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मंगलवार, 19 जून 2018

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गरीबी से संघर्ष, स्वच्छता का लक्ष्य

एक सप्ताह पहले
अफ्रीकी देश इथियोपिया का नाम लेते ही गरीबी, कुपोषण और कचरों के पहाड़ जैसे चित्र उभरने लगते हैं। तथ्यात्मक रूप से यह बात काफी हद तक सही भी है। पर इथियोपिया का सच इतना भर नहीं है। यह देश ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तौर पर काफी संपन्न रहा है। यह अलग बात है ग्लोबल विकास के नए दौर में इथियोपिया इतनी तेजी से समर्थ नहीं हो सका कि वह तीसरी दुनिया के आखिरी पायदान पर खड़े देशों की कतार से आगे निकल सके। जाहिर है कि इन स्थितियों का असर वहां चल रहे स्वच्छता कार्यक्रमों पर भी पड़ा। स्वच्छता को लेकर यह देश न सिर्फ खासा पिछड़ा है, बल्कि यहां के समाज में इस मुद्दे को लेकर पर्याप्त जागृति का भी अभाव है। इस अभाव के पीछे कोई बड़ा सांस्कृतिक कारण नहीं है...
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गांवों में सैनेटरी नैपकिन के प्रति जागरुकता की कमी

2 सप्ताह पहले
युवा महिलाओं से जब उसने सैनेटरी पैड के बारे में सवाल पूछना शुरू किया तो कुछ ने उसे पागल सोचा और कुछ ने समाज को बिगाड़ने वाला। लेकिन अरुणाचलम मुरुगनाथम ने यह सब अपनी पत्नी के लिए सस्ते सैनेटरी नैपकिन बनाने की अपनी तलाश के लिए किया, जिसने आखिरकार विश्व भर में ग्रामीण महिलाओं के माहवारी स्वास्थ्य में क्रांतिकारी परिवर्तन ला खड़ा किया।  तमिलनाडु के कोयंबटूर के रहने वाले मुरुगनाथम का कहना है कि अपने मिशन को पूरा करने के लिए अभी और लंबा सफर तय करना बाकी है ताकि माहवारी स्वच्छता सभी को किफायती और सुलभ रूप में हासिल हो सके। मुरुगनाथम ने ई-मेल के माध्यम से दिए साक्षात्कार में बताया कि यह सब मेरी पत्नी शांति के साथ शुरू हुआ और...
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मोरक्को : स्वच्छता का मॉडल देश

2 सप्ताह पहले
मोरक्को उत्तरी अफ्रीका का एक ऐसा देश है, जो आधुनिकता के साथ ऐतिहासिक विडंबनाओं के लंबे दौर से साक्षी रहा है। बात स्वच्छता की करें तो यूनिसेफ ने वाटर, सेनिटेशन और हाइजीन (वॉश) को लेकर पूरी दुनिया की आबादी को सुरक्षित स्तर पर लाने की ग्लोबल कवायद शुरू की है, उसमें जो देश मॉडल कंट्री के तौर पर उभरे, उसमें मोरक्को का नाम काफी ऊपर है। दरअसल, भौगोलिक तौर पर तमाम तरह की प्रतिकूलताओं को झेलने वाले मोरक्को ने विगत दो दशकों में जहां अपने को एक विकसित अर्थव्यवस्था के तौर पर दुनिया के प्रस्तुत किया है, वहीं उसने स्वच्छता के क्षेत्र में आशातीत सफलता भी हासिल की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट (ग्लास : 2013-14) के मुताबिक मोरक्को सरकार ...
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स्वच्छता से परहेज का ब्रिटिश अतीत

3 सप्ताह पहले
इंग्लैंड महज यूरोप का एक देश भर नहीं है, बल्कि चर्चों के वर्चस्व के दौर से लेकर साम्राज्यवादी दौर तक इंग्लैंड का इतिहास एक तरह से यूरोप का इतिहास रहा है। समाज और संस्कृति पर भी इंग्लैंड या ब्रिटेन की छाया ही पूरे यूरोप पर बड़ी होकर पड़ी है। वैसे यह भी एक विडंबना ही है कि ब्रिटेन सहित जिस यूरोप को दुनिया में आधुनिकता के इतिहास का सूत्रपात करने वाला माना जाता है, वहां स्वच्छता को लेकर कम से कम ऐसी तरक्की या आधुनिकता काफी देर से देखने को मिलती है। खासतौर पर मध्य युग में स्वच्छता की बात करें तो ब्रिटिश परंपराएं हमें हैरान करती हैं। दिलचस्प है कि उसी दौर में एक तरफ जहां रूस में स्नान को उच्च सम्मान के साथ देखा जाता था, वहीं दुसरी तरफ ब...
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20 हजार गांवों में मनेगा स्वच्छ भारत दिवस

8 सप्ताह पहले
राष्ट्रव्यापी ग्राम स्वराज अभियान के तहत छत्तीसगढ़ की सभी दस हजार 971 ग्राम पंचायतों के लगभग बीस हजार गांवों स्वच्छ भारत दिवस मनाया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने प्रदेश के सभी पंच-सरपंचों और ग्रामीणों से स्वच्छ भारत दिवस के आयोजनों में सक्रिय भागीदारी की अपील की है। ऐसी ग्राम पंचायतें, जो अब तक खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) घोषित नहीं हो पाई हैं, उनमें स्वच्छता के लिए ग्रामीणों के सहयोग से जनआंदोलन चलाया जाएगा। पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर ने भी इन आयोजनों में पंचायत प्रतिनिधियों और आम जनता से सहयोग का आह्वान किया है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सर्वोच्च प्राथमिकता वाले स्वच्छ भारत मिशन के शुरू होने...
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स्वच्छता को समर्पित सुलभ के पांच दशक

11 सप्ताह पहले
किसी ने कभी सोचा भी होगा कि 21वीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते स्वच्छता देश का प्राइम एजेंडा बन जाएगा। इस बदलाव के पीछे  बड़ा संघर्ष है। आज देश में स्वच्छता को लेकर जो विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, उसमें जिस संस्था और व्यक्ति का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह सुलभ इंटरनेशनल और इस संस्था के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक। पूरी दुनिया आज डॉ. पाठक को ‘टॉयलेट मैन’ के रूप में जानती है। उन्होंने एक तरफ जहां सिर पर मैला ढ़ोने की मैली प्रथा को खत्म करने बीड़ा उठाया, वहीं देशभर में सुलभ शौचालय की उपलब्धता से उन्होंने आमलोगों की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य किया। बड़ी बात यह है कि डॉ. पाठक द्वारा...
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शौचालय बने तो ससुराल आऊंगी

11 सप्ताह पहले
ससुराल में शौचालय नहीं बना तो भावी दुल्हन ने चौखट लांघने से मना कर दिया। इससे वर पक्ष असमंजस में पड़ गया और उसके बाद से ही दुल्हन को मनाने का दौर जारी है। मामला जैतपुरा गांव निवासी सुदामा निषाद का है। सुदामा का विवाह वीरपुर गांव निवासी जनार्दन निषाद की बेटी राजकुमारी से तय हुआ है। वर व वधू दोनों दिव्यांग हैं लेकिन, पढ़े-लिखे हैं। सुदामा जहां स्नातक स्तर तक की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, वहीं राजकुमारी स्नातक अंतिम वर्ष में हैं। दोनों का विवाह तय होने के दौरान वधू पक्ष ने सुदामा के घर में शौचालय न होने का सवाल खड़ा किया। इस पर वर पक्ष की तरफ से आश्वासन मिला कि विवाह से पहले प्रत्येक दशा में हम शौचालय बनवा लेंगे। दिव्यां...
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भूख से जूझते कांगो में स्वच्छता की चुनौती

12 सप्ताह पहले
दुनिया भर में विकास को लेकर एक सामान्य लक्ष्य और उसे हासिल करने के लिए सामान्य मानदंड अपनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने ‘सतत विकास लक्ष्य’ घोषित किया है। इसे ही संयुक्त राष्ट्र का एजेंडा-2030 भी कहते हैं। इस एजेंडे को लेकर अब तक हुई कोशिश और उपलब्धियों के लिहाज से जो भी मूल्यांकन हुए हैं, उनमें सबसे खराब स्थिति अफ्रीकी मुल्कों की है। मेडागास्कर, लाइबेरिया, कांगो, चाड और मध्य अफ्रीकी गणराज्य शामिल हैं। ‘सतत विकास लक्ष्य’ की दृष्टि से जिन देशों का प्रदर्शन सबसे अच्छा है, वे हैं- स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और चेक गणराज्य। &lsquo...
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स्वच्छता की प्रतीक्षा में नाइजीरिया

13 सप्ताह पहले
नव उदारवाद और नई तकनीक के साथ लोकंतंत्र को लेकर प्रकट हुई वैश्विक ललक के बीच तीसरी दुनिया के देशों की स्थिति क्या है, यह समझना हो तो जिस देश को केस स्टडी के लिहाज से देखना सबसे सही होगा, वह है अफ्रीकी देश नाइजीरिया। नाइजीरिया अफ्रीका का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। इसकी आबादी 17 करोड़ से अधिक है। दूसरे नंबर पर मिस्र है, जिसकी आबादी साढ़े आठ करोड़ है। अफ्रीका में कम से कम 3000 जनजातीय समूह (कबीले) हैं। अकेले नाइजीरिया में ऐसे कबीलों की संख्या 370 से अधिक है। भौगोलिक- सामाजिक स्थिति फेडरल रिपब्लिक ऑफ नाइजीरिया या नाइजीरिया संघीय गणराज्य पश्चिम अफ्रीका का एक प्रमुख देश है। पूरे अफ्रीका महाद्वीप में इस देश की आबादी सबसे अधिक है। इसकी सीमाएं पश्चिम में ब...
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दुनिया की छत पर स्वच्छता

14 सप्ताह पहले
आज भी कई पुराने लद्दाखी घरों के बाहर एक कमरे का दो-तला ढांचा दिखता है। इसे लद्दाखी में ‘छागरा’ कहते हैं। भूतल एक बंद कोठार सा होता, पीछे की तरफ एक दरवाजा रहता है। आगे की तरफ से सीढ़ियां ऊपरी तल तक जाती हैं। ऊपर के कमरे के ठीक बीच में एक छेद होता है, जिसके चारों ओर सूखी मिट्टी और राख पड़ी रहती है। इसके ऊपर बैठकर मलत्याग किया जाता है। मल-मूत्र नीचे के कोठार में गिरता है। शौच के बाद मल पर मिट्टी फेंकी जाती है, जिससे बदबू चली जाती है। कालांतर में मल-मूत्र गल कर मिट्टी जैसी खाद बन जाता है। तिब्बत का भूगोल स्वच्छता को लेकर ति...
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स्वच्छता का पाठ

14 सप्ताह पहले
इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलेंस प्रोग्राम, यानी आईडीएसपी के अनुसार, पिछले साल रोगों के प्रकोप के जिन 1,714 मामलों की प्रयोगशाला से पुष्टि हुई, उनमें से एक-तिहाई मामले गंभीर डायरिया व फूड प्वाइजनिंग के थे। बाकी डेंगू, एंसेफलाइटिस, हैजा और चिकनगुनिया जैसे रोगों के थे। वास्तविक तस्वीर मगर आईडीएसपी का यह आंकड़ा सच्चाई का एक अंश मात्र है। देश की 55 फीसदी आबादी सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं कराती। इनमें से 51.4 फीसदी निजी अस्पतालों का रुख करती है, तो शेष 3.4 फीसदी घरों में इलाज करना पसंद करती है। इस तरह निजी डॉक्टरों से इलाज कराने वाले ये ल...
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मैली प्रथा का अंत!

15 सप्ताह पहले
महिला विकास और सभ्यता की प्रतीक होती है, यदि आप जानना चाहते हैं कि समाज कितना अच्छा है तो रास्ते में चलने वाली किसी महिला से बात करें और आपको बिना किसी अर्थशास्त्री की मदद के उत्तर मिल जाएगा। महिला विकास, सुंदरता, निर्मलता और उन सभी चीजों की प्रतीक होती है, जो जीवन को सार्थक बनाती है। ये बातें कुछ वर्ष पूर्व पद्मभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक ने उदयपुर में एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही थीं। सम्मेलन का आयोजन ‘महिला-सशक्तिकरण-स्थिति और भूमिका पर उभरता हुआ परिदृश्य’ विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के समाजशास्त्र-विभाग ने किया था। इस कार्यक्रम में डॉ. पाठक मु...


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