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गुरुवार, 24 अगस्त 2017

Tribute-to-Environment-Minister-Anil-Madhav-Dave

अनिल माधव दवे - सूना हो गया ‘नदी का घर’

13 सप्ताह पहले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैबिनेट को लेकर हमेशा यह बात तो सुर्खी बनी कि इसमें कितने पॉलिटिकल स्टॉलवर्ट हैं, जबकि इस कैबिनेट की खासियत यह है कि इसमें स्वयंसेवकत्व के भाव से सार्वजनिक जीवन में आए लोगों को अवसर दिया गया है। ऐसे ही एक स्वयंसेवक थे अनिल माधव दवे। केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में जब उन्हें मोदी कैबिनेट में शामिल किया गया तो लोगों ने यह जाना कि पर्यावरण के साथ उनका रिश्ता नया नहीं है। अपने साठ साला जीवन को जिस सार्थकता और उद्देश्यपरकता के साथ दवे ने जिया, वह वाकई अभिभूत करने वाला है।  अनिल माधव दवे को निस्संदेह एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता और सौम्य राजनेता के तौर पर याद किया जा...
Reema-Lagoo-Modern-Mother-of-Hindi-Movies

रीमा लागू - बहुत याद आएंगी हिंदी फिल्मों की ‘आधुनिक मां’

13 सप्ताह पहले
फिल्मी परदे पर मां का किरदार निभाने वाली अभिनेत्रियों में खासी पसंद की जाने वाली रीमा लागू का 17 मई को हृदयाघात से निधन हो गया। आमतौर पर बॉलीवुड में मां सफेद साड़ी में दिखाई जाती है, जो आंसू और परेशानी के बीच गरीबी और भ्रष्टाचार के साथ संघर्ष करती है। मां के इस सिनेमाई अवतार को जिन अभिनेत्रियों ने पहचान और लोकप्रियता प्रदान की, उनमें सुलोचना, निरूपा राय और राखी सर्वप्रमुख हैं।  दरअसल, हम मां को लेकर जिस संवेदना से सबसे पहले और सबसे ज्यादा भरते हैं, उसमें भी मां की तस्वीर कुछ इसी अंदाज में जेहन में उभरती है। पर महेश मांजरेकर की फिल्म ‘वास्तव’ ने मां की इस सिनेमाई छवि को काफी हद तक तोड़ा। इस फिल्म में मां ही ...
Tribute-to-Veteran-Actor-Vinod-Khanna

बहुत याद आएंगे ‘मेरे अपने’

16 सप्ताह पहले
अभिनेता और विनोद खन्ना की अंत्येष्टि में यूं तो पूरा बॉलीवुड उमड़ा पर उनके खोने का गम कितना गहरा होगा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन पर तकरीबन पूरा बॉलीवुड उमड़ पड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने गहरा शोक जताया। दरअसल, यह उस लाजवाब शख्स की लोकप्रियता और स्वीकृति का प्रमाण है, जो बीते चार दशकों में रोल मॉडल की तरह सार्वजनिक जीवन जीने वाला इंसान रहा। जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों के बीच उन्होंने जिस तरह संतुलन साधा, वह वाकई काबिले तारीफ है। खासतौर पर जिस तरह अपने करियर की ऊंचाई पर रहते हुए उन्होंने एक दिन अचानक अपने परिवार के साथ मीडिया के सामने आकर एेलान कर दिया कि वे फिल्मों को अलविदा कह रहे हैं और ओशो के ...
Simi-Garewal-says-Satyajit-Ray-do-not-let-Shooting-for-a-Week

एक हफ्ते तक उन्होंने शूटिंग नहीं करने दिया -सिमी ग्रेवाल

18 सप्ताह पहले
उनकी बांग्ला फिल्म ‘अरण्येर दिन-रात्रि’ की बात सोचने पर आज भी आश्चर्य लगता है। यदि मिस्टर रे इस फिल्म का निर्देशन नहीं करते,तो शायद मैं काम ही नहीं कर पाती। छिपादोहर नाम के एक  जंगल में इसकी शूटिंग चल रही थी। शुरू के एक  हफ्ते तक  तो मिस्टर रे ने मुझे शूटिंग ही नहीं करने दिया। हर दिन शाम को जंगल के नजदीक  एक  देसी शराब के ठेके पर ले जाते थे। वहां घंटों खड़े रहकर मुझे यह आब्जर्व करना पड़ता था कि लोग कैसे मद्यपान कर रहे हैं। ‘मिस्टर रे वॉज ए टू परफेक्टनिस्ट...’ वैसे जंगल में शूटिंग करना भयंकर कष्टकर था। बिजली, अच्छा वॉशरूम, नहाने का पानी कुछ भी नहीं था। ब्रेकफास्ट,लंच, डिनर का एक &nbs...
Shyam-Benegal-says-Satyajit-Ray-New-Steam-Filmmaker

एक नई धारा के फिल्मकार

18 सप्ताह पहले
भारतीय सिनेमा जगत में सत्यजीत राय का नाम एक युग प्रवर्तक  के रूप में लिया जाएगा। उनके जैसा शिल्पी ना उनसे पहले आया था, ना उनके बाद हमें मिला है। वो पहले ऐसे निर्देशक थे, जिन्होंने इस देश के फिल्म निर्माण की प्रचलित धारा को पूरी तरह से बदल कर उसे दूर-दूर तक  पहुंचा दिया था। राय मोशाय से पहले कई प्रतिभाशाली फिल्म निर्माता हमें मिले हैं, पर उनमें से कोई भी एक  ऐसा नहीं था जो प्रचलित धारा से बाहर निकल कर कुछ कर सका हो। उन्होंने हम सब को चौंका कर उस स्थिरता से मुक्ति दिलाई थी। हम सभी का विस्मृत करते हुए उन्होंने सिनेमा का एक  अलग कला पक्ष और एक  नई संभावना खोज निकाली। फिल्म के संबंध में हमारी ललित धारणा को उन्ह...
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गोलमाल है भाई सब गोलमाल है

20 सप्ताह पहले
अभिनेता और फिल्मकार अमोल पालेकर का जिक्र चलते ही सबसे पहले उन्हें उनकी फिल्म 'गोलमाल' के लिए याद किया जाता है। 1980 में प्रदर्शित फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'गोलमाल' का नाम आते ही आज भी सिने रसिक एक सहज गुदगुदी-सी महसूस करते है। कॉमेडी फिल्मों की कोई भी चर्चा 'गोलमाल' के बिना अधूरी है। शायद यही बात था कि ऋषि दा को अपनी एक अन्य कॉमेडी फिल्म 'नरम गरम', 'गोलमाल' से ज्यादा पसंद थी। अभिनेता देवेन वर्मा के मुताबिक, 'यह एक क्लासिक कॉमेडी है, जो हर पल आपको हंसने के लिए मजबूर करती है। ऐसी फिल्में कभी-कभी ही बनती हैं ।' इसमें कोई पेचीदा प्रेम कहानी नहींं थी, न ही इसमें कोई खलनुमा पात्र था, न ही मारधाड़ के दृश्य थे। फिल्म की शुरुआत होती है, इस...
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'साहित्यिक कृति पर फिल्में  बनाने का पक्षधर हूं'

20 सप्ताह पहले
आप खुद कोई कहानी सोचते हैं और उसे पटकथा का रूप देते हैं  या फिर किसी साहित्यिक कृति को पटकथा की शक्ल देते हैं, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं । ऋषि दा खुद की कहानी और साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाने में माहिर थे। जबकि हिंदी फिल्म निर्माताओं की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वे हॉलीवुड की फिल्मों से बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। दो-तीन विदेशी फिल्मों का मसाला लेकर उसे अपनी फिल्में बनाना बहुत पसंद है। असल में इसमें कोई ज्यादा जोखिम नहींं होता है, ना ही कोई जवाबदेही होती है। फिल्म निर्माण में ऋषि दा अपनी जवाबदेही का कितने शिद्दत से पालन करते थे, यह सच्चाई उनकी सारी फिल्में बयां कर देती हैं। एक फिल्मकार के प्रेरणा का श्रोत कुछ भी हो सकता है, पर उसका सृजन एकदम मौलिक होना चाहिए। ऋषि दा की फिल्में इस ...
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किसानों के लिए कैप्टन बस्ती हार्वेस्टर

20 सप्ताह पहले
एक तरफ जहां किसान अपनी गरीबी, दयनीय स्थिति और बढ़ते कर्ज को लेकर परेशान है तो वहीं उत्तर प्रदेश के एक किसान ने गेहूं की कटाई के लिए एक कंबाइड मशीन विकसित की है। इस मशीन को उन्होंने कैप्टन बस्ती हार्वेस्टर का नाम दिया है। बता दें कि उत्तर प्रदेश के आज्ञाराम वर्मा पेशे से किसान हैं। उन्होंने किसानों के लिए कम लागत की हार्वेस्टर मशीन तैयार की है। उनकी यह मशीन अब तक मिलने वाली हार्वेस्टर्स की तुलना में काफी सस्ती है, बल्कि इसे कम ताकत वाले मोटर से भी चलाया जा सकता है। यह मशीन गेहूं को जड़ से काटती ही नहीं है, बल्कि बीज और भूसा भी अलग-अलग कर देती है। आज्ञाराम कहते हैं कि गांवों की अधिकतर सड़कें संकरी होती हैं, जिसके चलते बड़े हार्वेस्टर खेतों तक नहीं पहुंच पाते हैं। बड़े हार्वेस्ट...
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सितारों की मस्ती भरी होली

24 सप्ताह पहले
आम आदमी की तरह हमारे फिल्मी सितारे भी होली की मस्ती में पूरी तरह से सराबोर होना चाहते हैं, पर बहुत सतर्क होकर। सुष्मिता सेन कहती हैं, 'आप यदि कुछ संयम के साथ इस पर्व को मनाएं तो यह पूरे देश का एक ऐसा फेस्टिवल है, जिसमें भाई-चारा और मेल-मिलाप की बातें पूरी तरह से शामिल रहती हैं। आप कोई दूसरा पर्व अलग से भी मना सकते हैं, पर होली के रंग गुलाल से खेलने के लिए तो आपको हमेशा किसी एक साथी की जरूरत पड़ेगी। सच कह रही हूं कि कई बार होली पर अपने सेलिब्रिटी होने का बहुत दुख होता है। असल में मेरा जो नेचर है, ऐसे मौके पर लोगों के साथ इंज्वॉय करना मुझे बहुत पसंद है, पर भीड़ से डर लगता है। पर एक बात है। इस त्योहार के मौके पर मैंने कई बार अपने रूठे हुए लोगों का मनाया है...
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देखो जग बौराना

24 सप्ताह पहले
होली पर गुझिया, पूए, पूरनपोली-बनारस से बरसाने और शांति निकेतन तक सभी तरह के रंगों, स्वादों को अपने में समेटे सबसे पहले याद आता है बनारस। यादों में रची-बसी बनारसी होली का रंग इतना गहरा है कि पूरे फागुन और पूरे चैत तक नहीं उतरता। इस रंग की उमंग में कीचड़, मिट्टी, गोबर, रंग, कालिख भी हो सकता है और कुछ न हो तो पानी तो है ही, चाहे वह कहीं का भी हो। व्यक्ति भी जवान, प्रौढ़ से बूढ़े तक कोई भी, हर कोई देवर! फागुन में बुढ़वा देवर लागे! अगर भारतीय आस्था पुराणों पर टिकी है, अगर बनारस शिवजी के त्रिशूल पर टिका है तो बनारस की होली अल्हड़, हुल्लड़ और कुल्हड़ पर टिकी है। अल्हड़ तो मस्ती का पर्याय हुआ, हुल्लड़ भदेसपन का और कुल्लड़...? भांग और ठंडाई इस उत्सव के प्रतिष्ठाधर्मी पेय हैं और ये साम...
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पलों को कैद करती महिलाएं

24 सप्ताह पहले
हमेशा से ही फोटो खींचने और खिंचवाने का शौक महिलाओं को पुरुषों से कहीं ज्यादा रहा है। घर का कोई भी छोटा-बड़ा आयोजन हो, लड़कियों का एक काम हर मौके को कैमरे में कैद करने का होता है। लेकिन यही फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी प्रोफेशनल तरीके से करनी हो तो कैमरा पुरुषों के हाथ में दिखता है। लेकिन पुरुषों की बनाई मजबूत दीवार में समय-समय पर सेंधमारी होती रही है। कुछ महिलाओं ने कभी अपने हुनर से, कभी हिम्मत से पुरुषों की इस दुनिया में अपनी सशक्त जगह बनाई है। 'महिला दिवस' के अवसर पर आज हम ऐसी ही कुछ महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं। सरस्वती चक्रवर्ती सबसे पहले बात करते हैं - सरस्वती की। इन्होंने उस समय काम शुरू किया जब इस क्षेत्र में कोई महिला आ सकती है, ...
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'महिला का आकलन पहनावे से नहीं करें'

25 सप्ताह पहले
इधर महिलाओं के आधुनिक पहनावे को लेकर काफी कुछ कहा जा रहा है। इस बारे में आपके परिवारवालों ने आपका कितना सपोर्ट किया? मैं खुशनसीब हूं कि मेरे परिवार ने इस मामले में मुझे बहुत सपोर्ट किया। मैं साड़ी पहनना पसंद करती हूं। इसमेंं तो कोई बुराई नहीं है तब बहुत सारे लोग ऐसा सोचते थे कि मैं इस्टर्न वेयर ज्यादा पहनती हूं, इसीलिए मुझे एक टाइप के किरदार में ही ज्यादा कास्ट किया जाएगा। बहुतों से यह सुनना पड़ा है कि यदि हर तरह का परिधान नहीं पहनोगी,तो तुम्हारा करियर लंबा नहीं चलेगा। लोग इस बात को क्यों नहीं समझते हैं कि एक महिला के साड़ी पहनने का मतलब यह नहीं है कि वह बहुत रिजर्व है? आप यदि मेरे कोरियोग्राफ को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि मैंने बहुत ज्यादा साहसी किरदार किए ह...


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