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शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

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प्रफुल्ल को ‘ग्रीन नोबेल’

29 सप्ताह पहले
ओडिशा के अवैध खनन विरोधी कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंतारा प्रतिष्ठित गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार- 2017 से सम्मानित हुए हैं। इस पुरस्कार को 'ग्रीन नोबेल' के तौर पर भी जाना जाता है। भारत स्थित ओडिशा प्रांत के खनन विरोधी कार्यकर्ता प्रफुल्ल प्रतिष्ठित गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार 2017 विजेताओं में से एक हैं। प्रफुल्ल के साथ 5 अन्य विजेताओं को भी यह पुरस्कार दिया गया। गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार हर साल मानव सभ्यता वाले छह इलाकों-एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण व मध्य अमेरिका और द्वीप व द्वीपीय देशों में काम रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को दिया जाता है। प्रत्येक विजेता को पुरस्कार राशि के रूप में 175,000 अमेरिकी डॉलर मिलते ...
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स्वच्छता का परिमल

30 सप्ताह पहले
बुजुर्गियत थकान की निशानी नहीं है, अगर आप ऐसा नहीं मानते तो आपको पश्चिम बंगाल के जाधवपुर में रहने वाले परिमल धर से मिलना चाहिए। जाधवपुर की विद्यासागर कॉलोनी में रहने वाले धर ने अकेले अपने बूते अपने इलाके के पर्यावरण को स्वच्छ रखने का बीड़ा उठाया है। धर ने अपनी कॉलोनी में एक बीघे से ज्यादा बड़े क्षेत्र में फैले तालाब को अकेले ही साफ कर दिया। यह तालाब स्वाधीनता के पूर्व का है। पर देखरेख के अभाव में पिछले दो दशकों से यह तालाब लगातार गंदा होता जा रहा था। स्थानीय लोग यहां कूड़ा फेंकते थे। कई बार मरे हुए जानवरों को भी यहां फेंका जाता था। गंदे हो चुके इस तालाब से यहां प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ गया था। लोग बदबू और मच्छरों से परेशान रह...
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जरूरतमंदों के ओमकार

31 सप्ताह पहले
जिंदगी की जरूरतों को पूरी करने के लिए ट्रैफिक  सिग्नल पर जद्दोजहद करने वाले स्ट्रीट वेंडर की राह आसान नहीं। सर्दी, गर्मी, बरसात में मौसम की परवाह किए बगैर दिन भर भूखे-प्यासे रहकर कुछ पैसे कमा पाते हैं। कई बार तो दिन भर की मेहनत की बाद भी आमदनी सिफर। आमतौर पर भूखे-गरीबों की मदद करने वाले तो कई लोग दिख जाते हैं, लेकिन ट्रैफिक सिग्नल के इन जरूरतमंदों की तरफ शायद ही कोई ध्यान देता है। लेकिन दिल्ली में एक  ऐसा शख्स है जो इन जरूरतमंदों के भूख-प्यास को दूर करने की पहल कर रहा है। इंसानियत के रक्षक  इस शख्स का नाम है ओमकारनाथ कथारिया। ऐसा नहीं है कि ये कोई बिजनेस टाइकून या काफी अमीर हैं, लेकिन इनका दिल काफी अमीर है। पेशे स...
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दिव्यांग मुकुंदा का जज्बा

33 सप्ताह पहले
स्वच्छ भारत मिशन देश में अब एक आंदोलन की शक्ल ले चुका है। शहरों से लेकर सुदूर गांव-कस्बों तक से हर दिन ऐसी मिसालें सामने आ रही हैं, जिसमें अभाव और प्रतिकूलता के बावजूद लोगों ने खुले में शौच से मुक्ति के प्रति अपना पक्का इरादा दिखाया है। ऐसी ही एक मिसाल सामने आई है राजस्थान के उदयपुर जिले से। यहां के गरनाला कोटड़ ग्राम पंचायत की दिव्यांग महिला मुकुंदा ने शारीरिक और आर्थिक प्रतिकूलता के बावजूद घर में शौचालय बनवाकर एक प्रेरक उदाहरण पेश किया। गौरतलब है कि मुकुंदा दोनों पैरों से असमर्थ हैं। स्थानीय प्रशासन की तरफ से लोगों को शौचालय निर्माण के लिए जागरूक करने के लिए जब घर-घर संपर्क अभियान चलाया जा रहा था तो पंचायत समिति के सदस्यों के साथ स्थानीय अधिकारियों का समूह मुकुंदा के घर भी ...
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भूखों और बेघरों का सहारा

34 सप्ताह पहले
एक तरफ  जहां दुनिया दो वक्त की रोटी की जुगत में लगी रहती है, वहीं एक शख्सियत ऐसी भी है, जो अपनी नौकरी छोड़ बेघरों की भूख की सुध ले रहा है। कॉर्पोरेट कंपनी में काम कर चुके गौतम कुमार अब बेघरों के लिए भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित करने में लगे हैं। हैदराबाद के रहने वाले गौतम का काम मध्यरात्रि में शुरू होता है। वे अपनी टीम के साथियों के साथ शादी और पार्टी स्थलों के आसपास गश्त लगाते हैं और वहां से बचे भोजन और अन्य सामान को शहर के गरीबों में वितरित करते हैं। गौतम को एक्सपीडिया समेत कई कंपनियों में काम करने और पूरे देश में घूमने का अनुभव है। लगभग पांच साल पहले गौतम ने ऐसी खुशनुमा नौकरी को अलविदा कहकर एक एनजीओ खोलने का फैसला किया। गौतम कहते हैं, 'मैं मानवता की सेवा करना चाहता ...
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बहादुरी की परमेश्वरी

34 सप्ताह पहले
राजस्थान में तोलासार ग्राम पंचायत के गांव रोलासर की युवा सरपंच ने युवाओं को बुरी लत से ही दूर नहीं किया, बल्कि उन्हें सही रास्ते पर भी ले आईं। यह काम कर उन्होंने पूरे क्षेत्र में मिसाल कायम की है। इस परमेश्वरी गोदरा ने गांव में ताश और जुआ खेलने वालों की लत छुड़ाकर कई लोगों के घरों को उजडऩे से बचा लिया। अब इस गांव के लोग जुए पर ध्यान ना देकर काम पर ध्यान देते हैं। बीए-बीएड कर चुकी परमेश्वरी गोदरा किसान किशनलाल गोदरा की बेटी हैं। मात्र 24 साल की उम्र में सरपंच बनने वाली गोदरा ने गांव के लोगों के लिए मिसाल कायम की है। पहले गांव के ज्यादातर युवा दिनभर चौपाल और गुवाड़ में ताश खेलते रहते थे। खेलने के साथ ही साथ ये लोग हर दूसरे दिन लड़ाई-झगड़ा भी करते रहते थे, जिससे पूरे गांव का माह...
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मिलावट के खिलाफ अनुपम जंग

37 सप्ताह पहले
अगर ठान लिया जाए तो देश से भ्रष्टाचार की बीमारी को दूर किया जा सकता है। कुछ ऐसा ही केरल की अनुपमा ने महज 15 महीने में कर दिखाया। भ्रष्टाचार को खत्म करके ईमानदारी से काम करने की कवायद देश के प्रधानमंत्री मोदी तब से कर रहे हैं, जब से उनकी केंद्र में सरकार बनी है। इसी कवायद को केरल की आईएएस ऑफिसर टी वी अनुपमा आगे बढ़ा रही हैं। अनुपमा ने कार्यभार संभालते ही ऐसा कमाल कर दिखाया कि महज 15 महीने में केरल के मिलावटखोर उनके नाम से थर-थर कांपने लगे। बता दें कि यह एक संयोग ही है कि जब केंद्र में मोदी की सरकार बनी, तो उसी दौरान केरल में आईएएस अनुपमा को फूड सेफ्टी कमिश्नर बनाया गया। उसके बाद कार्यभार संभालते ही अनुपमा ने मिलावटखोरों पर नकेल कसने के लिए एक अभियान की शुरुआत की।...
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अयप्पा मासगी- बिन पानी सब सून

38 सप्ताह पहले
जल ही जीवन है ऐसा हम किताबों और अपने बड़े बुजुर्गों से बचपन से सुनते आ रहे हैं। इसके साथ ही देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी एक जनसभा के दौरान जनता को संबोधित करते हुए पानी को प्रकृति का दिया हुआ प्रसाद बताया था, लेकिन जब जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये तो क्या कहा सकता हैं। पिछले दिनों केंद्र सरकार को यूपी के बुंदेलखंड और महाराष्ट्र के लातूर में पानी ट्रेन से भेजना पड़ा था। वहीँ कुछ भविष्यवक्ता बताते हैं कि आने वाले समय में यह समस्या और बढ़ने वाली है, लेकिन इस समस्या से निजात दिलाने के लिए अयप्पा मासगी ने एक नेक कदम उठाया है। इन्हें कहते हैं वाटर डॉक्टर अयप्पा मासगी के नाम से आप लोग भले ही परिचित न हों लेकिन...
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बसंत साहू - हौसले का बसंत

39 सप्ताह पहले
'खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।’ यह वाक्य पूरी तरह से चरितार्थ हो रहा है बसंत साहू पर। शरीर का 90 फीसदी हिस्सा काम नहीं करता है। फिर भी अपने जोश-जज्बे और बुलंद इरादे के दम पर एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं - बसंत। छत्तीसगढ़ के धामतरी में रहने वाले बसंत के हाथ-पैर में जान न के बराबर है, लेकिन जब हिम्मत और जोश के साथ वह कूची उठाकर कैनवस पर रंग बिखेरते हैं तो तस्वीरें खुद ब खुद बोल उठती हैं। अपनी रंगहीन दुनिया में न केवल उन्होंने हौसले और उम्मीदों के रंग भरे हैं, बल्कि दूसरों के जीवन को भी रंगीन कर रहे हैं।
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निकोलस ग्रे और मेरी - पानी देसी बचा रहे विदेशी

40 सप्ताह पहले
पानी की कीमत प्यास से तय होती है। पानी में तैरने वाले गांवों के लिए यह सहज उपलब्ध है, इसीलिए पानी की कीमत इनके लिए बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन रेतीले राजस्थान में पानी की कीमत क्या है? यह सवाल पूछना ही बेमानी है, जहां एक-एक बूंद के लिए लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर कोई अपना जीवन राजस्थान की प्यास बुझााने में लगा दे तो उसे यहां के लोग क्या कहेंगे और मानेंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। राजस्थान की प्यास को ब्रिटेन के रहने वाले निकोलस ग्रे और उनकी पत्नी मेरी ने तीस साल पहले अपनी प्यास बना लिया और फिर यह जोड़ा प्यास बुझाने के काम...
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विजयलक्ष्मी शर्मा - बाल विवाह पर विजय

41 सप्ताह पहले
  अगर इरादें मजबूत हो तो बड़ी सी बड़ी परेशानियां भी घुटने टेकने को मजबूर हो जाती है। कुछ इसी बात को चरितार्थ कर रही हैं राजस्थान के एक छोटे से गांव की विजयलक्ष्मी शर्मा। जिस गांव में हर घर में बाल विवाह होता हो, बाल विवाह जहां के रीति रिवाज में वर्षों से शुमार है। वहां पर इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन विजयलक्ष्मी ने न केवल खुद की बाल विवाह पर रोक लगवाई, बल्कि गांव की कई लड़कियों के लिए भी मददगार बनकर आगे आई है।
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संदीप पांडेय - बापू के सपने का संदीप

42 सप्ताह पहले
पेशे से आईआईटी के प्राध्यापक और फिर आईएस अफसर बनने की तमन्ना रखने वाला एक युवा  हरदोई में अपने गांव से लखनऊ में अपने घर लौटकर आया। सफर में काफी थक जाने के बाद उसने अपनी मां से अपने लिए और अपने एक दलित साथी के लिए चाय बनाने की अपील की। उसकी मां ने उसके दलित साथी के लिए चाय तो बनाई पर उसे अलग कप में चाय दी गई। इस घटना ने उस युवक के मन पर इस बात की गहरी छाप छोड़ी कि जातिवादी और मध्यकालीन मानसिकता के कारण समाज के कुछ लोगों के प्रति आज भी भेदभाव बरता जाता है। असल में वह युवक शुरू से थोड़ा विद्र्रोही स्वभाव का था। दलितों और महिलाओं के उत्पीडऩ को लेकर उनके मन में गुस्सा बहुत पहले से था। उसने यह तय भी कर लिया था कि आगे चलकर वह समाज...


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