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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

कलम के सिपाही का विमर्श

प्रेमचंद की कथासम्राट की छवि बड़ी है, पर इससे आगे वे बीसवीं सदी के ऐसे विमर्श पुरुष थे, जिनकी बातें आज भी गौर से सुनी जानी चाहिए

प्रेमचंद को लेकर जब यह कहा जाता है कि वे ‘कलम के सिपाही’ या ‘कथासम्राट’ थे, तो उनके जीवन और अवदान का एक बड़ा पक्ष सामने आने से रह जाता है। निस्संदेह वे बड़े कथाकार थे, पर इससे आगे वे बीसवीं सदी के ऐसे विमर्श पुरुष थे, जिनकी बातें आज भी गौर से सुनी जानी चाहिए। तुलनात्मक तरीके से भले न सही, पर उनके जीवन और अवदान को समझने के लिए हम गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का उदाहरण सामने रख सकते हैं। प्रेमचंद की प्रासंगिकता को चिन्हित करते हुए उनके कथा संसार से बाहर उनके सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों को भी रेखांकित करने की जरूरत है। यह दरकार इसीलिए भी जरूरी है, क्योंकि जिस प्रगतिशील चिंतन और लेखन धारा से उन्हें जोड़कर या उसके सूत्रधार के तौर पर हम देखते हैं, वह धारा अब काफी क्षीण हो गई है। निश्चित तौर पर प्रेमचंद का देशकाल आज बदल गया है, पर अन्याय और शोषण से जुड़े जिन बुनियादी मानवीय सरोकारों पर उन्होंने अपना विमर्शी स्वर बुलंद किया था, वह आज भी सुनी जानी चाहिए। उन्होंने 19वीं सदी के अंतिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दशक तक भारत में फैली तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलाई। देश की स्वतंत्रता के प्रति उनमें अगाध प्रेम था। चौरीचौरा कांड के ठीक चार दिन बाद 16 फरवरी 1921 को प्रेमचंद ने भी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दिया था। इसी तरह 11 अगस्त 1908 को जब 15 वर्षीय क्रांतिकारी खुदीराम बोस को अंग्रेज सरकार ने निर्ममता से फांसी पर लटका दिया तो प्रेमचंद के अंदर का देश प्रेम हिलोरें मारने लगा और वे खुदीराम बोस की एक तस्वीर बाजार से खरीदकर अपने घर लाए और कमरे की दीवार पर टांग दी। खुदीराम बोस को फांसी दिए जाने से एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ नामक अपनी पहली कहानी लिखी थी, जिसके अनुसार- ‘खून की वह आखिरी बूंद जो देश की आजादी के लिए गिरे, वही दुनिया का सबसे अनमोल रतन है।’
प्रेमचंद की इस मुखरता को समझने के लिए तब के साहित्यिक परिदृश्य को भी समझना जरूरी है। कलम के इस सिपाही ने जब अपनी रचनात्मक सक्रियता बढ़ाई तो वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे साहित्यशिल्पी उस समय चरम पर थे। प्रेमचंद का इन लोगों की रचनाधर्मिता से कोई सीधा विरोध नहीं था, पर उन्हें लगा कि जो हालात हैं, उनमें छायावादी नहीं, बल्कि अभिधावादी तरीके से बात करनी जरूरी है। नतीजतन उन्होंने तब के समाज में व्याप्त छुआछूत, सांप्रदायिकता, हिंदू-मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे ज्वलंत मुद्दों से खुद को जोड़ा। एक लेखक से परे भी उनकी चिंताएं थीं जो उनकी रचनाओं में इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई है। 
अपने जीवन संघर्षों से प्रेमचंद ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं व हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता। यही कारण था कि प्रेमचंद ऊपर से जितने उद्विग्न थे, अंदर से उतने ही विचलित। वस्तुत: प्रेमचंद ऐसे राष्ट्र-राज्य की कल्पना करते थे, जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो- न वर्ण का, न जाति का, न रंग का और न धर्म का। प्रेमचंद का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और सांप्रदायिक-वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण था, जिसमें समता सर्वोपरि हो। यही कारण है कि 1933 में जब संयुक्त प्रांत के गवर्नर मालकम हेली ने कहा, ‘जहां तक भारत की मनोवृत्ति का हमें परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिए कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिए जवाबदेह हो।’ प्रेमचंद ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा, ‘जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुजरा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।’
प्रेमचंद ने अस्पृश्यता की समस्या को दूर करना सामाजिक समता के लिए अहम बताया। परंपरागत वर्णाश्रम व्यवस्था के संबंध में उन्होंने लिखा, ‘भारतीय राष्ट्र का आदर्श मानव शरीर है जिसके मुख, हाथ, पेट और पांव- ये चार अंग हैं। इनमें से किसी भी अंग के अभाव या विच्छेदन से देह का अस्तित्व निर्जीव हो जाएगा।’ प्रेमचंद अपने समय के सबसे बड़े नायक के सामाजिक सुधार के साथ भी लगातार कदमताल करते दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने 1932 में महात्मा गांधी द्वारा मैकडोनाल्ड अवार्ड द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन के विरोध में किए गए आमरण अनशन का समर्थन किया और गांधी जी के इन विचारों का भी समर्थन किया कि हिंदू समाज के लिए निर्वाचन की चाहे जितनी कड़ी शर्तें लगा दी जाएं, पर दलितों के लिए शिक्षा और जायदाद की कोई शर्त न रखी जाए और हरेक दलित को निर्वाचन का अधिकार हो। 
इसे वह प्रगतिशील समाज रचना में एक बड़ी बाधा मानते थे कि समाज के एक तबके को हर तरह के शोषण और अन्याय का शिकार बनाया जाए। उन्होंने दलितों के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के पट नहीं खोलने पर कहा, ‘विश्वनाथ किसी एक जाति या संप्रदाय के देवता नहीं हैं, वह तो प्राणी मात्र के नाथ हैं। उन पर सबका हक बराबर-बराबर का है।’ शास्त्रों की आड़ में दलितों के मंदिर प्रवेश को पाप ठहराने वालों को जवाब देते हुए प्रेमचंद ने ऐसे लोगों की बुद्धि व विवेक पर सवाल उठाया और कहा, ‘विद्या अगर व्यक्ति को उदार बनाती है, सत्य व न्याय के ज्ञान को जगाती है और इंसानियत पैदा करती है तो वह विद्या है और यदि वह स्वार्थपरता व अभिमान को बढ़ावा देती है, तो वह अविद्या से भी बदतर है।’ 
राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संकल्प तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक देश में हिंदू-मुस्लिम एका की नींव गहरी और मजबूत नहीं होगी। प्रेमचंद इस बात को बहुत पहले समझ चुके थे। वे इस बात से तो संतुष्ट दिख रहे थे कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में दोनों धर्मों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर सड़कों पर निकले और आत्मोत्सर्ग की बड़ी मिसालें पेश कीं। पर वे यह भी देख रहे थे कि समाज में इन दोनों धर्मों के लोगों के बीच दूरियां भी हैं, जिन्हें समय रहते पाटने की जरूरत है। ऐसा कहते हुए वे एक-दूसरे की संस्कृति और परंपरा को भी पर्याप्त आदर देने की वकालत कर रहे थे। उन्होंने एक दूसरे के धर्म का परस्पर आदर करने पर जोर देते हुए कहा, ‘हिंदू और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे, न होंगे और न होने चाहिए। दोनों की पृथक-पृथक सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी।’ 
दरअसल, साहित्य से इतर सामाजिक विमर्शों में प्रेमचंद के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिंदा हैं। प्रेमचंद जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चित रूप से इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद में सोए इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है, जिन्हें प्रेमचंद ने काफी पहले मुखरता से रेखांकित किया था। समता और सौहार्द के साथ उच्च सामाजिक परंपरा का निर्माण और निर्वाह उनके सपनों के भारत में रंग भरते थे। इन रंगों की कमी आज भी भारतीय समाज के बीच कलम के इस दुर्धष योद्धा को सबसे जरूरी विमर्शी पुरुष के तौर पर चिह्नित करती है।  



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