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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

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...तो एक भारतीय के नाम पर होता एवरेस्ट का नाम

एक सप्ताह पहले
दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट के साथ मानवीय साहस के कई दिलचस्प दास्तान जुड़े हैं। एक समय एवरेस्ट तक पहुंचना मौत से खेलने के बराबर था, पर अब पर्वतारोहण के वैज्ञानिक प्रशिक्षण और बढ़े दुस्साहस के साथ एवरेस्ट विजय जहां सामान्य बात होता जा रहा है, वहीं इससे जुड़े नए-नए कारनामे लगातार दर्ज होते जा रहे हैं। तारीखी तौर पर देखें इस साल 29 मई को माउंट एवरेस्ट फतह के 64 साल पूरे हो गए। इसी दिन 1953 में एडमंड हिलेरी व तेंजिंग नॉर्गे ने पहली बार 8848 मीटर (29002 फीट) ऊंचे एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी। महालंगूर रेंज में स्थित इस चोटी को मापने से लेकर इसके नामकरण की कहानी बेहद रोचक है। इसकी तह तक जाएं तो पता चलता है कि अगर अंग्रेजों ने...
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तीन वर्षों में पकड़ी गई हजारों करोड़ की अघोषित आय

2 सप्ताह पहले
केंद्र की कमान संभालने के बाद देश के प्रधानमंत्री का यह संकल्प सबको याद है,‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा।’ तीन वर्षों से सरकार इसी संकल्प के सहारे भ्रष्टाचारमुक्त देश बनाने की दिशा में कार्य कर रही है। इस संकल्प को पूरा करने में आयकर विभाग पूरी तरह सक्रिय है। बेनामी संपत्ति के मामले में देश भर में कार्रवाई जारी है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी है कि उसने सघन खोज, जब्ती और छापे में करीब 71,941 करोड़ रुपए की ‘अघोषित आय’ का पता लगाया है। वित्त मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में बताया है कि बीते तीन सालों के दौरान विभाग ने 2 हजार से ज्यादा कंपनियों पर छापे मारे गए, जिसमें 36,051 करोड़ रुपए से अधिक की अघोषित आय का पता चला। इसके अतिरिक्त...
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जल प्रबंधन सिखाते मंदिर

3 सप्ताह पहले
  अगर कोई कहे कि मंदिरों का धार्मिक महत्व तो है ही, उससे ज्यादा इसका जल संरक्षण की दृष्टि से ज्यादा महत्व है, तो अच्छा आशय प्रकट होने के बावजूद पहली नजर में यह बात कुछ समझ नहीं आती है। दरअसल, इसे समझने के लिए मंदिरों से जुड़ी देशज परंपरा का गहन अध्ययन जरूरी है। जल कुंडों, कुओं और तालाबों के साथ मंदिर निर्माण की भारतीय परंपरा कोई आज की नहीं है। ज्यादातर मंदिर में पूजा की पारंपरिक पद्धति भी यही है कि उससे जुड़े जलस्रोत से मंदिरों में स्थापित देवी-देवता का जलाभिषेक किया जाए।  जॉयसागर टैंक ऐेतिहासिक तौर पर भी देखें तो देश के विभिन्न हिस्सों में राजाओं ने मंदिरों के साथ के कुंडों का निर्माण करवाया है। इनके निर्माण के दो प्रयोजन थे। लोगों की मान्यता है कि...
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लक्ष्य एक कार्य अनेक

4 सप्ताह पहले
पांच तरुणों से शुरू होने वाली संघ की शाखा का विस्तार आज दुनिया के पचास से ज्यादा देशों तक हो गया है। यह चमत्कार संघ के स्वयंसेवकों की त्याग, तपस्या और बलिदान के चलते ही हो सका है। आज देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में संघ पर शोध हो रहे हैं। संघ की साधारण-सी दिखने वाली शाखा से अद्भुत व्यक्तित्व पैदा हुए हैं। शाखा से प्रेरणा प्राप्त स्वयंसेवकों पर संघ को ही नहीं, पूरे देश को गर्व है। सामान्य किसान-मजदूर से लेकर प्रधानमंत्री तक संघ के स्वयंसेवक हैं और सभी अपनी सेवाएं राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि संघ के स्वयंसेवक अपनी प्रतिभा, कठोर परिश्रम एवं ईमानदारी के चलते लोगों के प्रेरणा-स्रोत बने हुए हैं। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार कहते थे कि संघ कुछ नहीं करेगा...
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जड़ों से जोड़ने की पहल

5 सप्ताह पहले
संगीत से मेरे परिचय के दौरान जो बीज मेरे मन में प्रस्फुटित हुआ, जो अहसास मुझे झंकृत कर गया, वही स्पिक मैके की नींव का आधार बना। शास्त्रीय संगीत का ये स्पर्श बालपन का नहीं था, बल्कि आईआईटी के छात्र जीवन का था। न्यूयार्क के कोलंबिया विश्व  विद्यालय में पीएचडी करने के दौरान एक बार मित्रों के साथ उस्ताद नसीर अमीनुद्दीन डागर, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के ध्रुपद गायन के कार्यक्रम में बस यूं ही चले गए। हम में से कोई भी ध्रुपद या संगीत की अन्य विधाओं के बारे में कुछ नहीं जानता था, लेकिन जब मैं कार्यक्रम में गया तो मैं साधारण श्रोता था, लेकिन जब लौटा तो आलौकिक स्पर्श ने मुझे छू लिया था। जो कुछ मेरे मन में घटा वही अनुभव अन्या युवाओं ...
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स्वामी विवेकानंद के संदेश

6 सप्ताह पहले
उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, स्वामी विवेकानंद ने ऐसा कहते हुए न सिर्फ अपने समय में, बल्कि आज युवाओं को भी सफलता का संदेश दे रहे हैं। वे आधुनिक संत हैं और अपने जीवन में उन्होंने सबसे ज्यादा युवाओं के साथ संवाद किया है। वे युवाओं में असीम ऊर्जा तो देखते ही हैं, उनके भरोसे वे भविष्य के सबल और श्रेष्ठ भारत की रचना की कामना भी करते हैं। आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, ऐसे में स्वामी विवेकानंद के वे विचार जो युवाओं को मौजूदा दौर की चुनौतियां हल करने और जीवन में बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करते हैं, उनके बारे में निश्चित रूप से विचार करना चाहिए। 
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पानी को लेकर अनूठी फिल्मी मुहिम

7 सप्ताह पहले
दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में भारत में बनती हैं, उसमें भी हिंदी फिल्मों का सालाना औसत सबसे ज्यादा है। अलबत्ता भारतीय फिल्म उद्योग के सामने विविधतापूर्ण पटकथाओं का रोना हमेशा से रहा है। खासतौर पर रचनात्मक प्रतिभा के धनी और समाज को फिल्मों से सार्थक संदेश का हौसला रखने वाले फिल्मकारों की यह शिकायत रही है कि अपने यहां पटकथा लेखन की कोई वैकल्पिक लीक बन ही नहीं पाई। ऐसी शिकायत करने वाले फिल्मकारों में सत्यजीत रे से लेकर अनुराग बसु तक कई लोग शामिल हैं। सुखद यह है कि अब यह नई लीक गढ़ी जा रही है। पिछले एक दशक में कई ऐसी फिल्में आई हैं, जिनके भारत में निर्माण के बारे में पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। ‘स्माइल पिंकी’, ‘प...
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पाश्चात्य योग की माता

8 सप्ताह पहले
आज अगर पाश्चात्य जगत में योग का डंका बज रहा है, तो इसके पीछे भारतीय परंपरा और दर्शन से प्रभावित रूसी महिला की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें ‘मदर ऑफ वेस्टर्न योगा’ कहा भी जाता है। दरअसल हम बात कर रहे हैं रूसी अभिनेत्री व नृत्यांगना येव्गेनिया पीटरसन  की, जो आगे चलकर योग के क्षेत्र में इंद्रा देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने एक तरह से भारत, रूस और पश्चिमी देशों के बीच एक सेतु के रूप में काम किया। वैसे परमहंस योगानंद जैसे महान गुरुओं के प्रयासों से भी पश्चिमी देशों के लोगों के बीच योग की लोकप्रियता काफी बढ़ी। येव्गेनिया का जन्म 1899 में लात्विया के रीगा शहर में हुआ था। उस समय लात्विया रूसी साम्राज्य का ...
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सिर्फ उनकी आंखों के लिए

9 सप्ताह पहले
औसत व्यक्ति जो देख सकता है उसके लिए एक नेत्रहीन व्यक्ति की तरह सोचना मुश्किल है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसका सामना स्वागत थोराट कर रहे हैं – जो पत्रकार, थियेटर पर्सनालिटी, वाइल्ड लाईफ फोटोग्राफर और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता बने, लेकिन अधिकतर लोग उन्हें भारत के ब्रेल मैन के रूप में ही जानते हैं। वह भारत की पहली ब्रेल पत्रिका लॉन्च करना चाहते थे। 1998 में ‘स्पर्शज्ञान' पत्रिका का पहला अंक मराठी में प्रकाशित हुआ था। यह सब 1993 में शुरू हुआ जब थोराट पुणे के दो दृष्टिहीन विद्यालयों पर एक वृत्त फिल्म की परियोजना बना रहे थे। 1997 में उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक मराठी नाटक 'स्वातंत्र्याचि यशोगथा...
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विश्व रिकॉर्ड फसल देने  वाला गांव दरवेशपुरा

10 सप्ताह पहले
सरकारी आंकड़े के मुताबिक बिहार में करीब 1.62 करोड़ किसान हैं। किसानों की इतनी बड़ी संख्या के साथ खास बात ये है कि ये परंपरागत तरीके से खेती करना चाहते हैं, पर समय और पैदावार की चुनौती ने इन्हें रासायनिक तरीके से खेती करने को मजबूर कर दिया। अब जबकि दशकों के अनुभव के बाद रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव दूसरे प्रदेशों के साथ बिहार के किसान भी भुगत रहे हैं, तो वे एक बार तेजी से जैविक खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। अच्छी बात यह है कि ऐसा करते हुए वे जैविक खेती की परंपरागत शैली को वैज्ञानिक बनाने पर जोर दे रहे हैं। इसमें उन्हें खासी सफलता भी मिल रही है। इसी तरह की बड़ी उपलब्धि हासिल की है सूबे के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के कुछ किसानों ने। आलम यह है कि इन किसानों की खेती करने की समझ और शैल...
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रोशन हुआ पॉवर सेक्टर

11 सप्ताह पहले
न कोयले की कमी थी और न दूसरे संसाधनों की, लेकिन देश लंबे समय तक बिजली की कमी महसूस करता रहा। समस्या कहीं थी, जिस वजह से कृषि से लेकर उद्योग तक संकट ही संकट था। यह कमी थी, एकीकृत सोच की। तीन साल पहले देश में बिजली, कोयला और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय का काम एक ही मंत्री को दिया गया। नतीजा सामने है। तीन साल पहले तक बिजली संकट से जूझने वाला देश आज बिजली का निर्यातक बन गया है।  बिजली निर्यातक बना देश केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार भारत ने पहली बार वर्ष 2016-17 ( फरवरी 2017 तक) के दौरान नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार को 579.8 करोड़ यूनि...
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जैव विविधता और हम

12 सप्ताह पहले
'बायोलॉजिकल' और 'डायवर्सिटी' शब्दों को मिलाकर संयुक्त राष्ट्र की पहल पर 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस मनाया जाता है। इसे 'विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस' भी कहते हैं। इस पहल का लक्ष्य एक ऐसे पर्यावरण का निर्माण करना है, जो जैव- विविधता में समृद्ध, टिकाऊ और आर्थिक गतिविधियों के लिए हमें अवसर प्रदान कर सके। दिलचस्प है कि विकास के मौजूदा प्रचलन में उपभोग की कई चीजें जहां एक तरफ हमारे जीवन में शामिल होती जा रही हैं, वहीं प्रकृति और परंपरा का पुराना साझा लगातार दरकता जा रहा है। दुनिया के तमाम देशों के विकासवादी लक्ष्यों के आगे यह बड़ी चुनौती है कि वह जैव विविधता के साथ सामंजस्य बैठाते हुए कैसे आगे बढ...


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