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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

अंटार्कटिका से टूटा सबसे बड़ा हिमखंड

अंटार्कटिका से अलग होने वाला यह हिमशैल खंड वहां मौजूद चौथे सबसे बड़े हिम चट्टान लार्सेन सी का एक बड़ा हिस्सा है

विश्व के दक्षिण में स्थित ध्रुव पर ​स्थित अंटार्कटिका से भारत की राजधानी दिल्ली के आकार से भी चार गुना बड़ा हिमखंड टूट गया है, जो अपने साथ तबाही का मंजर लेकर आ रहा है। वैज्ञानिकों ने कहा कि करीब एक खरब टन का हिमशैल (अब तक के दर्ज आंकड़ो में सबसे बड़ा) कई महीनों के पूर्वानुमान के बाद अंटार्कटिका से टूटकर अलग हो गया है। अब दक्षिणी ध्रुव के आसपास जहाजों के लिए ये गंभीर खतरा बन सकता है। लार्सन सी बर्फ की चट्टान में से 5,800 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा अलग हो जाने से इसका आकार 12 फीसदी से ज्यादा घट गया है और अंटार्कटिका का परिदृश्य हमेशा के लिए बदल चुका है। बताया जा रहा है कि इसका असर भारत के अंडमान-निकोबार और सुंदरबन डेल्टा पर भी पड़ सकता है।

अंटार्कटिका में हमेशा हिमशैल खंड अलग होते रहते हैं, लेकिन यह खास तौर पर बड़ा है, ऐसे में महासागर में सामने के इसके रास्ते पर निगरानी की जरूरत है। इसका कारण यह है कि यह नौवहन यातायात के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। बरसों से पश्चिमी अंटार्कटिका हिम चट्टान में बढ़ती दरार को देख रहे शोधकर्ताओं ने कहा कि यह घटना 10 जुलाई के बाद किसी समय हुई है। इस हिमशैल को ए-68 नाम दिए जाने की संभावना है। एक खरब टन से ज्यादा वजनी इस हिमशैल का विस्तार सबसे बड़ी लहरों में से एक लेक इरी के विस्तार से दो गुना है। अंटार्कटिका से अलग होने वाला यह हिमशैल खंड वहां मौजूद चौथे सबसे बड़े हिम चट्टान लार्सेन सी से भी बहुत बड़ा है। इस हिमखंड का वजन खरबों टन बताया जा रहा है और यह संभवतः अब तक का सबसे बड़ा टुकड़ा है जो हिम चट्टान से अलग हुआ है। इस हिमखंड का आकार 5 हजार 80 वर्ग किलोमीटर है।

यह गोवा के आकार से डेढ़ गुना बड़ा और अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर से सात गुना बड़ा है। वैज्ञानिकों की मानें, तो लार्सेन सी के अलग हो जाने से वैश्विक समुद्री स्तर में 10 सेंटीमीटर की वृद्धि हो जाएगी। महाद्वीप के पास से गुजर​ते जहाजों के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वे के मुताबिक, यह हिमखंड 10 और 12 जुलाई के बीच टूटकर अलग हुआ। वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र स्तर पर इस हिमखंड के अलग होने से तत्काल असर नहीं आएगा, लेकिन यह लार्सेन सी हिम चट्टान के फैलाव को 12 प्रतिशत तक कम कर देगा। लार्सेन ए और लार्सेन बी हिम चट्टान साल 1995 और 2002 में ही ढहकर खत्म है।

भारत पर असर

वैज्ञानिकों ने इस हिमखंड के अलग होने के पीछे कार्बन उत्सर्जन को सबसे बड़ी वजह बताया है। उनके मुताबिक कार्बन उत्सर्जन से वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, जिससे ग्लेशियर जल्दी पिघलते जा रहे हैं। समुद्री स्तर में बढ़ोतरी होने से अंडमान और निकोबार के कई द्वीप और बंगाल की खाड़ी में सुंदरवन के कई हिस्से डूब सकते हैं। अरब सागर की तरफ इसका असर कम होगा, लेकिन यह लंबे समय में वहां भी दिखेगा। भारत की 7 हजार 500 किलोमीटर लंबी समुद्र तटीय रेखा को इससे खतरा बताया जा रहा है।  (एजेंसी)  



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