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मंगलवार, 19 जून 2018

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पर्यावरण के लोकतंत्र की चिंता

एक सप्ताह पहले
पेड़ और प्रकृति को एक साथ देखने की नसीहत देने वाले तो कई मिलेंगे पर उसे जिस तरह वंगारी मथाई ने अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया, वह काबिले तारीफ है। इसीलिए जब 25 सितंबर, 2011 को उनके निधन की खबर आई तो पूरी दुनिया ने उन्हें पेड़ और हरियाली से प्यार करने वाली प्रतिबद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में अपनी श्रद्धांजलि दी। 1940 में पैदा हुईं मथाई ने जब 1977 में पर्यावरण के लिए अपनी मुहिम शुरू की, वह तब से ही केन्या के अहम लोगों में शुमार रहीं। वह जीवन भर पर्यावरण संरक्षण और अच्छे प्रशासन पर जोर देती रहीं। उनके द्वारा स्थापित संस्था ग्रीन बेल्ट मूवमेंट ने पूरे अफ्रीका में करीब 4 करोड़ पेड़ लगाए हैं। 1980 के दशक में उन्होंने केन्या में रेड...
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मलाला में सबसे पहले देखी संभावना

2 सप्ताह पहले
मलाला यूसुफजई और डेसमंड टूटू, ये दो नाम ऐसे हैं, जिनके नाम, कार्य और संघर्ष से न जाने कितने लोग प्रेरणा लेते हैं। दिलचस्प है कि मलाला टूटू से काफी छोटी हैं, पर दोनों के बीच मानवता की सेवा और अहिंसक संवेदना की एक ऐसी कड़ी जुड़ी है, जिसकी कई बार लोग उदाहरण के तौर चर्चा करते हैं। एक बार की बात है कि अंतरराष्ट्रीय बच्चों की वकालत करने वाले समूह किड्स राइट्स फाउंडेशन ने मलाला को अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए प्रत्याशियों में शामिल किया, वह पहली पाकिस्तानी लड़की थी, जिसे इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।  दक्षिण अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता डेसमंड टूटू ने एम्स्टर्डम, हॉलैंड में एक समारोह के दौरान 2011 के ...
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अन्याय और असमानता के खिलाफ निर्भीक आवाज

2 सप्ताह पहले
भारत सरकार ने महात्मा गांधी की 125वीं जयंती के अवसर पर 1995 में अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने की शुरुआत की थी। यह पुरस्कार 2005 में डेसमंड टूटू को दिया गया। 1984 में नोबेल पुरस्कार पा चुके टूटू के लिए यह एक और अवसर था, जब भारत में शांति और अहिंसा का हिमायत में लगातार खड़े रहने वाले आर्चबिशप डेसमंड टूटू के बारे में गंभीर सिंहावलोकन किया गया और मानवता के लिए उनकी सेवाओं की सराहना हुई। दक्षिण अफ्रीकी पादरी और शांति कार्यकर्ता टूटू दक्षिण अफ्रीका में एग्लिंकन चर्च का नेतृत्व करने वाले प्रथम अश्वेत व्यक्ति हैं। उन्होंने रंगभेद के विरोधी के रूप में विश्वव्यापी प्रसिद्धि प्राप्त की, उनकी यह प्रसिद्धि महात्मा गांधी, मार्टि...
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अमेरिका का गांधी

3 सप्ताह पहले
मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) वह नाम है, जिसे एक समय में अमेरिका का हर नागरिक तो जानता ही था, साथ ही उनकी ख्याति विश्व के प्रत्येक कोने तक भी पहुंची। रंगभेद के खिलाफ मार्टिन ने जिस तरह से लड़ाई लड़ी, वह आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है। अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकन लोगों को समानता का अधिकार दिलाने का श्रेय मार्टिन लूथर किंग को ही जाता है। एक समय था जब अमेरिका में हर तरफ श्वेत लोगों की मनमानी चलती थी। अश्वेत लोगों को अपना गुलाम समझा जाता था। उस समय मार्टिन उन सब के लिए एक आवाज बनकर सामने आए थे। खास बात तो यह है कि अपने इस मिशन को मार्टिन ने बिना किसी हिंसा के सफल बनाया था। 
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महिलाओं के अनुकूल कृषि मशीनीकरण की नई पहल

3 सप्ताह पहले
देश के कुल कृषि श्रमिकों की आबादी में करीब 37 प्रतिशत महिलाएं हैं। लेकिन, खेतीबाड़ी में उपयोग होने वाले ज्यादातर औजार, उपकरण और मशीनें पुरुषों के लिए ही बनाए जाते हैं जो अधिकतर उपकरण महिलाओं की कार्यक्षमता के अनुकूल नहीं होते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा महिलाओं के अनुकूल उपकरण और औजार बनाए जाने की पहल से यह स्थिति बदल सकती है।  विकास दर और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश जैसे कारकों को ध्यान में रखकर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वर्ष 2020 तक कृषि में महिला श्रमिकों की भागीदारी बढ़कर 45 प्रतिशत हो सकती है, क्योंकि ज्यादातर पुरुष खेती के कामों को छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। ऐसे में भविष्य में महिलाएं ही कृषि में प्रमुख...
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बेटियों की स्वीकार्यता बढ़ी

4 सप्ताह पहले
बेटियों को लेकर देश-समाज की पुरानी रूढ़ियां टूट रही हैं। आज सरकार खुद आगे बढ़कर बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ का अभियान चला रही है। आलम यह है कि जहां लैंगिक अनुपात में लगातार सुधार आ रहा है, वहीं यह समझ भी बनी है कि संबंध और परिवार की सामाजिक अवधारणा बिना बेटियों को केंद्र में रखकर नहीं पूरी हो सकती। यही वजह है कि जिन परिवारों में बच्चे नहीं हैं, वे अब बेटों की जगह बेटियों को गोद लेने को प्राथमिकता देते हैं। 2015 में भारत में लगभग 59 फीसदी दंपतियों ने बच्चियों को गोद लेने के लिए आवेदन डाला, जबकि बेटों के लिए सिर्फ 41 फीसदी। यह आंकड़ा  बताता है कि बेटियों के लिए स्वीकार्यता बढ़ रही है। जो विभेद सालों से समाज में रहा है अब लोग उसे ...
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दूसरे देश के बच्चों को गोद लेने वाला अनूठा परिवार

4 सप्ताह पहले
दुनिया में एक तरफ जहां परिवार की इकाई को लगातार संयुक्त से एकल बनाने की होड़ दिखती है, वहीं दूसरी तरफ जीवन और परिवार को कुछ नई और अनूठी सोच भी देखने को मिल रही है। ऐसी ही एक सोच हो बच्चों को गोद लेकर अपना परिवार बढ़ाने की। जहां भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक के सेलिब्रिटीज पहले से ही बच्चों को गोद लेने की प्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं तो वहीं अब यह कार्य सामान्य लोग भी कर रहे हैं। समाज विज्ञानी इस बारे में दो तरह की राय रखते हैं। उनकी नजर में ऐसा करना जहां एक तरफ अत्यंत वात्सल्यता का परिचायक है, वहीं इसे नए दौर में परिवार में पति-पत्नी की भूमिका और संबंध में आए नए बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।  एक ऐसा ही दंपति है, जो...
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ब्रेन ट्यूमर पीड़िता बनी ब्यूटी क्वीन

5 सप्ताह पहले
ब्रेन ट्यूमर का शिकार बन जाने के बाद किसी भी आदमी की जिंदगी लगभग खत्म हो जाती है। वह यह मान बैठता है कि अब उसकी जिंदगी में कुछ बचा नहीं है। लेकिन 31 साल की सोनिया सिंह उन सबके लिए एक बड़ी और प्रेरक मिसाल हैं, जो ब्रेन ट्यूमर जैसी घातक बीमारी से पीड़ित हैं। इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित होने के बाद सोनिया सिंह ने अपने हौसलों को बीमार नहीं होने दिया। और लगातर इस बीमारी से जूझते हुए कर्नाटक ब्यूटी क्वीन का खिताब हासिल किया। पांच साल पहले एक दिन सोनिया को सिर और कंधों में तेज होने लगा। इसके बाद उन्हें भोजन निगलने में भी दिक्कत आने लगी। दर्द लगातार न होकर बीच-बीच में होता रहता था। इसके बाद जनवरी 2013 सोनिया बीजीएस ग्लोबल ग्लेनईग...
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पाबीबेन के हुनर से मिली कच्छ को नई पहचान

5 सप्ताह पहले
अरब सागर के तट पर बसे गुजरात के कच्छ की पहचान अगर प्राचीन सिंधु सभ्यता को लेकर है, तो आधुनिक कला-संस्कृति, कारीगरी और हुनर भी उसकी पहचान है। बात जब हुनर की आती है तो जेहन में पाबीबेन का नाम आता है, जिन्होंने कच्छ की कला को दुनिया में पहचान दिलाई।  कच्छ के अनजार तालुका की पाबीबेन महज चौथी कक्षा तक पढ़ी हैं। जनजातीय राबारी समुदाय की इस महिला के सामने एक तरफ चुनौतियों का आसमान था, तो दूसरी ओर अपनी कला के हुनर से दुनिया जीत लेने की उमंग भी। वह आज 20 लाख रुपए सालाना के टर्नओवर वाला व्यवसाय खड़ा कर चुकी हैं और देश ही नहीं, विदेशों में भी अपने हुनर का डंका बजा चुकी हैं। पाबीबेन के जीवन में एक समय ऐसा भी आया, जब उनके पि...
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फिटनेस साथ रहने तक लड़ती रहूंगी : मैरीकॉम

6 सप्ताह पहले
राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पांच बार की विश्व चैंपियन महिला मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम ने कहा है कि फिटनेस साथ रहने तक वह देश के लिए खेलती रहेंगी।  35 वर्षीय मैरीकॉम ने आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 21वें राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। उन्होंने 48 किलोग्राम भार वर्ग के लाइट फ्लाइवेट वर्ग में उत्तरी आयरलैंड की क्रिस्टिना ओ हारा को मात दी थी।  मैरीकॉम ने कहा, ‘मैंने संन्यास के बारे में कभी बात नहीं की। ये सब अफवाह है। मेरा अगला लक्ष्य ओलंपिक स्वर्ण है। मैं हारूं या जीतू, यह अलग बात है, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मैं कड़ी मेहनत कर रही हूं।’ उन्होंने कहा, ‘मेरे लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती। इस चीज को हम अपने...
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अशक्त बनी अशक्तों की शक्ति

11 सप्ताह पहले
‘कभी हार न मानें' -यह वाक्य सुनने में जितना सरल है, इसमें छिपी अभिप्रेरणा उतनी ही गंभीर है। इसी वाक्य से प्रेरित 26 वर्ष की विराली मोदी ने कभी अपनी अशक्तता को अभिशाप नहीं माना, बल्कि दूसरे अशक्त लोगों का जीवन सुगम बनाने के लिए वह निरंतर संघर्षरत हैं।  चौदह साल की उम्र में मलेरिया से पीड़ित होने के कारण विराली 23 दिनों तक कोमा में रही थीं। आंखें खुलीं तो परिजनों ने इसे कोई दैवी चमत्कार से कम नहीं माना। चिकित्सकों द्वारा लाइफ सपोर्ट हटाए जाने पर उनके प्रमुख अंग खुद काम करने लगे, लेकिन वह अपने पैरों पर चलने-फिरने से अशक्त बन चुकी थीं। तभी से वह खुद व अन्य अशक्त लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। विराल...
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देश का दूसरा लेडीज स्पेशल स्टेशन

14 सप्ताह पहले
महिला सशक्तिकरण की दिशा में उत्तर पश्चिम रेलवे ने जयपुर मंडल के गांधीनगर स्टेशन ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। गांधीनगर रेलवे स्टेशन देश में ऐसा दूसरा स्टेशन हो गया, जिसकी कमान पूरी तरह महिलाओं के हाथ में होगी। जयपुर-दिल्ली रेलमार्ग पर स्थित जयपुर का यह महत्वपूर्ण स्टेशन है। यहां से प्रतिदिन लगभग 50 रेलगाड़ियां गुजरती हैं, जिनमें से 25 रेलगाड़ियां यहां रुकती हैं। रियल टाइम मॉनिटरिंग उत्तर-पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी तरुण जैन बताते हैं कि लगभग 7 हजार यात्री प्रतिदिन गांधीनगर स्टेशन से आवाजाही करते हैं। इस स्टेशन पर स्टेश...


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