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शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

जीत फेडरर की, संन्यास बार्तोली का

28 साल की उम्र में फ्रांस की टेनिस स्टार मरियन बार्तोली के रिटायरमेंट की घोषणा ने सबको चौंकाया

इस बार विंबलडन टाइटल जीता है स्विटजरलैंड के रोजर फेडरर ने, लेकिन मीडिया में यह खबर महज इस तरह नहीं आई। दरअसल, फेडरर के विंबलडन जीतने के साथ ज्यादा दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने आठवीं बार विंबलडन टाइटल जीता और वह भी 36 साल की रिकाॅर्ड उम्र में। पर यह फेडरर की जिजीविषा ही थी, जिसने कोर्ट पर उनकी वापसी करवाई और उन्हें बना दिया चैंपियंस का भी चैंपियन। फेडरर का यह 19वां ग्रैंडस्लैम खिताब है। अलबत्ता खेल और उससे जुड़े करियर में एक अहम एंगल जेंडर का भी है। इस बात को समझने के लिए चार साल पहले एक करामाती महिला विंबलडन खिलाड़ी के अचानक संन्यास की घोषणा से जुड़ी कुछ बातों को याद करना जरूरी है।

दरअसल हम बात कर रहे हैं फ्रांस की टेनिस स्टार मरियन बार्तोली की, जिसने 28 साल की उम्र में संन्यास की घोषणा करके सबको चौंका दिया था। एक बड़ी सफलता पाना और फिर पूरी होड़ से बाहर हो जाना, यह अस्वाभाविकता किसी के गले नहीं उतर रही थी। फ्रांस की इस टेनिस स्टार ने भी संन्यास से पहले विंबलडन में महिला एकल का खिताब अपने नाम किया था। लोगों की निगाहें उसकी इस जीत के बाद इस बात पर थी कि क्या बार्तोली यूएस ओपन में भी अपनी जीत का सिलसिला बनाए रख पाएंगी? लोग अभी इस बारे में कयासबाजी में ही लगे थे कि बार्तोली ने खेल से संन्यास लेने का फैसला कर सबको चौंका दिया। यूरोपियन मीडिया में इस पर काफी कुछ लिखा-कहा गया, पर बार्तोली ने इस बारे में सिर्फ इतना कहा है,'मैंने यह फैसला आसानी से नहीं लिया है।’  फैसला लेने की जो बड़ी वजह बार्तोली ने बताई, वह चोट और दर्द से बढ़ी परेशानी थी, पर लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि वजह इतनी भर होगी। कुछ और बातें भी इस दौरान चर्चा में आईं। विंबलडन में बार्तोली के मैदान में उतरने से करीब घंटे भर पहले बीबीसी के कमेंटेटर जॉन इनवरडेल ने एक भद्दी टिप्पणी की। इनवरडेल ने कहा, 'वह कम से कम अपनी सुंदरता के लिए तो नहीं जानी जाएंगी।’ बाद में इस मामले में बीबीसी को बार्तोली से माफी मांगनी पड़ी। एक 28 साल की महिला के खेल जीवन की सार्वजनिक प्रताड़ना और मानसिक रूप से ठेस पहुंचाने के मौके कितने आते होंगे, यह इस प्रकरण से जाहिर है। 

फ्रांस की इस स्टार टेनिस खिलाड़ी ने जरूर कहा कि उसने शरीर पर कई चोट और दर्द से आजिज आकर टेनिस रैकेट रखा है। पर मुमकिन है कि उसके मन पर और भी कई घाव हों। खेल और ग्लैमर का साझा आज के दौर में जरूरी हो गया है। इसकी अवहेलना करके कोई आगे बढ़ना चाहेगा तो शायद वह उसी हश्र तक पहुंचेगा जहां बार्तोली पहुंची हैं। हालांकि ऐसे किसी निष्कर्ष पर बार्तोली खामोश रहीं। आम महिला टेनिस खिलाड़ियों के मुकाबले थोड़े ठिगने कद की बार्तोली का जन्म दो अक्टूबर 1984 को हुआ। 16 साल की उम्र में उसने यह तय कर लिया कि उसकी जिंदगी का मैदान टेनिस कोर्ट ही होगा। इससे पहले उसके पिता उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे। बाद में पिता को भी बार्तोली का फैसला सही लगा। पिता ही उसके टेनिस कोच बने। पिता और बेटी का गुरु-शिष्या का संबंध बेटी के खेल जीवन को अलविदा कहने तक जारी रहा। 

इस शिखर आरोहण में जिस एक बात से बार्तोली हमेशा दूर रही, वह थी ग्लैमर और गॉसिप की दुनिया। उनसे जब इनवरडेल की टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उसने न चाहते हुए भी कह दिया कि वह मॉडल अगर बन नहीं सकतीं तो बनना चाहती भी नहीं। उसे चैंपियन बनना था और वह उसने बनकर दिखा दिया। गौरतलब है कि इनवरडेल ने अमर्यादित तरीके से बार्तोली के चेहरे और कद के साथ पैरों तक पर अमर्यादित टिप्पणी की थी। कहना न होगा कि इस स्टार टेनिस खिलाड़ी के संन्यास ने खेल और पुरुष मानसिकता के बीच महिला अस्मिता की सुरक्षा के मुद्दे को कुछ समय के लिए जरूर चर्चा में ला दिया, पर बदला कुछ नहीं। फेडरर की जीत और उसकी बढ़ी उम्र को जो लोग साझी कामयाबी के तौर पर देखते हैं, उन्हें फेडरर के संन्यास से ज्यादा बार्तोली के संन्यास में दिलचस्पी लेनी होगी, क्योंकि इस दिलचस्पी के सरोकार हमारे समय में जारी लैंगिक दुराग्रह और गैरबराबरी से जुड़े हैं। 



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