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गुरुवार, 21 जून 2018

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तोरुलता - बच्चों ने किया बेबस

2 दिन पहले
उसकी उम्र14 वर्ष थी और वह 50 वर्ष का था। उसका, उस ढलती उम्र के व्यक्ति से विवाह हो गया। उसको शायद उस वक्त पता था कि ऐसा हो सकता है और ऐसा हुआ भी। वह जल्द ही विधवा हो गई। पश्चिमी बंगाल के बालुरघाट की तोरुलता लंबे समय से विधवा हैं। उनके उम्रदराज पति को समय के साथ सांस की बीमारी ने घेर लिया और फिर उनकी मौत हो गई। उनके एक बेटी थी और दो बेटे थे। उनके तीनों बच्चों की शादी पिता के मरने से पहले ही हो गई थी। तोरुलता कहती हैं कि यद्दपि उनके पति की मृत्यु हो गई थी, लेकिन वह अपनी सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभा चुके थे और इसीलिए उसके ऊपर अब कोई भार नहीं था।” वह बताती हैं, "मुझे हम दोनों की उम्र के बड़े अं...
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प्रतिभा रॉय - वृंदावन ने उसके घाव भरे

एक सप्ताह पहले
‘मैं एक विधवा नहीं हूं, पर मैं कभी एक पत्नी भी नहीं थी। यह सब झूठ था। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी मानसिक रूप से बीमार थी, इसीलिए उन्हें और उनके बच्चों को मेरी आवश्यकता थी। यह सब झूठ था। वे चाहते थे कि उन्हें पूरी तरह से एक पूर्णकालिक नौकरानी मिले। मैं वास्तव में कभी नहीं चाहती थी, बस जरुरत थी। यह सब झूठ था ... और फिर उसने बोलना बंद कर दिया और कहा कि अब इस पर बातचीत करने का कोई मतलब है।’ यह कहानी है, पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले स्थित बलरामपुर की प्रतिभा रॉय की, जिन्होंने वर्ष 2003 से वृंदावन आने-जाने का सिलसिला शुरू किया। प्रतिभा का विवाह 15 साल की उम्र में उनसे दुगनी उम्र के एक व्यक्ति (32) के...
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वत्सना घोष - अपने बच्चों ने दुत्कारा लाल बाबा ने अपनाया

3 सप्ताह पहले
एक औरत तमाम दुखों और मुश्किलों को सहते हुए परिवार के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर देती है और वही परिवार और बच्चे जब उसकी इज्जत करना तो दूर उसकी तरफ देखना भी नहीं चाहें तो उस पर क्या बीतती होगी। यह उस औरत के सिवा कोई नहीं समझ ओर जान सकता जिसने ऐसा दुख झेला हो। ऐसी ही एक औरत है वत्सना घोष।  अपने बच्चों की उपेक्षा से आहत वत्सना घर और समाज से बहुत दूर वृंदावन के शारदा आश्रम में रहती हैं। जिनका बेटा तब तक उनका अपना था, जब तक उसे मां के सहारे की जरूरत थी। जैसे ही वह बड़ा हुआ,उसकी शादी हुई, तब पूरा नजारा ही बदल गया। उसे हाथ पकड़ कर चलना सिखाने वाली, हाथों से निवाला खिलाने वाली मां अब मां नहीं रही, बोझ बन गई। वत्सना के साथ फिर शुरू हुआ बेटे और बहू की प्रताड़ना का सिलसिला। इन सबसे ...
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कमला गिरि - दुख ही जीवन की कथा रही कमला ने भी यही कही

6 सप्ताह पहले
निपति होने के बावजूद भी एक बेवा कि तरह जीवन जीना पड़े तो इससे बड़ा कष्ट किसी महिला के लिए कुछ भी नहीं हो सकता है। यह कहानी है वृंदावन के शारदा आश्रम में रहने वाली कमला गिरि की। कमला का जीवन दूसरी महिलाओं से अलग इस मायने में है कि एक तरफ पति ने उन्हें छोड़ दिया तो दूसरी तरफ बेटे-बहू ने भी मुंह मोड़ लिया। कमला को आजतक समझ नहीं आया कि आखिर उनकी गलती क्या है? किस बात की सजा उन्हें मिल रही है? हालांकि अपने दुखों से अकेले जूझती कमला किसी तरह अपना जीवन जी रही हैं, लेकिन उन्हें बार बार परिवार के दूसरे सदस्यों से मिलने वाले उलाहनों ने काफी तोड़ दिया। एक तरफ पति के छोड़ने का गम तो दूसरी तरफ बेटे-बहू की नफरत से दुखी होकर कमला ने अके...
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कान्हा की भक्ति में डूबी सबिता आई वृंदावन

9 सप्ताह पहले
  सबिता रॉय चौधरी एक पारदर्शी व्यक्तित्व की महिला हैं। उनके अंदर और बाहर की सभी भावनाएं एक जैसी ही दिखती हैं, जिसे वह छिपा नहीं पाती हैं। सबिता अपने दुखों से लड़ने के लिए भक्ति-भाव को अपना लिया और मंदिरों में भजन गाने लगीं। सबिता की जब शादी हुई तब वह महज 16 या 17 वर्ष की ही थी। काफी समय बीत जाने की वजह से उन्हें इस बारे में सारी बातें ठीक से याद नहीं हैं।  वह बताती हैं कि शादी के बाद उस तीन बच्चे हुए, वह पांच लोग कोलकाता में किराए के एक घर में रहते थे। उनका वैवाहिक जीवन खुशी-खुशी चल रहा था लेकिन ये खुशियां ज्यादा समय तक नहीं रह पाईं और उनके पति बीमार रहने लगे। पति की बीमारी की वजह से घर में सभी दुखी रह...
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कमल सक्सेना - एक जेंटलमैन अधिकारी

11 सप्ताह पहले
जब आपने पहली बार नौकरी ज्वाइन की तो आपका लक्ष्य क्या था?  मैं लोगों तक पहुंचना चाहता हूं। कई तरह के लोग हैं, जो जीवन में विभिन्न प्रकार की चीजों को प्राप्त करना चाहते हैं। मैंने गांव स्तर के सामान्य स्कूलों में तीव्र बुद्धि वाले बच्चों और एक उच्च प्रतिष्ठित विद्यालय में बहुत साधारण बच्चों को देखा है। कभी-कभी तीक्षण बुद्धि वास्तव में तीव्रबुद्धि नहीं, बल्कि अवसरों के बारे में होती है। मैंने इसे महसूस किया और सही तरह के लोगों को अवसर प्रदान करने की कोशिश की। मैंने बहुत ईमानदारी से कोशिश की और मुझे आशा है कि मैंने सकारात्मक रूप से समाज के विकास की दिशा में योगदान दिया है।
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समाज के व्यवहार ने किया दुखी- करुणा मंडल

11 सप्ताह पहले
किसी भी व्यक्ति के जीवन में आई विपत्ति उतना कष्ट नहीं देती, जितना परिवार के लोगों की प्रताड़ना से होता है। भारतीय समाज में पहले से ही विधवाओं को समाज से अलग माना जाता रहा है। यदि किसी महिला के पति की मौत हो जाए तो उसमें उस महिला या लड़की का क्या दोष, लेकिन हमारे समाज में हमेशा से ही उन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद की रहने वाली करुणा मंडल के जीवन में कोई भी ऐसा नहीं है जो उन्हें सहारा दे सके। इसीलिए वह ठाकुर जी की शरण में आ गई। करुणा बताती हैं कि उनके समय में कम उम्र में विधवा हुई महिलाओं को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। जिस रास्ते से वे जाती है उस रास्ते में कोई नहीं आता और किसी भी धार...
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मुस्कुराहट के पीछे दुखों का पहाड़

12 सप्ताह पहले
अशोका का मतलब जिसे कोई शोक न हो,कोई दु:ख न हो। अशोका रानी मुंडो ने अपने नाम को पूरी तरह सार्थक किया है। अशोका एक ऐसा व्यक्तित्व है, जो बड़ी खूबसूरती से मुस्कुराते हुए अपने दर्द को छुपा लेती हैं, जिसे पहली मुलाकात में जानना समझना काफी कठिन है। इस समय अशोका रानी वृंदावन में सुलभ की सहायता वाले विधवा आश्रम में रहती हैं। कोलकाता की रहने वाली अशोका रानी मुंडो का जीवनकाल बादलों में कैद बिजली की तरह है। हालांकि उनसे बातचीत के बाद भी उनके व्यक्तित्व का दुखों से भरा पक्ष बाहर नहीं आ पाया। अशोका रानी की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी और शादी के कुछ समय बाद ही उनको एक बेटा हुआ। जब वह मात्र ढाई साल का था तभी अशोका के पति की मृत्यु ...
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‘ठाकुर जी मेरे बच्चों को ये दिन न दिखाएं’

13 सप्ताह पहले
अपने बच्चों की खुशी और उनकी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए एक मां अपने सभी सपने और खुशियों को त्याग देती है। पर वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो उस मां की कद्र करना भूल जाते हैं। यहां तक कि मां की वृद्धावस्था में उनकी सेवा करने के बजाए उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसी ही दर्द भरी कहानी है शांति देवी की, जो वृंदावन के एक वृद्धा आश्रम में रह रहीं हैं। दोनों पैर नाकाम शांति के दोनों पैर लकवाग्रस्त हैं। वह न तो चल सकती हैं और न ही खुद से अपने नित्य कर्म ही कर सकती हैं। ऐसे में उनकी देखभाल आश्रम के कर्मचारियों द्वार...
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उत्तरदायित्वों को समझने से बदलेगा समाज -ऊषा ठाकुर

22 सप्ताह पहले
आप महिलाओं को स्वावलंबी बनाने और समाज को बदलने के क्षेत्र में कब से कार्य कर रही हैं? मुझे याद ही नहीं है कि हमने यह कार्य कब शुरु किया था, हां मैं यहां 25 साल पहले आई थी, तब यहां असामजिक तत्व खुलेआम घूमा करते थे, जिनपर कोई कार्रवाई नहीं होती थी। ये गुंडे गरीब महिलाओं और बच्चियों के साथ छेड़छाड़ और कुकर्म करते थे और कोई भी इनके खिलाफ आवाज नहीं उठाता था। इन सब बातों से मैं काफी द्रवित हुई और इन दरिंदों को सबक सिखाने और महिलाओं को जागरुक करने का बीड़ा उठाया। पर्यावरण के क्षेत्र में भी आपने उत्कृष्ट कार्य किया है, जिसके लिए हा...
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डॉ. विन्देश्वर पाठक - बापू की प्रेरणा से बने ‘टॉयलेट मैन’

31 सप्ताह पहले
विकास की तेजी के बीच स्वच्छता का मुद्दा भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में थोड़ा पीछे छूटा। अफ्रीका और एशिया के कई विकासशील देशों में तो स्वच्छता को नजरअंदाज करने का आलम यह रहा है कि वहां कुछ समुदाय के लोगों की स्थिति अत्यंत नारकीय हो गई। इसी स्थिति को देखते हुए स्वच्छता को सीधे-सीधे मानवाधिकार मानने की वकालत आज संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पर की जा रही है। बात करें भारत की तो स्वच्छता यहां राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से अहम मुद्दा रहा। खासतौर पर महात्मा गांधी कांग्रेसजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्ध होने की सीख देते थे।  आजादी के बाद विकास के जोर के बीच स्वच्छता का मुद्दा जरूर थोड़ा कमजोर पड़ा...
Anuradha-Paudwal-Interview-to-Swachh-Bharat-Campaign

‘स्वच्छता अभियान के लिए दिल से प्रार्थना है’ - अनुराधा पौडवाल

56 सप्ताह पहले
मोदी जी के स्वच्छता अभियान के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? स्वच्छता अभियान बहुत जरूरी है। इसके लिए मैं दिल से भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मोदी जी को इसमें बहुत सफलता मिले। मैने देखा है कि लोग इंडिया में सड़क पर कहीं भी थूकते और कचरा फैलाते हैं। क्या उन्हें विदेशों में थूक नहीं आती। वह लोग यह सोचते हैं कि इंडिया अपना घर है यहां सब चलता है। ये नहीं सोचते कि हमें अपने घर को स्वच्छ रखना चाहिए। 45 सालों के करियर के बाद आपको पद्मश्री मिला तो क्या आपको लगता है कि बहुत देर हुई? ईमानदारी से बताऊं तो 10-15 साल पहले म...


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