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मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

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एमडीआर टीबी के शोध पर ध्यान देने की जरूरत 

29 सप्ताह पहले
नई दिल्लीः इंडियन सोसाइटी फॉर क्लीनिकल रिसर्च (आईएससीआर) ने कहा है कि शोध से औषधि रोधी टीबी का नवोन्मेषी इलाज विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा, जिससे देश में टीबी का जोखिम कम होगा। इससे देश में स्वास्थ्य पर आने वाला खर्च घटेगा और 2025 तक टीबी मुक्त बनने की दिशा में भी तेजी आएगी। आईएससीआर ने कहा कि औषधि की खोज एक लंबी और गहन प्रक्रिया है और इसके लिए काफी निवेश की जरूरत है। आईएससीआर की अध्यक्ष सुनीला थाट्टे ने बताया कि डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट के मुताबिक विशेष रूप से टीबी के इलाज के लिए आखिरी बार एक औषधि 1960 के दशक में पेश की गई थी। प्रतिरोध से पार पाने के लिए अधिक सक्षम औषधि की खोज की तुलना में सूक्ष्मजीवरोधी के प्रति प्रतिरोध तेजी से बढ़ा है। विश्व स्वास्थ्य ...
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एक नई सुबह की आगाज़ है - उषा

33 सप्ताह पहले
आकाश के चिलमन से झांकने की तैयारी में हैं सूरज देवता...भारत की राजधानी दिल्ली से महज एक सौसत्तर किलोमीटर दूर...राजस्थान के एक छोटे से ऐतिहासिक शहर अलवर में अभी भोर की पहली किरणनहीं फूटी है...पर जागने की आहटों के बीच उठने से पहले की बेचैन करवटें हैं ये ...उषा, नंदा, लक्ष्मी, शकुंतला, ललिता...नींद में तुम भी हो...पर तुम्हें हमेशा जागना पड़ा है कहीं पहले...अपने पति और&n...
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जिंदगी का ग्रीन सिग्नल

33 सप्ताह पहले
दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में जिंदगी से जंग लड़ता मासूम अभिराज। हृदय की गंभीर समस्या से जूझ रहे इस मासूम के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। अपने घर के इकलौते चिराग को बचाने के लिए घरवाले हार्ट की तालाश हर जगह किए, लेकिन सिवाए निराशा के कुछ हाथ नहीं लगी। निराशा में डूबे अभिराज के पिता को आशा की किरण दिखाई उनके डॉक्टर ने। जब डॉक्टर ने उन्हें बताया कि शहर के ही एक अन्य अस्पताल में एक ब्रेन डेड मरीज दीपक है, जिसके परिजन उसका अंग डोनेट करना चाहते हैं। दीपक का हार्ट अभिराज की बॉडी में ट्रांसप्लांट करने की बात हुई, लेकिन इन दोनों अस्पतालों के बीच की लंबी दूरी सबसे बड़ी बाधा बन रही थी। 20 किमी की लंबी दूरी का पता चलते ही आशा की किरण फिर से धुंधली नजर आने लगी। हेवी ट्...

बदली गांव की तस्वीर

39 सप्ताह पहले
प्रवासी भारतीय डॉक्टर दीपेंद्र सिन्हा भले ही भारत से लाखों किलोमीटर दूर बसे हों, लेकिन उनका दिल हिन्दुस्तान के लिए हरदम धड़कता है। यही कारण है कि अमेरिका में रह रहे दीपेंद्र बिना कोई चंदा या सरकारी मदद जुटाए पैतृक गांव नौबस्ता की तस्वीर बदलने में जुटे हैं। बिजली, पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं को अपने पैसे से उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं। दीपेंद्र द्वारा भेजे गए पैसे से अभी तक गांव में 125 बिजली के खंभे, 96 शौचालय, 200 हैंडपंप और 10 नि:शुल्क आवास बनवाए जा चुके हैं। गांव के बेसहारा गरीबों को दीपेंद्र की ओर से बनवाए गए आवास दिए गए हैं। गांव में विकास कार्यों की निगरानी के लिए दीपेंद्र ने 17 लोगों की एक टीम बनाई है।...
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भारतीय उपक्रमों के साथ गूगल

39 सप्ताह पहले
प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनी गूगल की योजना भारत के लघु एवं मझोले उपक्रमों को डिजिटल बनाने की है। इसके तहत गूगल ने एक पहल की है। इससे उसे इन उपक्रमों में अपनी पैठ मजबूत बनाने में भी मदद मिलेगी। कंपनी के भारतीय मूल के प्रमुख सुंदर पिचाई के मुताबिक कंपनी भारत के लिए उत्पादों पर काम कर रही है। बाद में इसे वैश्विकविस्तार दिया जाएगा। भारती की अहमियत रेखांकित करते हुए पिचाई ने कहा, 'जब हम भारत जैसे देश के लिए कोई समाधान सोचते हैं, तो वह पूरी दुनिया में हर किसी के लिए समाधान होता है। इससे हमें प्रेरणा मिली कि हम यहां अपनी टीम बनाएं और ज्यादा समय यहां गुजारें, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि हमारे उत्पाद हर किसी के लिए उपयोगी हों।’ उ...
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अगले सत्र से आरक्षण

39 सप्ताह पहले
सरकार हाल में पारित दिव्यांगता विधेयक के नियमों को 14 अप्रैल तक अंतिम रूप देना चाहती है, ताकि अगले शैक्षणिक सत्र से दिव्यांगों को उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पांच फीसदी आरक्षण मिलने लगे। विधेयक के मुताबिक छह वर्ष से 18 वर्ष के बीच के दिव्यांगों को नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार प्राप्त होगा। संसद के शीत सत्र के दौरान पारित दिव्यांगों के अधिकार विधेयक में दिव्यांगों को सरकारी नौकरियों में तीन से चार फीसदी आरक्षण और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में तीन से पांच फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने बताया, 'दिव्यांगता विधेयक को संसद के शीत सत्र में पारित किया गया और इसे अधिसूचित...
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अपने गड्ढ़े आप भरेंगी सड़कें !

45 सप्ताह पहले
इन सड़कों को बनाने में कोई अतिरिक्त लागत भी नहीं लगेगी। आधुनिक मटीरियल और तकनीक के इस्तेमाल से उन्होंने ऐसी सड़कें बनाई हैं जो खुद को रिपेयर कर सकती हैं और जो किफायती के साथ-साथ टिकाऊ भी हैं। नागपुर से आने वाले नेमकुमार बनथिया यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में सिविल इंजिनियरिंग डिपार्टमेंट में प्रफेसर हैं। 34 साल पहले कनाडा पहुंचने के बाद बेहतर सड़कों की उनकी खोज शुरू हो गई। बेंगलुरु से करीब 
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रेलवे के लिए ग्रीन एनर्जी

45 सप्ताह पहले
ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने की बात करते हुए रेल मंत्री ने कहा कि रेलवे में अच्छी खासी बिजली का खर्चा है। ट्रेनों के परिचालन के लिए डीजल का भी इस्तेमाल होता है। इस वजह से रेलवे कहीं न कहीं प्रदूषण फैलाती है। मौजूदा परिप्रेक्ष्य में यह जरूरी है कि रेलवे को कैसे इको फ्रेंडली बनाया जाए। इसके लिए वातावरण पर कम से कम दुष्‍प्रभाव डालते हुए एक ऊर्जा सिस्‍टम को साकार करने के लिए कम लागत का...


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