत्रों का प्रकाशन किया जाएगा। इसी अंक में इन दो समाचार पत्रों के प्रकाशन की नियमावली भी प्रकाशित की गई। तिलक के सहयोगियों-चिपलूणकर, आगरकर, गर्दे और बी.एम. नामजोशी के संयुक्त हस्ताक्षरों के साथ ‘केसरी’ का घोषणापत्र प्रकाशित हुआ। इसमें कहा गया था कि इसमें अन्य पत्रों की भांति समाचार, राजनीतिक घटनाएं, व्यापार के साथ ही सामाजिक विषय पर निबंध, नई पुस्तकों की समीक्षा और इंग्लैंड की नई राजनीतिक घटनाओं की भी चर्चा की जाएगी। इस घोषणापत्र ने यह साफ कर दिया कि ये दोनों समाचार पत्र अन्य पत्रों की तरह प्रचलित शासन व्यवस्था की चापलूसी नहीं करेंगे। इन दोनों पत्रों की विषय सामग्री एक ही थी। अंतर केवल इतना था कि ‘केसरी’ पत्र मराठी भाषा में प्रकाशित होता था और ‘मराठा’ पत्र अंग्रेजी भाषा में। दोनों पत्रों का एकमात्र उद्देश्य देशवासियों में स्वाधीनता की भावना का विकास करना था।

 ‘मराठा’ का पहला अंक 2 जनवरी 1881 को और ‘केसरी’ का पहला अंक 4 जनवरी 1881 को प्रकाशित किया गया। ‘केसरी’ के संपादन का कार्य गंगाधर तिलक करते थे और आगरकर ‘मराठा’ के संपादक थे। ‘केसरी’ के प्रथम अंक के प्रकाशन के बाद खुद तिलक ने घर-घर जाकर इसकी प्रतियां ग्राहकों को पहुंचाई थी।

 ‘केसरी’ और ‘मराठा’ दोनों पत्रों के संस्थापक स्पष्टवादी और निर्भीक थे। इनके ग्राहकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी। समाचार पत्रों की लोकप्रियता के साथ-साथ तिलक की भी लोकप्रियता बढ़ने लगी। लोगों को भी ये विश्वास हो गया कि ये लोग न केवल समाज सुधारक हैं बल्कि देशभक्त भी हैं। दोनों पत्रों में देशी रियासतों के प्रबंध के बारे में बराबर लिखा जाता था। इसका कारण यह था कि इन देशी रियासतों को स्वतंत्रता और परंपरा का संरक्षक समझा जाता था। संपादकों की लेखनी ब्रिटिश सरकार के लिए तीखी रहती थी। इस तथ्य को 24 अप्रैल 1881 में प्रकाशित एक लेख स्पष्ट करता है, ‘इतिहास के छात्रों की तेज नजर ने देश में अंग्रेजों के बढ़ते हुए कदम तथा देशी युवराजों के साथ दुर्व्यवहार को अच्छी तरह से जान लिया है। वे जान गए हैं कि सरकार उन पर हावी रहती है और उन्हें आश्रित (मातहत, दास) बना लिया है।’

गणपति और शिवाजी उत्सव 

बाल गंगाधर तिलक देश का विकास धार्मिक और सामाजिक विकास के साथ-साथ करना चाहते थे। प्राचीन काल से ही भारत अपने गौरवान्वित इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। यहां तक कि महाराष्ट्र को तो वीर भूमि कहा जाता है। ऐसे में जब तिलक ने मराठियों को गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए देखा तो ये सहन नहीं कर पाए। अंग्रेजों की ‘फूट डालो शासन करो’ की नीति को विफल करने व सभी भारतीयों को एक सूत्र में बांधने के लिए गणपति उत्सव और उनके सोए हुए वीरत्व को जगाने के लिए शिवाजी उत्सव शुरू किया।

अशांति का दौर 

1893 में बंबई और पूना के साथ अन्य राज्यों में भी हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़के। इससे आहत तिलक ने 15 अगस्त 1893 को अंग्रेजी शासन को चेतावनी देते हुए कहा, ‘सरकार से लगातार प्रोत्साहन मिलने के कारण मुस्लिमों ने आक्रामक व्यवहार अपना लिया है, जिसका कारण सिर्फ इतना है कि ब्रिटिश स्वयं को मुस्लिमों का संरक्षक कहते हैं। ब्रिटिशों का कहना था कि केवल वो ही मुस्लिम संप्रदाय को हिंदुओं से सुरक्षित रख सकते हैं। दोनों धर्मों के शिक्षित नेताओं के मंतव्यों को लेकर कोई वास्तविक झगड़ा नहीं है, झगड़ा तो अशिक्षित, अनपढ़ों के बीच में है। यदि ऐसे लोगों को काबू में रखना है तो सरकार को किसी एक का पक्ष लेने की नीति छोड़नी होगी।’  तिलक के इन लेखों और भाषणों को आधार बनाकर कई ब्रिटिश अधिकारियों ने इनके खिलाफ लोगों को भड़काने की कोशिश की। इनमें सबसे आगे था, सर वैलेन्टाइन शिरोल। इसने अपने लेख ‘इंडियन अनरेस्ट में तिलक को ‘फादर ऑफ इंडियन अनरेस्ट’ (भारतीय अशांति का जनक) कहा था। 

भारत में 1876-1900 के बीच में सबसे ज्यादा अकाल पड़े। इस बीच में 18 बार भारतवासियों ने अकाल के प्रकोप को सहन किया। 1896 में भारत में जब अकाल पड़ा तो तिलक ने अपनी पत्रिका ‘केसरी’ के माध्यम से लेख लिखकर भारत की वास्तविक परिस्थिति से अवगत कराया। एक तरफ तो किसान अकाल के कारण कष्ट झेल रहे थे, वहीं सरकार ने उनकी लगान को माफ नहीं किया। इस पर तिलक ने किसानों को भी उनके हक के लिए मांग करने के लिए प्रेरित किया। भारतीयों के हित की बात आने पर तिलक ने अपने समाचार पत्रों और पूना की सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से सीधे ही सरकार से जनता के हितांे में प्रश्न उठाए। अपने इन कार्यों से तिलक सरकार की आंख में कांटे की तरह चुभने लगे थे। तिलक ने बिना किसी स्वार्थ की भावना के किसानों के हित के लिए सरकार के खिलाफ आवाज उठाई थी। इनके इस कार्य ने किसानों का दिल जीत लिया। ये अब बुद्धिजीवी समाज के साथ-साथ सामान्य जनता के भी दिलों पर राज करने लगें। अब लोग उन्हें ‘लोकमान्य’ कहने लगे।

बंग-भंग

1899 में भारत में गवर्नर के रूप में नियुक्त होकर लार्ड कर्जन भारत आया। उसने भारत आते ही बंगाल प्रांत को दो भागों में बांट दिया। इस विभाजन के मुख्यतः दो कारण थे, पहला कारण था कि बंगाल में मुस्लिम अधिक होने के बाद भी हिंदू और मुस्लिम एकता के साथ रहते थे। कर्जन ने राज्य की अच्छी व्यवस्था करने की आड़ में बंगाल के दो टुकड़े कर दिए। हिंदी बाहुल्य क्षेत्र की राजधानी कलकत्ता और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र की राजधानी ढाका घोषित की गई। इस बंटवारे का देशव्यापी विरोध हुआ। इस बंटवारे की रूपरेखा 1903 में ही बना दी गई थी और तभी से इसका विरोध किया जा रहा था। लेकिन इसे लागू 1905 में करना निश्चित किया गया। इस दौरान देश में लगभग 500 से अधिक सभाएं व विरोध प्रदर्शन हुए। इसी दौरान लाल-बाल-पाल की तिकड़ी का निर्माण हुआ, जो कांग्रेस के उग्र दल के विचारक माने जाते हैं। इस तिकड़ी में लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल थे। 

बंगाल विभाजन के समय तिलक के उग्रवादी विचारों के कारण इन्हें राजद्रोह के आरोप में एक बार फिर से 1908 में छह साल की सजा सुनाकर देश से निष्कासित कर दिया। तिलक को देश से निष्कासित करके मांडले जेल में रखा गया। मांडले जेल में रहते हुए तिलक ने दो नए ग्रंथों, ‘गीता-रहस्य’ और ‘द आर्कटिक होम ऑफ द आर्यन’ की रचना की। ये दोनों ग्रंथ तिलक के विशाल ज्ञान, ऐतिहासिक शोध और उच्च विचारों के परिचायक बनें। 

स्वदेश वापसी 

तिलक मांडले से रिहा होकर 1914 में भारत आए। भारत आते ही उन्होंने फिर से राष्ट्रीय हित के लिए कार्य करना शुरू कर दिया। पूना की बहुत सी संस्थाओं ने तिलक के सम्मान में सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया। इन सभाओं में तिलक को आमंत्रित किया गया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए भाषण दिया, ‘मेरा देश से 6 साल का निष्कासन मेरे देशप्रेम की परीक्षा था। मैं स्वराज्य के सिद्धांत को नहीं भूला हूं। इसके कार्यक्रमों में कोई भी बदलाव नहीं किया जाएगा, ये पहले की तरह ही कार्यान्वित होंगे।’तिलक ने जेल से बाहर आने के बाद कांग्रेस के दोनों दलों को एक करने का प्रयास किया लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। 1916 में तिलक एनी बेसेंट द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन से जुड़ गए,जिसका उद्देश्य स्वराज्य की प्राप्ति था। तिलक होमरूल के उद्देश्यों से लोगों को परिचित कराने के लिए विभिन्न गांवों में घूमें। ये अपने कार्यों के माध्यम से अब एक जनप्रिय नेता बन गए।

अंतिम समय

1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड की उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से आलोचना की और बहिष्कार के आंदोलन को जारी रखने की अपील की। उन्होंने इस संदर्भ में सांगली, हैदराबाद, कराची, सोलापुर, काशी आदि स्थानों पर भाषण भी दिए। 1920 तक आते-आते ये काफी कमजोर हो गए थे। 1 अगस्त 1920 को स्वाधीनता के इस महान पुजारी ने इस संसार से अंतिम विदा ली।  



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