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मंगलवार, 19 जून 2018

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रेगिस्तान का विस्तार अब सागर तक

एक सप्ताह पहले
रेगिस्तान के बढ़ते दायरे के साथ इस खतरे ने एक ऐसी शक्ल अख्तियार कर ली है, जिसका विस्तार समुद्र तक हो चुका है। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण नुकसान सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि महासागरों पर भी होने लगा है। हवाई यूनिवर्सिटी और अमेरिका के नेशनल मरीन फिशरीज सर्विस द्वारा समुद्री पारिस्थिकीय तंत्र पर प्रकाशित एक रिपोर्ट से पता चला है कि अब समुद्र में भी 'रेगिस्तान' बनने लगे हैं। हालांकि यह सुनने में बड़ा अजीब लगता है क्योंकि रेगिस्तान में तो पानी होता ही नहीं, जबकि इन समुद्री रेगिस्तानों में पानी तो भरपूर है, लेकिन समुद्री जीवन के लिए जरूरी ऑक्सीजन गायब हो रही है।
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समुद्री प्रदूषण से निपटने की तैयारी

2 सप्ताह पहले
संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में समुद्र को गंदा करने वाले स्रोतों को खत्म करने के लिए हाल ही में एक अप्रत्याशित अभियान की शुरुआत की। बाली में इकोनॉमिस्ट वर्ल्ड ओशियन सम्मिट के दौरान शुरू किए गए #क्लीनसी अभियान में 10 देश शामिल हुए। ये देश हैं- बेल्जियम, कोस्टा रिका, फ्रांस, ग्रेनाडा, इंडोनेशिया, नार्वे, पनामा, सेंट लुसिया, सियेरा लियोन और उरुग्वे। इस अभियान के तहत सरकारों से प्लास्टिक को कम करने से संबंधित नीतियों को पारित करने की अपील की गई, प्लास्टिक पैकेजिंग को कम करने तथा प्लास्टिक उत्पादों को रिडिजाइन करने के लिए उद्योगों को चिन्हित करने तथा लोगों से प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करने व उन्हें फेंकने की आदत में बदलाव लाने की ...
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बहादुरी और दृढ़ता का अमर ‘प्रताप’

3 सप्ताह पहले
महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है। वह अकेले राजपूत राजा थे, जिन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका जन्म 9 मई, 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में हुआ था। उनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह था और माता महारानी जयवंता बाई थीं। अपने परिवार की वह सबसे बड़ी संतान थे। उनके बचपन का नाम कीका था। बचपन से ही महाराणा प्रताप बहादुर और दृढ़ निश्चयी थे। सामान्य शिक्षा से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी। उनको धन-दौलत की नहीं, बल्कि मान-सम्मान की ज्यादा परवाह थी।  उनके बारे में मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, ‘इस दुनिया में सभी चीज खत्...
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संस्कृति और विरासत का अनमोल खजाना

5 सप्ताह पहले
भारत इतिहास और संस्कृरतियों के मिलन का देश है। यहां की गंगा-जमुनी संस्कृति की झलक संग्रहालयों में देखने को मिलती है। हम यहां ऐसे ही कुछ खास संग्रहालयों की चर्चा कर रहे हैं, जहां एक तरफ भारत के सभ्यतागत विकास के ऐतिहासिक साक्ष्य सुरक्षित रखे गए हैं, वहीं यहां जाकर इस बात का भी अहसास होता है कि हमारी संस्कृति कितनी बहुरंगी रही है। एचएएल हैरिटेज सेंटर एंड एयरोस्पे एयरोस्पेेस म्यूजियम, बेंगलुरु यह भारत में अपनी तरह का पहला म्यूजियम है। इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनवाया है, इसीलिए इसे एचएएल हैरिटेज सेंटर एंड एयरोस्पेेस म्यूजि...
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रवींद्रनाथ टैगोर - आधुनिक भारत का महानतम संस्कृति-पुरुष

6 सप्ताह पहले
एक संस्कृति-पुरुष किस तरह किसी देश की चेतना की आधुनिक मनोभूमि को न सिर्फ रच सकता है, बल्कि उससे आगे स्वाधीनता और उच्च मानवीय भावबोध का प्रखर वाहक बन सकता है, कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं। उन्होंने जहां एक तरफ भारतीय दर्शन और चिंतन परंपरा को विचार, विमर्श और बोध के नए वैश्विक संदर्भों के बीच रेखांकित और सम्मानित किया, वहीं उन्होंने प्रकृति से लेकर मानवता तक के लिए दुनिया को एक आधुनिक व संवेदनशील नजरिया दिया। उन्हीं के शब्द हैं- ‘मेरा घर सब जगह है, मैं इसे उत्सुकता  से खोज रहा हूं।  मेरा देश भी सब जगह ह...
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नृत्य प्रेम खींच लाया भारत

8 सप्ताह पहले
  भारतीय प्रतिभाएं आज दुनियाभर में अपनी प्रतिभा और कौशल का लोहा मनवा रही हैं। पर इसके साथ एक दुखद पक्ष यह भी है कि लोगों में यह धारणा बनती जा रही है कि प्रतिभाओं के लिए विदेशों में ज्यादा बेहतर अवसर हैं। यही कारण है कि भारतीय प्रतिभाओं का पलायन एक नई समस्या बनकर उभरी है। समाजशास्त्रीय अध्ययन में इस समस्या को ‘ब्रेन ड्रेन’ सिंड्रोम कहा गया है। पर यह स्थिति मौजूदा संदर्भ में तथ्यात्मक तौर पर भले थोड़ी चिंतानजनक लगे पर ऐतिहासिक तौर पर ऐसा नहीं रहा है। ऐसे लोगों का लंबा इतिहास है जिनका जन्म तो विदेश में हुआ पर उन्हें भारतीय संस्कृति, यहां का अध्यात्म और यहां के लोग इतने रास आए ...
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मधुबनी के रंग में रंगा स्टेशन

9 सप्ताह पहले
बिहार के मधुबनी रेलवे स्टेशन पर विश्व प्रसिद्ध मधुबनी शैली की चित्रकारी का काम पूरा हो गया है। स्टेशन को मधुबनी पेंटिंग्स से नया रूप देने वाले कलाकारों को रेलवे ने प्रशस्ति पत्र का देकर सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि दो चरणों में इस रेलवे स्टेशन को मधुबनी पेंटिंग्स से संवारने का कार्य पूरा किया गया है। प्लेटफार्म सहित स्टेशन परिसर के लगभग आधा किलोमीटर के रेडियस में कलाकारों की अलग-अलग टीम द्वारा सीता जन्म, राम-सीता वाटिका मिलन, धनुष भंग, जयमाल, कृष्ण लीला, माखन चोरी, कलिया मर्दन, कृष्ण रास, राधा-कृष्ण रास, विद्यापति, ग्रामीण जीवन, मिथिला के लोक नृत्य व त्योहार सहित तकरीबन 4 दर्जन विषयों पर अपनी कलाकृतियां उकेरी गई हैं। गौरतलब है कि मधुबनी चित्रकला पारंपरिक रूप से इस पूरे इलाके की प...
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नुक्कड़ नाटक से ‘विपुल’ बदलाव

11 सप्ताह पहले
बदलाव और उत्थान का दायरा जब निजी से आगे सामाजिक हो जाए, तो वह एक प्रेरक उदाहरण बना जाता है। ऐसे ही एक उदाहरण का नाम है विपुल सिंह। थिएटर से जुड़े और वाराणसी के रहने वाले विपुल सिंह दूर-दराज के इलाकों में अपनी कला के जरिए लोगों की समस्याओं को सुलझाने और उनको जागरूक करने का काम कर रहे हैं। वे यह काम बिना किसी मदद और अकेले कर रहे हैं। विपुल का दावा है कि वे देश के करीब 21 राज्यों में अपने नाटक आयोजित कर चुके हैं। पिछले सात सालों के दौरान विपुल 7 सौ से ज्यादा नाटक कर चुके हैं और इनमें से ज्यादातर नाटक उन्होंने खुद ही लिखे हैं। जागरूकता की कोशिश
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रूढ़िवादी दबाव में अमर शहादत

13 सप्ताह पहले
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू इन तीनों को अंततः फांसी पर लटका दिया गया। इन तीनों पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने सैंडर्स नामक अंग्रेजी अफसर और चमनसिंह नामक सिख पुलिस अधिकारी की लाहौर में हत्या की। इसके अलावा बनारस में किसी पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप, असेंबली में बम फेंकने का आरोप और मौलमिया गांव में एक मकान पर डकैती डाल कर वहां लूटपाट एवं मकान मालिक की हत्या करने जैसे तीन चार आरोप भी उन पर लगे। इनमें से असेंबली में बम फेंकने का आरोप भगतसिंह ने खुद कबूल किया था और इसके लिए उन्हें और बटुकेश्वर दत्त नामक उनके एक सहायक दोस्त को उम्र कैद के तौर पर काला पानी की सदा सुनाई गई। सैंडर्स की हत्या भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने क...
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'मैं वापस जाना चाहती हूं, लेकिन अपने बच्चों के पास नहीं'

14 सप्ताह पहले
जब जीवन-यापन करना मुश्किल हो गया, तब उसने भीख मांगना शुरू किया। फिर जब इससे भी उसे मदद नहीं मिली, तो उसने वृंदावन का रास्ता चुना। शांति जब महज 13 साल की थी, तभी उसे शादी के बंधन में बांध दिया गया था। उसके परिवार के अनुसार, वह व्यक्ति उनके लिए सबसे उपयुक्त था। शादी के बाद जीवन सामान्य चल रहा था क्योंकि यही भारत में किसी भी विवाहित महिला की जिंदगी होती है। पति बनारस में एक ऊन के कारखाने में काम करता था। उसे तीन लड़कियां और एक लड़के सहित चार बच्चे थे। उसके पास ज्यादा पैसा नहीं था, लेकिन छह लोगों की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। लेकिन शांति की जिंदगी में यह सामान्य खुशी सिर्फ कुछ समय के लिए ही थी। कुछ ही सालों में दि...
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वृंदावन में सामाजिक बदलाव की होली

15 सप्ताह पहले
हमारे समाज में किसी महिला के विधवा होते ही उसके जीवन के सारे रंग बदरंग हो जाते हैं। इतना ही नहीं विधवाओं को सभी शुभ कार्यों से भी दूर रखा जाता है। सदियों से चली आ रही इस सामाजिक कुरीति को समाप्त कर विधवाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने की। डॉ. पाठक उन पुरातन मान्यताओं में विश्वास नहीं करते जिसके अनुसार पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी को समाज और परिवार की मुख्यधारा से काट कर अलग कर दिया जाए। इसी सामाजिक धारणा और मान्यता को बदलने के लिए सुलभ ने वृंदावन में अपने परिवार से परित्यक्त विधवाओं को होली खेलने का अनूठा अवसर प्रदान किया। इस वर्ष भी वृंदावन के राधागोपीनाथ मंदिर में विधवा ...
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वैज्ञानिक अनुसंधान की बुनियाद के पीछे था ‘नेहरू-भटनागर प्रभाव’

16 सप्ताह पहले
शांतिस्वरूप भटनागर का नाम भारत के उन अग्रणी वैज्ञानिकों में शामिल किया जाता है, जिन्होंने विज्ञान की मदद से औद्योगिक समस्याओं को हल करने में अहम भूमिका निभायी है। उन्हें देश के सबसे बड़े शोध संगठन वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के संस्थापक के रूप में याद किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के विकास में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका को समझते हुए शोध संस्थानों की स्थापना का दायित्व जिन व्यक्तियों को सौंपा, उनमें भटनागर प्रमुख थे। वर्ष 1942 में सीएसआईआर की स्थापना शांतिस्वरूप भटनागर (21 फरवरी 1894 – 1 जनवरी 1955) की अध्यक्षता में की गई थी और भटनागर के नेतृत...


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