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रविवार, 16 जून 2019

सुधीर भाई का सेवाधाम

सेवाधाम आश्रम के संस्थापक और निदेशक सुधीर भाई 28 वर्षों से विकलांगों, बुजुर्गों, मानसिक रूप से बीमार लोगों, असहाय बच्चों और अशक्त महिलाओं की सेवा में जुटे हैं

डॉ. विन्देश्वर पाठक 4 अप्रैल, 2017 को जब सेवाधाम आश्रम पहुंचे तो वहां का अनुभव उनके हृदय और आत्मा को झकझोर गया। उन्होंने वहां एक अद्भुत दुनिया देखी। वह दुनिया थी मानवता की सेवा की। उन्होंने देखा कि सेवाधाम आश्रम के संस्थापक और निदेशक सुधीर भाई गोयल 28 वर्षों से बहुत प्रेम और करुणा के साथ विकलांगों, बुजुर्र्गों, मानसिक रूप से बीमार लोगों, असहाय बच्चों और अशक्त महिलाओं की सेवा कर रहे हैं। डॉ. पाठक को लगा कि मानवता की इससे अच्छी सेवा नहीं हो सकती।

सेवाधाम आश्रम

सेवाधाम आश्रम की स्थापना 1989 में मध्य प्रदेश में उज्जैन के अंबोडिया गांव में हुई। इसके संस्थापक और निदेशक सुधीर भाई गोयल हैं। सुधीर भाई का जन्म एक प्रतिष्ठित घराने में 19 अगस्त, 1957 को इंदौर के मध्य प्रदेश राज्य में हुआ। अपने जीवनकाल में वे स्वामी विवेकानंद एवं महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे हैं। मात्र 13 वर्ष की अवस्था में ग्राम अजनोटी में उन्होंने एक स्कूल की स्थापना की। उसके बाद से तो वे शिक्षा और सेवा कार्य के प्रति इस कदर समर्पित हुए कि आज यही उनका जीवन है।

सुधीर भाई के जीवन में सेवा और समर्पण का यह भाव कहीं न कहीं उनके घर और कुटंब जनों के बीच से ही आया। उनके चाचा मानसिक रोग से ग्रस्त थे। उनकी दादी की भी दिमागी हालत ठीक नहीं थी। उनके एक मित्र का भाई विकलांग था। यह सब देखना सुधीर भाई को अंदर तक झकझोर जाता था। वे ऐसे तमाम लोगों के लिए कुछ करने के जज्बे से भरते जा रहे थे। शुरू में उन्हें ख्याल आया कि वे डॉक्टरी के पेशे को चुनें। पर 1976 में जब वे आचार्य विनोबा भावे से मिले तो उनके जीवन का रूख ही परिवर्तित हो गया। विनोबा अक्सर कहा करते थे कि असली भारत तो गांवों में बसता है। यह भी कि मानवता की सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

पिछले 28 वर्षों की अपनी सेवा यात्रा में सुधीर भाई ने महसूस किया कि कुष्ठ रोग से ग्रस्त लोग बहुत ही दयनीय और अस्वस्थ वातावरण में रहते हैं। वे ऐसे लोगों की दशा और पीड़ा से काफी मर्माहत हुए। नारायण नाम का एक विकलांग कुष्ठ-रोग से ग्रसित था, जो अपने जीवन के अंतिम क्षण गिन रहा था। सुधीर भाई उसे अपने साथ ले आए और एक गैराज में उसकी अंतिम दिनों तक सेवा करते रहे। कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों के कल्याण की इच्छा से ही उन्होंने उज्जैन के पास हमीरखेदी में कुष्ठ कल्याण केंद्र बनाया। इसी तरह असहाय बच्चों के लिए भी वे काफी समर्पित रहे। आलम यह रहा कि 1979 में मध्य प्रदेश के पंचमढ़ी में बच्चों की सेवा करते हुए उन्होंने अपनी बाईं आंख तक खो दी।

सेवाधाम आश्रम में 5000 से अधिक विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहते हैं, जो गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं। इन लोगों में कैंसर, एड्स, टीबी और मानसिक बीमारियों के रोगी शामिल हैं। यहां पूरे देश से आए असहाय लोग एक संयुक्त परिवार की तरह रहते हैं। आश्रम की तरफ से 200 से भी अधिक स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया जा चुका है। इन शिविरों में नेत्रदान के माध्यम से 500 से अधिक दृष्टिहीनों को नई रोशनी मिली।



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