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गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

अनिल माधव दवे - सूना हो गया ‘नदी का घर’

नर्मदा प्रेमी अनिल माधव दवे की प्रेरक स्मृति एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता और सौम्य राजनेता के तौर पर लंबे समय तक बनी रहेगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैबिनेट को लेकर हमेशा यह बात तो सुर्खी बनी कि इसमें कितने पॉलिटिकल स्टॉलवर्ट हैं, जबकि इस कैबिनेट की खासियत यह है कि इसमें स्वयंसेवकत्व के भाव से सार्वजनिक जीवन में आए लोगों को अवसर दिया गया है। ऐसे ही एक स्वयंसेवक थे अनिल माधव दवे। केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में जब उन्हें मोदी कैबिनेट में शामिल किया गया तो लोगों ने यह जाना कि पर्यावरण के साथ उनका रिश्ता नया नहीं है। अपने साठ साला जीवन को जिस सार्थकता और उद्देश्यपरकता के साथ दवे ने जिया, वह वाकई अभिभूत करने वाला है। 
अनिल माधव दवे को निस्संदेह एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता और सौम्य राजनेता के तौर पर याद किया जाएगा। नर्मदा को लेकर तो वे बहुत ही भावुक थे। भोपाल में अपने घर का नाम ही उन्होंने ‘नदी का घर’ रखा है, जिसे लोगों के लिए एक संग्राहलय के रूप में खोला गया है। दरअसल, मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी कही जाने वाली नर्मदा नदी के सम्मान की राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई की शुरुआत सबसे पहले अनिल माधव दवे ने ही की थी। ‘नर्मदा समग्र’ नामक संगठन बनाकर वे नर्मदा की स्वच्छता और उसके पवित्रता को पहचान देने के लिए प्रयास करते रहे। हौशंगाबाद के बांद्रा भवन में नर्मदा नदी के किनारे उन्होंने अपना एक आश्रम बना रखा था, जहां से नर्मदा और पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों की रूपरेखा तैयार होती थी। नर्मदा के किनारे उन्होंने देश—विदेश से लोगों को बुलाकर अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव के आयोजन की शुरूआत की। बीते वर्ष उज्जैन कुंभ में हुए ‘ज्ञान संगम’ के भी वही प्रमुख कर्ताधर्ता थे।
उनका जन्म महाकाल की नगरी उज्जैन के वडनगर में 9 जुलाई 1956 को हुआ था। उनके पर्यावरण प्रेम को देखते हुए ही पिछले साल कैबिनेट के विस्तार में पीएम मोदी ने उन्हें सरकार में शामिल करते हुए पर्यावरण मंत्री बनाया था। दिलचस्प है कि पर्यावरण से जुड़कर जीने वाले और पर्यावरण की चिंता के साथ आखिरी सांस लेने वाले दवे के लिए पर्यावरण प्रेम एक वंश परंपरा की तरह रहा। उनके पिता वन विभाग में कार्यरत थे। उनका निधन भी पिता की तरह असमय ही हुआ था। वे बेहद लो प्रोफाइल रहने वाले व्यक्ति थे। दवे तब छोटे ही थे कि उनके पिता का हृदयघात के वजह से निधन हो गया था। दवे के दादा, दादा साहब दवे का मध्य प्रदेश में बड़ा सम्मान था। 
अनिल माधव दवे की पर्यावरण को लेकर सोच और अभियानों में जोर हमेशा आधुनिकता के साथ पर्यावरण के संतुलन पर रहा। पर्यावरण और राष्ट्र प्रेरणा से भरे विषयों पर उन्होंने ‘सृजन से विसर्जन तक’, ‘चंद्रशेखर आजाद’, ‘संभल के रहना घर में छुपे हुए गद्दारों से’, ‘शताब्दी के पांच काले पन्ने’ और ‘नर्मदा समग्र’ जैसी किताबें लिखी हैं। उनके बारे में यह दिलचस्प है कि वे एक प्रशिक्षित पायलट भी थे। खूबी यह कि अपनी इस दक्षता को भी उन्होंने नर्मदा प्रेम को ही समर्पित किया। उन्होंने नर्मदा नदी के उदगम स्थल से लेकर उसके समुद्र में मिलने तक के सफर का खुद हवाई जहाज उड़ाकर 18 दिन की यात्रा की। इस तरह उन्हें नर्मदा के बहाव और उससे जुड़े संकट को तो समग्रता में समझने में मदद मिली ही, इस नदी के आसापास के जीवन को लेकर भी उनकी समझ बढ़ी। 
वे वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भी बेहद करीबी रहे। चौहान और दवे दोनों के साथ खास बात यह है कि वे दोनों नर्मदा प्रेमी हैं। यही वजह है कि जब दवे के निधन की सूचनी मिली, तो मुख्यमंत्री चौहान काफी भावुक हो गए। उनके ही शब्दों में, ‘बड़े भाई, घनिष्ठ मित्र अनिल माधव दवे के असामयिक निधन से हैरान हूं। यह निजी क्षति है। दवेजी के रूप में देश ने एक सच्चा देशभक्त और मां नर्मदा का सपूत खो दिया है। इसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।’
दवे की राजनीति और प्रकृति की बात करते हुए यह जानना भी दिलचस्प है कि उनके आदर्श छत्रपति शिवाजी थे। उन्होंने शिवाजी के प्रशासन और रणनीति का गहन अध्ययन किया था। उनका मानना था कि शिवाजी का प्रशासन बेहद आदर्श था, जिसे अमल में लाकर भारत को सर्वश्रेष्ठ बनाया जा सकता है। दवे की स्कूली शिक्षा गुजरात में हुई है, जिस वजह से गुजराती भाषा का उन्हें बेहद बढ़िया ज्ञान रहा है। उन्होंने स्नातक और एम. कॉम की शिक्षा भी इंदौर के गुजराती कॉलेज से पूरी की। दवे के भीतर नेतृत्व और सांगठनिक कौशल के बीज छात्र जीवन पर ही पड़ चुके थे। उन्होंने न सिर्फ जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया, बल्कि वे कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए। वे नेशनल कैडेट कोर की एयर विंग के सदस्य भी थे। इसके बाद दवे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और नर्मदा संरक्षण के लिए काम किया। 
पीएम मोदी के साथ उनके बेहतर रिश्ते बनने में उनके गुजराती भाषा के ज्ञान को भी एक अहम कारण माना जाता है। तभी उनके निधन पर प्रधानमंत्री ने कहा भी, ‘मेरे दोस्त और एक बहुत ही सम्मानित सहयोगी के अचानक निधन से हैरान हूं। पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवेजी को मेरी संवेदना। अनिल माधव दवे जी को जन सेवक के रूप में याद किया जाएगा। वह पर्यावरण के संरक्षण के प्रति बहुत ही जागरूक थे। मैं अनिल माधव दवेजी के साथ देर शाम तक प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर चर्चा कर रहा था। यह मौत मेरे लिए व्यक्तिगत नुकसान है।’
एक ऐसे दौर में जब नेताओं में जीते जी अपना नाम अमर करने की लालसा रहती है, दवे ने एक मिसाल कायम की है। उनके निधन के बाद उनके भाई ने जब उनकी वसीयत को जारी किया, तो अपने अपने इस विनम्र और प्रिय नेता को लेकर लोगों का उनके प्रति सम्मान और बढ़ गया। उन्होंने अपनी वसीयत 23 जुलाई 2012 को ही लिख दी थी। उन्होंने इसमें लिखा था कि उनकी स्मृति में न तो कोई स्मारक बनाया जाए, न कोई प्रतियोगिता आयोजित हो, न पुरस्कार दिए जाएं और न ही कहीं उनकी प्रतिमा लगाई जाए। उन्होंने लिखा था कि उन्हें याद करने का एक ही तरीका होगा कि पौधे रोपे जाएं और उन्हें बड़ा किया जाए। उन्होंने अपनी याद में नदी और जलाशयों को बचाने का काम भी करने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन साथ ही यह भी आग्रह भी किया कि इसमें भी उनके नाम का इस्तेमाल न किया जाए। नर्मदा के इस सेवक और राजनीति के इस विनम्र व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि।  



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