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रविवार, 16 जून 2019

लीला मिश्रा - अभिनय की बनारसी ‘लीला’

दशकों तक फिल्मी दुनिया का हिस्सा होते हुए भी उससे अलिप्त रहीं लीला मिश्रा का अभिनय सफर अपनी देशजता को हर हाल में बहाल रखने की जिद की अनूठी मिसाल है

फिल्म ‘शोले’ में मौसी के किरदार में अभिनेत्री लीला मिश्रा ने जरूर लोकप्रियता की बुलंदी तक पहुंची, पर उनके सिने-सफर को देखें तो उनके अभिनय के कई और भी आयाम हैं। कभी वह ‘राम और श्याम’ में दिलीपकुमार (राम) की मां बनीं, तो कभी ‘दासी’ में मौसमी चटर्जी की ‘मामी’। दिलचस्प है कि कभी लीला मिश्रा को पर्दे पर अपना काम देखने के लिए सिनेमाघर जाना भी पसंद नहीं था। उन्होंने अपने ‘पवित्र बनारस’ वाले भाव को मुंबई में भी बरकरार रखा और फिल्में नहीं देखती थीं, यहां तक कि ‘शोले’ और सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ भी नहीं।
लीला मिश्रा के लिए फिल्मों में अभिनय करना नौकरी करने जैसा था। फिल्मों के ग्लैमर से वह हमेशा दूर रहीं। 1987 में ‘माधुरी’ में इशाक मुजावर की लिखी उनकी जीवन-कथा के अंशों से पता चलता है कि लीला के अभिनय जीवन में भी निरूपा राय की तरह पति के अभिनय के शौक ने बड़ी भूमिका निभाई थी। लीला की शादी 12 वर्ष की उम्र में हो गई थी और उनके पति राम प्रसाद मिश्रा को अभिनय का भारी शौक था। वे आगा हश्र कश्मीरी के नाटकों में काम करते थे। लेकिन उन्हीं दिनों बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ। इसीलिए नाटकों के कलाकारों के लिए उस नए माध्यम के दरवाजे भी खुले थे। इसी सिलसिले में राम प्रसाद प्रतापगढ़, बनारस और मुंबई आते-जाते रहते थे।

500 रुपए वेतन
मिश्रा जी को मुंबई में एक फिल्म कंपनी में नौकरी तो मिल गई,जहां खाना उन्हें मेहर सुलतान नामक एक अभिनेत्री बनाकर देती थी। मेहर की सलाह पर मिश्राजी ने पत्नी को बंबई बुला लिया। उन दिनों सिनेमा की सबसे बड़ी समस्या थी, अभिनेत्रियों की कमी। अभिनय करने वालों को बिरादरी से बाहर कर दिया जाता था। फिर लीला मिश्रा और उनके पति दोनों तो जमींदार परिवार के थे। इसीलिए जब नासिक की एक फिल्म कंपनी ने लीला को अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव रखा, तो निर्णय लेना काफी मुश्किल था। कंपनी ने भी लीला को पांच सौ रुपए महीने का वेतन ऑफर किया था। उन दिनों उनके पति को मासिक 150 रुपए मिलते थे। ऐसे में पति-पत्नी ने परिवारजनों और बिरादरी से संबंध को जोखिम में डालकर भी उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वह फिल्म थी ‘सती सुलोचना’ और लीला मिश्रा को ‘मंदोदरी’ की भूमिका मिली थी। मगर लीला तो बनारस की एक घरेलू औरत थीं, जिन्हें पराए मर्द का छूना तक नागवार था। यहां तक कि पहली बार जब मेकअप मैन ने उनके चेहरे को छुआ तब वहां मौजूद अपने पति से वे बेहद नाराज हो गईं कि ये कैसे मर्द हैं, जो अपनी पत्नी के चेहरे को पराए मर्द के हाथों स्पर्श करवा रहे हैं? इसीलिए किसी पराए पुरुष (अभिनेता) के गले में हाथ डालकर उससे प्रेमालाप करने का तो सवाल ही कहां उठता था? परिणाम यह हुआ कि उस फिल्म से उन्हें निकाल दिया गया। 
मगर इससे एक फायदा यह हुआ कि कोल्हापुर की एक अन्य कंपनी ने उन्हें ऑफर दिया। उनकी तनख्वाह फिर एक बार 500 रुपए तय हुई और दो साल का करार किया गया। मगर यहां भी वही दिक्कत आई। इस फिल्म में भी उन्हें हीरो मास्टर विनायक (अभिनेत्री नंदा के पिताजी) के गले में हाथ डालकर उन्हें लुभाना था। ‘मौसी’ फिर अड़ गईं कि वह ऐसे दृश्य नहीं करेंगीं। अब कंपनी के लिए मुश्किल आ गई कि कॉन्ट्रेक्ट में तो कुछ लिखा नहीं था कि अभिनेत्री को क्या क्या करना होगा? लिहाजा उस पिक्चर के निर्माण के दौरान बिना काम किए वेतन देना पड़ा। इसीलिए जब नई फिल्म ‘होनहार’ का शूटिंग प्रारंभ हुई तब कंपनी को उन्हें ऐसा काम देना था, जिसमें पराए मर्द से ‘नैन मटक्का’ करना न हो। 
आखिरकार एक ऐसा रास्ता निकाला गया, जिससे दोनों की बात रहे। लीला मिश्रा से हीरो शाहू मोडक की माता की भूमिका करवाई गई। तब से चरित्र अभिनेत्री बन गईं लीला अंत तक उसी तरह की भूमिकाएं करतीं रहीं। उनकी बतौर नायिका आई एक मात्र फिल्म ‘गंगावतरण’ को छोड़ दें तो लीला मिश्रा हिंदी सिनेमा की शायद एकमात्र अभिनेत्री होंगी, जिन्होंने अपनी कम उम्र से ही अपने से उम्र में बड़े अभिनेता-अभिनेत्रीओं की माता, चाची या मौसी की भूमिकाएं कीं।

बार-बार बनारस लौटना 
‘गंगावतरण’ दादा साहब फाल्के की एकमात्र सवाक फिल्म थी। जैसा कि सभी जानते हैं, भारतीय सिनेमा की प्रथम (मूक) फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाने वाले फाल्के ही थे। ‘गंगावतरण’ उनकी अंतिम फिल्म साबित हुई और लीला मिश्रा के लिए भी। क्योंकि उस कंपनी के साथ अनुबंध समाप्त हो गया था। अब काम नहीं होने के कारण तथा अपनी प्रथम संतान के जन्म के लिए गर्भवती लीला मिश्रा और उनके पति वापस बनारस चले गए। यानी अपनी जिंदगी में मां बनने से पहले ‘मौसी’ ने पर्दे पर अपने से बडी उम्र के कलाकारों की माता की भूमिका करना शुरू कर दिया था। लीला ने जब प्रथम संतान के रूप में बेटी के जन्म के बाद फिर से काम ढूंढने का प्रयत्न किया तो कलकत्ता में फिल्म कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में उन्हें नौकरी मिल गई। यहां उन्होंने ‘चित्रलेखा’ जैसी कुछ फिल्में कीं। मगर उसी दौरान विश्व युद्ध हुआ और सारी गतिविधियां ठप हो गईं। एक बार फिर वह वापस बनारस आ गईं। अब उनका तीन बच्चों (दो बेटियां और एक बेटे) वाला परिवार था।  बाद में उन्होंने फिर से बंबई का रुख किया। अब कि बार काम आए बनारस के कैमरामैन ‘केजी’,जिन्होंने उन्हें लीला चिट​िणस से मिलवाया। ‘मौसी’ अपने परंपरागत तरीके से लंबा घूंघट निकालकर स्टुडियो पहुंचीं। तब के जी ने उन्हें समझाया तो वह अपना चेहरा दिखाकर इंटरव्यू देने के लिए तैयार हुईं। लीला चिट​णिस ने अपनी साथी कलाकार के रूप में ‘किसी से न कहना’ के लिए लीला मिश्रा को पसंद किया। तब से मुंबई की फिल्मों में ‘मौसी’ का जो सफर शुरू हुआ, वो लंबे समय तक जारी रहा।

बनारसी अंदाज
 ‘मौसी’ की याद आते ही अपने सिर को ढंकने के लिए साड़ी को ठीक करती प्रौढ़ महिला ही नजरों के सामने आती है। उनके बोलने का अंदाज भी बनारसी था। इसीलिए भारतीय पृष्ठभूमि की फिल्में बनाने वाले ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की तो लीला मिश्रा जैसे स्थायी सदस्या ही थीं। इतनी सारी फिल्मों में काम करने के बावजूद लीला कई हीरो-हीरोइन को पहचान नहीं सकती थीं। उन्होंने खुद 1978 के एक साक्षात्कार में बताया था कि ‘दुश्मन’ की शूटिंग के पहले दिन राजेश खन्ना को वह पहचान नहीं पाई थीं। फिल्मी दुनिया का हिस्सा होते हुए भी उससे अलिप्त रहीं इस चरित्र अभिनेत्री ने 1988 की 17 जनवरी के दिन अंतिम सांस ली।



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