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गुरुवार, 24 अगस्त 2017

‘स्वच्छता अभियान के लिए दिल से प्रार्थना है’ - अनुराधा पौडवाल

हिंदी फिल्मों में पार्श्व गायान से करियर की शुरुआत करने वाली अनुराधा पौडवाल इन दिनों समाज सेवा में जुटी हैं। अनुराधा पौडवाल से कई मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार त्रिदीब रमण ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के मुख्य अंश

मोदी जी के स्वच्छता अभियान के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
स्वच्छता अभियान बहुत जरूरी है। इसके लिए मैं दिल से भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मोदी जी को इसमें बहुत सफलता मिले। मैने देखा है कि लोग इंडिया में सड़क पर कहीं भी थूकते और कचरा फैलाते हैं। क्या उन्हें विदेशों में थूक नहीं आती। वह लोग यह सोचते हैं कि इंडिया अपना घर है यहां सब चलता है। ये नहीं सोचते कि हमें अपने घर को स्वच्छ रखना चाहिए।

45 सालों के करियर के बाद आपको पद्मश्री मिला तो क्या आपको लगता है कि बहुत देर हुई?
ईमानदारी से बताऊं तो 10-15 साल पहले मुझे लगा था कि मुझे पद्मश्री के लिए अप्लाई करना चाहिए। उसके कुछ समय बाद हमने डिसाइड किया कि मुनष्य को किसी अवार्ड के लिए काम नहीं करना चाहिए, बल्कि लोगों की मदद और इंसानियत के लिए काम करना चाहिए। फिर हमने पद्मश्री के बारे में सोचना बंद कर दिया। मुझे बिल्कुल भी आइडिया नहीं था कि इस तरह पद्मश्री मिलेगा, क्योंकि मैं पिछले एक डेढ़ साल से सोशल वर्क कर रही हूं। हम किसानों, मरीजों, यूनिवर्सिटी, वीमेन इंपावरमेंट और कुछ बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। जब मुझे  पद्मश्री दिया गया तो मेरी मां कहती हैं कि गाने से पद्मश्री मिलता है। ये तो सिर्फ गाने गाती है। 
 
किसानों के लिए आप क्या कर रही हैं?
हमारे प्रोफेशन में कई प्रोग्राम होते रहते हैं, जिसके माध्यम से हम लोगों से सीधे तौर पर जुड़ते हैं। हम अपने सभी प्रोग्राम में यही कोशिश करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रोत्साहित किया जा सके। इसके लिए हम कई प्रोग्राम कराते हैं, इन प्रोग्रामों के जरिए हम किसानों को प्रोत्साहित और जागरूक करते हैं। अभी हाल ही में हमारा प्रोग्राम हुआ था तो हमने किसानों को जागरूक करने के लिए उन्हें मिर्च के बीज दिए और उनकी वाइफ को चिली ग्राइंडिंग की मशीन । 

आपने किसानों के लिए किस क्षेत्र में काम करना शुरू किया?
किसानों को आत्महत्या करते देखा तो मैंने उन्हें प्रोत्साहित करने का फैसला किया। मैंने ये काम विदर्भ और मराठवाड़ा में शुरू किया है। इसके लिए मोहन भागवतजी ने हमें अप्रोच किया। आजकल ज्यादा से ज्यादा लोगों को डाइलिसिस की जरूरत होती है। इसके लिए हम कोशिश करते हैं कि जहां लोगो को 2500 रुपए देने पड़ते हैं, वहीं हम उन्हें 250 रुपए में डाइलिसिस की सुविधा उपलब्ध कराएं। यह सभी कार्य हम सूर्योदय फांउडेशन के साथ मिलकर कर रहे हैं। सूर्योदय के कई प्रोजेक्ट हैं, मैं वहां मोटिवेटर की तरह काम करती हूं। हमारा उद्देश्य लोगों को मोटिवेट करना और जागरूक करना है।

गो रक्षा के मामले पर आपके क्या विचार है?
यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं हैं। सबके लिए देश अपने घर की तरह होता है और हमें अपने घर में ये आजादी होनी चाहिए कि हम अपनी भावनाओं को सबके सामने रखें। गो रक्षा को लोग पर्सनल एजेंडा बना रहें हैं। यह अपनी भावना है, जिसकी भावना मां जैसी मानने की है वो मानता है, जिसकी नहीं है वह नहीं मानता है, इस पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए। 

1973 में एस डी बर्मन साहब ने ‘अभिमान’ फिल्म के लिए आपको बड़ा ब्रेक दिया और फिर 1976 तक इंतजार करना पड़ा?
नहीं ऐसा नहीं है, 1973 में ही जयदेव जी ने हमसे फिल्म ‘कालीचरण’ के लिए गाने गवाए थे, वह रिलीज भी हुई। हां वो अलग बात है कि फिल्म ‘अभिमान’ 1976 में रिलीज हुई। सबकी अपनी अपनी डेस्टीनी होती है। उस फिल्म की भी अपनी डेस्टीनी थी। फिलहाल आजकल ये सब भी मायने नहीं रखता है, क्योंकि मुझे एक इंस्टीडेंस याद है एक बार मैं विदेश गई थी वहां 16 साल की एक लड़की का गाना हिट हो गया और उसे लिजेंड बना दिया गया, जबकि ऐसा नहीं होता है। लिजेंड को लिजेंड बनने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। 

जो आपकी यात्रा रही, आपको ‘हीरो’ का गाना मिला यह आपके लिए टर्निंग प्वांइट रहा?
‘हीरो’ के गाने प्रमोट हुए, इसके पहले जो भी गाने मिलते थे वह प्रमोट नहीं हुए। ‘तू मेरा जानू है’...., ‘लाल दुपट्टा मलमल का....’ ‘आशिकी’ फिल्म के गाने सभी हिट रहे। आपको बता दूं कि ‘हीरो’ फिल्म के बाद मैं जब दिल्ली गई तो लोगो ने ‘लाल दुपट्टा’ के गाने सुने तो कहा कि आपने पहले क्यों नहीं गाया। आप तो बहुत अच्छा गाती हैं, जबकि उस समय मुझे 12-14 साल हो गए थे गाना गाते हुए। इसमें क्या होता है कि जब तक आप दिखाई नहीं देते हैं तब तक कोई आपको नहीं जानता है।

 

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ कैसे रिश्ते रहे आपके?
वे मेरे मेंटर थे, उनके साथ मैंने बहुत काम किया है। लक्ष्मीकांत प्यारेलालजी के साथ मेरे अच्छे संबंध रहे, उनके साथ मैंने आपबीती से लेकर कई गाने गाए। मैं आज भी उनके गानों के साथ ही रियाज करती हूं। आपको बता दूं कि उनके गानों से हमेशा कुछ ना कुछ सिखने को मिलता है। मेरा हमेशा से उनके साथ गाना गाने का सपना रहा। उनके गानें बहुत कुछ सिखा जाते हैं। 

आपने पुराने गायकों के साथ गाने गाए फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ गाया, दोनों में अंतर क्या था?
मैंने सभी सिंगर के साथ गाया है, मन्नाजी के साथ भी गाया है, ऐसा था कि मदन मोहनजी को छोड़ कर मैंने शंकर जयकिशन, रामाचंद्रन, नौशाद, रफी साहेब, मन्ना डे, किशोर दा, तलत महमूद के साथ गाया, मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूं कि मैंने लता जी को छोड़कर पुराने-नए सभी गायकों के साथ गाना गाया। लक्ष्मीकांत प्यारेलालजी के बारे में कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। वह ज्ञान के भंडार थे। बता दूं कि जमीनी स्तर से जुड़ा हुआ नए एडाप्टबिलिटी के साथ जो म्यूजिक आया वह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर डी बर्मन के साथ आया। 

टी-सीरीज के साथ आने के बाद आप पूरी तरह से एक ही क्षेत्र में सिमट गई?
‘हीरो’ के बाद मल्टी सिंगर्स के गाने चलने लगे तो मुझे अच्छा नहीं लगा, इसीलिए मैं टी-सीरीज के साथ गाने लगी। मल्टी सिंगर्स के साथ ये था कि खुद की क्रिएटबिलिटी खत्म हो रही थी, जिससे मैं खुश नहीं थी। उस दौर में बहुत गाने हुए, लेकिन उसमें मेक योर मार्क वाली बात नहीं थी। उसके बाद हमने म्यूजिक कंपनी के लिए अप्रोच किया, जैसे म्यूजिक इंडिया। एचएमवी में लताजी और आशाजी काम कर रही थी तो वहीं कॉरिडोर में पंकजजी, अनूप जलोटाजी थे। उन्होंने कहा कि डिवोशनल की मार्केट नहीं है और हम आपके साथ डिवोशनल के लिए आपके साथ काम नहीं कर सकते, क्योंकि मार्केट में इसके साथ अच्छा रिस्पांस नहीं है। आपको हमारे साथ गीत करना चाहिए। मैंने कहा कि हमें गीत नहीं करना है, मुझे भजन गाना है। यह मेरी किस्मत थी जो मैं टी-सीरीज के साथ जुड़ी। मेरी गुलशन जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि उन पर वैष्णो माताजी की कृपा है, हम जो करते हैं वह बिकता है, तो हमने उनसे कहा कि अगर कृपा है तो ऑरिजिनल प्ले करो, वर्जन क्यूं प्ले करना। तब उन्होंने कहा कि ऑरिजिनल कैसे होगा। इसके लिए एक छोटे से एल्बम से काम शुरू किया गया जो सफल हुआ। उसके बाद 'लाल दुपट्टा मलमल का' पर काम किया गया, जिसकी मेगा सेल रही। 

आप प्राइवेट एल्बम का एक ट्रेंड लेकर आईं?
पहले सिर्फ दूरदर्शन था, जिसमें छायागीत आते थे, उसमें चलाने के लिए उन गानों को पिक्चराइज किया गया। एल्बम पहले से था उसे चलाने के लिए फिल्माया गया। दो एल्बम हिट हुए फिर ये सिलसिला बढ़ता गया। महेशजी एक अच्छे डायरेक्टर हैं। फिर महेशजी का आना हुआ, उन्होंने हमें काफी सहयोग किया। उनके आने के बाद टी-सीरीज ने डिवोशनल की दुनिया में इतिहास रच दिया। ‘आशिकी’ के 22 गाने पहले से ही रिकॉर्डेड थे।

गुलशन कुमार जी से क्या सीखा?
हमने देखा कि लोगों के लिए उन्होंने कम कीमत पर निस्वार्थ भावना से काम किया। मैंने उनसे डेडिकेशन के सुपरलेटिव क्वालिटी के बारे में सीखा। गुलशन कुमार एक डेडिकेटिव पर्सनालिटी थे। वह 24 घंटे गाने के ही बारे में सोचते थे। उन्होंने अपना सब कुछ म्यूजिक को दे दिया। उनके जाने के बाद कोई उनके जैसा नहीं हुआ। वह निस्वार्थ भावना से काम करते थे। जो कहा जाता है कि किसी के हाथों से उद्धार होना होता है ना तो वही हुआ। उस समय जो छोटे गायक सीखने के साथ ही साथ संघर्ष कर रहे थे। उनके लिए बिना पैसों के काम किया। उनके जैसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ और वह एक महान आत्मा थे।

आपकी इंडस्ट्री में तब डिमांड थी, फिर भी आपने टी-सीरीज नहीं छोड़ा?
ऐसा नहीं था, ‘आशिकी’ के हिट होने के बाद डिमांड बढ़ी। उसके पहले हमने खुद को टी-सीरीज के आर्टिस्ट की तरह प्रमोट किया। टी-सीरीज अपने आर्टिस्ट को पूरी फ्रीडम देता है, लेकिन तब जब आर्टिस्ट सिर्फ हमारे लिए काम करता है।  

आपको नहीं लगता कि आपने उस दौर के अच्छे गाने मिस कर दिए?
मैं ऐसा नहीं सोचती की मैंने अच्छे गाने मिस कर दिए। मुझे नहीं लगता कि उस दौर में 'नजर के सामने' और 'धीरे धीरे से' से अच्छा कोई गाना था। ईश्वर ने मुझे जो दिया मै उसके लिए उनकी आभारी हूं। मेरे डिवोशन और डेडिकेशन के लिए उन्होंने मुझे जिससे नवाजा वह मेरे लिए सबसे अच्छा था। मेरी 6 से 7 फिल्में ऐसी हैं, जिसमें अगर 10 गाने रहे तो 10 हिट रहे। 

क्या यही कारण है कि गुलशन जी के नहीं रहने पर आपने फिल्मी गानों को छोड़ दिया?
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मेरे मन में ये पहले से ही था कि मैं फिल्म इंडस्ट्री को छोड़ दूं , क्योंकि मैंने फिल्म इंडस्ट्री के कई दौर देख लिए थे। मैंने वसीपुर ऑफ काली में कहा था कि मां मुझे फिल्म इंडस्ट्री से उतना लगाव नहीं है, मैं टॉप पर पहुंच कर इसे छोड़ दूंगी। जब 'आशिकी' और 'दिल है कि मानता नहीं' हिट हुई तो हमने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी।

एक बार ऐसा हुआ कि आप बीमार हुईं और आपकी आवाज चली गई?
मेरे बचपन में ऐसा हुआ तो मै बहुत दुखी हुई थी। मैंने लताजी को सुना और मैंने यही ठाना की ये मेरी आवाज होनी चाहिए। मुझे इस बात का साइकोलॉजिकली इतना फायदा हुआ कि जब मैं बीमार थी और मुझे निमोनिया हुआ था तो मेरी अपनी आवाज बिल्कुल बंद थीं और मैंने लगातार लताजी की आवाज में भागवत गीता सुना।

आप इतने सारे स्टेज शो करती हैं, तो क्या आपके बच्चे भी आपके साथ शो करते हैं?
जी हां, मेरे साथ मेरे बच्चे भी मेरा प्रोग्राम करते हैं। मैं डिवोशनल प्रोग्राम ज्यादा करती हूं। वह डिवोशनल में मेरा ज्यादा साथ देते हैं। बहुत लोगों को लगता हैं कि डिवोशनल गाने घिसे पिटे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। डिवोशनल गाने बहुत ही ऊर्जावान होते हैं। आज ही हमने अपने प्रोग्राम की शुरुआत 'धीरे धीरे से' की थी, लेकिन लोगों ने कहा कि 'राम रतन धन पायो' गाइए। ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा है मुझ पर मैं उनकी आभारी हूं। मुझे पश्चिम बंगाल में एक प्रोग्राम के लिए बुलाया गया था। वहां फिल्मी गाना गाना शुरू किया तो वहां मौजूद लोगों ने कहा कि दीदी हम आपका भजन सुनने आए हैं। यह सब देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। 

गुलशन कुमार की बायोपिक में श्रद्धा कपूर आपका रोल कर रही हैं, इस पर आपको क्या लगता है कि वह कितना आपके रोल के साथ न्याय कर पाएंगी?
जी हां, मैंने भी सुना है। मेरा रोल श्रद्धा करे ये दूसरी बात है, लेकिन मैं बहुत खुश हूं कि गुलशन जी पर बायोपिक बन रही है। वह एक अच्छे इंसान थे। उन्होंन म्यूजिक इंडस्ट्री को काफी कुछ दिया है। उनको उनका न्याय मिलना चाहिए। उनके साथ काम करके हमेशा सुख की अनुभुति होती है। मैं उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। उन्होंने हर घर में मंदिर को पहुंचाया है। अगर आज के समय में डिवोशनल गाने एक बड़े क्षेत्र में उभरे हैं तो वह गुलशन जी की देन है। इसके साथ ही अनुराधा पौडवाल ने लक्ष्मी स्तुति का गान भी किया। 
मुझे लगा था कि आप मुझसे मेरे प्रोफेशन के अलावा भी सवाल करेंगे जो मैं बताना चाहती हूं। आजकल बेटियों को लेकर काफी चर्चा होती है। समाज को उनकी जरूरत है। इसके अलावा वीमेन इंपावरमेंट की बात होती है। महिला आदिशक्ति है, वह जीवनदायिनी है। मुझे ऐसा लगता है कि वोट बैंक या किसी भी तरह से उसे एड्रेस नहीं किया जाना चाहिए। उसमें इतनी शक्ति होती है कि वह हमेशा कुछ ना कुछ आश्चर्यजनक कर सकती है। मुझे क्या लगता है कि अपने बच्चों में संस्कार सिर्फ मां ही डाल सकती है। क्योंकि मां बच्चों की पहली पाठशाला होती है। मेरी जिंदगी का एक छोटा सा घटना चक्र याद है मुझे, जब मेरे 
8 साल के बेटे ने बोला कि मां आज ना जाओ तो हमने कहा कि मुझे जाना होगा, क्योंकि काम है। उसने कहा हां मुझे पता हैं कि आप मेरी मां नहीं अुनराधा पौडवाल हो तो मैंने उसी समय उसे डांटा और स्कूल भेजा। उसी समय मुझे अहसास हुआ कि हम अपने काम के चक्कर में अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते। लोग कहते हैं कि महिलाएं कमजोर होती है, लेकिन सच्चाई यह है कि महिलाओं में बहुत ज्यादा शक्ति होती है। अगर महिला पढ़ी लिखी होगी तो वह अपने बच्चों को अच्छी को शिक्षा देगी, जिससे हमारा समाज पढ़ा लिखा और संस्कारी होगा। 

आपके परिवार की महिलाओं के अलावा आप पर किसका प्रभाव पड़ा?
जी हां, सुधा मूर्ति जी से मैं काफी प्रभावित रही। वह इस समय के लोगों की गुरु हैं। मैं उन्हें सभी गुरुओं में पहले स्थान पर रखती हूं। वह अपने आप में एक परफेक्ट नारीत्व हैं। उनसे ज्यादा वूमेन इंपावरमेंट किसको हैं। मैं तो उन्हें अपना गुरु मानती हूं। ऐसा नहीं है कि कम कपड़े पहनने वाली महिलाओं से महिला सशक्तिकरण होगा। अगर ऐसा हो तो आदिवासी महिलाएं ज्यादा सशक्त होतीं। महिला और पुरुष दोनों का समन्वय एक साथ होने में ही सुंदरता है। 

 

अरुण जी से कैसे मिलीं, वह म्यूजिक डायरेक्टर थे तो क्या आप पहले से जानती थीं ?
मेरी उनके साथ शादी 17 साल की उम्र में हो गई थी। मैं उस समय छोटे-छोटे प्रोग्राम करती रहती थी, तो मेरे फादर इन लॉ ने मुझे देखा था और उन्होंने ही ये विचार बनाया था कि यह छोटी लड़की मेरी बहू बनने के लिए सही है। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे अपने इन लॉ से हमेशा सपोर्ट मिलता रहा। 

जब आपकी शादी हुई तो अरुण जी मराठी के एक चर्चित म्यूजिक डायरेक्टर थे?
उस समय उन्होंने कुछ फिल्मों में भाव गीत वगैरह किए थे। वह मराठी फिल्मों के लिए काफी बेहतर थे। अरुण जी मराठी फिल्मों में अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर थे। मेरी मदर इन लॉ की फिलींग मेरे लिए बिल्कुल मेरी मां की तरह है। मां तो सोचती है कि मेरे बच्चे हमेशा सफल हों, लेकिन मदर इन लॉ का अपनी बहू के लिए सोचना मुझे अचंभित किया। 

‘अभिमान’ फिल्म का गाना जब आपको मिला तब आपकी क्या उम्र रही होगी?
 मैं 18 साल की थी जब मुझे ‘अभिमान’ का गाना मिला। इसके लिए मैं अपने इन लॉ की शुक्रगुजार हूं। उन्होंने हमेशा हमें प्रोत्साहित किया। अरुण जी के जाने के बाद भी उन लोगों ने हमेशा मेरा साथ दिया और रिकॉर्डिंग के लिए प्रोत्साहित करते रहे। 

अरुण जी तो एसडी बर्मन के लिए काम करते थे?
जी हां, उन्होंने एसडी बर्मन के लिए काम किया, लेकिन कभी उन्होंने मेरे लिए मुंह खोल के किसी से काम नहीं मांगा। मुझे जो भी मिला मेरी ही काबिलियत पर मिला। लोग मुझे सुनते गए और काम देते गए। 

फिल्मों के बाद सामाजिक कार्यों में आने के लिए आप किसी घटना से प्रेरित हुई या यूं ही यह विचार आया?
मैं इंदौर के सूर्योदय परिवार के बुलावे पर उनसे मिलने गई और उन्होंने बताया कि किसानों और दूसरे लोगों को किस तरह की समस्या है। उन्हें कैसे मोटिवेट किया जा सकता है। तो मुझे लगा कि हमें भी इसके लिए कुछ करना चाहिए। उनसे जुड़ने के बाद लोग हमसे जुड़ते गए और कारवां बनता गया। इसमें श्रीकांतजी ने हमारी बहुत बड़ी मदद की। 

उन परिवारों से जिनकी आप मदद करती हैं, क्या आप उनके टच में रहती हैं, या दूसरे सेलिब्रिटी की तरह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए करती हैं?
हम लोग पब्लिसिटी के लिए कुछ नहीं करते हैं। इसमें क्या होता है कि जब कुछ नेचुरली होता है तो सब सही रहता है, लेकिन ऐसे टच में रहने पर उनके साथ साथ हमारी भी एक्सेप्टेशन बढ़ती हैं। वह कहेंगे ये नहीं किया, ये भी करना चाहिए और फिर हम कहेंगे कि इतना किया फिर भी कह रहे हैं। इसीलिए उतना ही टच में रहते हैं, जितनी जरूरत हो। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि उन जरुरतमंद लोगों की मदद कर दो फिर भूल जाओ। 



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