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गुरुवार, 24 अगस्त 2017

प्रधानमंत्री बदल रहे हैं भेंट संस्कृति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बुके के बजाय बुक’ देने की अपनी अपील पर खुद अमल करना शुरू कर दिया है

एक व्यक्ति उठे, चले और उसके साथ पूरा देश चल पड़े तो उसे राष्ट्र नायक कहा और माना जाएगा। सवाल यह है कि ‘राष्ट्र नायक’ कैसा होना चाहिए? एक व्यक्ति में ऐसा क्या होना चाहिए कि वह नायक और फिर राष्ट्र नायक बन जाए? इस तरह के सवाल आज के संदर्भ में बड़े लगते हैं, लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व सामने होता है, तो नायक या फिर राष्ट्र नायक की खोज वहीं पूरी हो जाती है। अभय, साहसी, आत्मविश्वास से लबरेज, हर पल उत्साहित करने वाला, रचनात्मकता को बढ़ावा देने वाला, सकारात्मक और आशावादी सोच के साथ प्रेरित करने वाला व्यक्तित्व, ये कुछ खास गुण हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वास्तव में राष्ट्र नायक बनाते हैं। अपने करिश्माई व्यक्तित्व से इतर पीएम बहुत आसान और सामान्य तरीके से कुछ न कुछ ऐसा करते हैं, जो देश-समाज के लिए एक नजीर बन जाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बुके के बजाय बुक’ देने की अपनी अपील पर खुद अमल करना शुरू कर दिया है। इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों से प्रधानमंत्री की इस इच्छा के अनुरूप ही उनका स्वागत करने का अनुरोध किया है। गृह मंत्रालय ने 12 जुलाई को सभी राज्य सरकारों को एक पत्र लिख कर कहा कि प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुरूप ही उनका स्वागत किया जाए। गृह मंत्रालय ने यह पत्र सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों और संघ शासित क्षेत्र के प्रशासकों को लिखा है और इसका पालन सुनिश्चित कराने को कहा है। गृह मंत्रालय ने कहा है कि देश के किसी भी राज्य के दौरे पर प्रधानमंत्री के स्वागत में राज्य सरकार के प्रतिनिधि उन्हें गुलदस्ता भेंट न करें। अच्छा तो यह होगा कि प्रधानमंत्री को गुलदस्ते के बजाय महज एक फूल ही भेंट किया जाए। इतना ही नहीं, मंत्रालय ने राज्य सरकारों से यह भी कहा है कि स्वागत के दौरान पीएम मोदी को फूल के साथ खादी का एक रुमाल या कोई एक पुस्तक भी अगर भेंट स्वरूप दी जाती है, तो इसमें कोई हर्ज नहीं होगा। प्रधानमंत्री की 19 जून को केरल में की गई अपील के बावजूद उन्हें गुलदस्ता देने की परंपरा बंद न होने के कारण मंत्रालय को राज्यों को यह पत्र लिखना पड़ा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल 19 जून को केरल में ‘पीएन पनिक्कर नेशनल रीडिंग डे’ समारोह के दौरान लोगों से तोहफे में ‘बुके के बजाय बुक’ देने का नया शिष्टाचार शुरू करने की अपील की थी। कोच्चि में हर साल एक महीने तक चलने वाले इस आयोजन में उन्होंने कहा था कि पढ़ने से बेहतर कोई दूसरा आनंददायक काम नहीं है और पढ़ने से मिले ज्ञान से बढ़कर दूसरी कोई शक्ति नहीं है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी 19  जून की अपील पर स्वयं अमल करना शुरू कर दिया है। अब प्रधानमंत्री मोदी जिस किसी भी राज्य के दौरे पर जाएंगे, वहां अपने स्वागत में कीमती फूलों के गुलदस्ते या अन्य उपहार लेने की जगह पुस्तक या खादी के रुमाल में लिपटा हुआ एक फूल स्वीकार करना पसंद करेंगे। गुलदस्ते के फूलों की कोमलता, रंग और महक से प्रसन्नता एवं सकारात्मकता का माहौल ही नहीं बनता, बल्कि किसी के प्रति सम्मान भी व्यक्त होता है, लेकिन गुलदस्ते के फूलों की एक समय-सीमा होती है। अगर जीवन में प्रसन्नता और सकारात्मकता के प्रभाव को लंबे समय तक बनाए रखना है, तो पुस्तकें ही इसे संभव कर सकती हैं। गुलदस्ते की जगह पुस्तकों का वही व्यक्ति चुनाव कर सकता है, जो जीवन में स्थायी रूप से प्रसन्नता और सकारात्मकता को बनाए रखना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं, बेहतर ही उपायों को अपनाते और लोगों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए पीएम ने इस तरह की परंपरा की शुरुआत की थी। माना जा रहा है कि पीएम मोदी की ये पहल एक बड़े बदलाव की नींव रखेगी।

देश की कमान संभालने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शासन व्यवस्था के साथ सामाजिक जड़ता को समाप्त करने के लिए प्रयासरत हैं। वे हर पल सकारात्मक सोच को अपनाने के लिए भी कुछ न कुछ पहल करते आ रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव में मतदान के दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। मतदान शुरू होने से कुछ समय पहले ही वे वहां पहुंच गए। प्रधानमंत्री के पहुंचते ही सारे अधिकारी हैरान रह गए। अधिकारियों की हैरानी देख खुद उन्होंने माहौल को हल्का किया और कहा, ‘मैं स्कूल भी जल्दी पहुंच जाता था।’ प्रधानमंत्री ने दस बजने का इंतजार किया और फिर मतदान किया। हालांकि यह घटना छोटी है, लेकिन इसका संदेश बड़ा है। 2 अक्टूबर, 2014 की तारीख अधिकतर लोगों को अब भी याद है। वजह, पहली बार देश के प्रधानमंत्री हाथ में झाड़ू लेकर निकल पड़े और ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की। ऐसा विरले ही होता है, जब देश का कोई बड़ा नेता इस तरह की पहल करता हो। लेकिन पीएम मोदी ने सफाई के प्रति लोगों में जागरुकता और सकारात्मक सोच लाने का प्रयास किया। इसका असर यह हुआ कि न केवल शहरों-कस्बों, बल्कि ग्रामीण जीवन पर भी स्वच्छता अभियान का असर पड़ा। एक सरकारी अभियान को पहली बार एक जन आंदोलन में तब्दील होते देश और दुनिया के लोगों ने देखा। आलम यह है कि देश के बड़े सितारों से लेकर नामी खिलाड़ी और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी स्वच्छता अभियान का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि देश में स्वच्छता का प्रतिशत तीन साल में ही 42 से बढ़कर 64 प्रतिशत हो गया है।

11 अप्रैल, 2017 को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की नाट्य-पुस्तक ‘मातोश्री’ का विमोचन हुआ। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसा किया कि लोग देर तक तालियां बजाते रहे। पीएम संसद की लाइब्रेरी बिल्डिंग के आॅडिटोरियम में पुस्तक विमोचन के बाद भी पैकिंग पेपर हाथ में ही पकड़े रहे। कुछ देर बाद उन्होंने पैकिंग पेपर को दोनों हाथों से मोड़ा और फिर अपनी हाफ जैकेट की बाईं जेब में रख लिया। महज 10 सेकंड में यह सब हुआ, लेकिन जैसे ही पीएम ने उस वेस्ट पैकिंग पेपर को खुद अपनी जेब में रखा, दर्शक दीर्घा में मौजूद लोग अपनी सीट से खड़े हो गए और जोरदार तालियां बजाने लगे। दरअसल, पीएम मोदी ने यह आदतन किया, लेकिन उनका यह आचरण नजीर बन गया।



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