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बुधवार, 13 दिसंबर 2017

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डॉ. विन्देश्वर पाठक - बापू की प्रेरणा से बने ‘टॉयलेट मैन’

4 सप्ताह पहले
विकास की तेजी के बीच स्वच्छता का मुद्दा भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में थोड़ा पीछे छूटा। अफ्रीका और एशिया के कई विकासशील देशों में तो स्वच्छता को नजरअंदाज करने का आलम यह रहा है कि वहां कुछ समुदाय के लोगों की स्थिति अत्यंत नारकीय हो गई। इसी स्थिति को देखते हुए स्वच्छता को सीधे-सीधे मानवाधिकार मानने की वकालत आज संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पर की जा रही है। बात करें भारत की तो स्वच्छता यहां राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से अहम मुद्दा रहा। खासतौर पर महात्मा गांधी कांग्रेसजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्ध होने की सीख देते थे।  आजादी के बाद विकास के जोर के बीच स्वच्छता का मुद्दा जरूर थोड़ा कमजोर पड़ा...
Anuradha-Paudwal-Interview-to-Swachh-Bharat-Campaign

‘स्वच्छता अभियान के लिए दिल से प्रार्थना है’ - अनुराधा पौडवाल

29 सप्ताह पहले
मोदी जी के स्वच्छता अभियान के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? स्वच्छता अभियान बहुत जरूरी है। इसके लिए मैं दिल से भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मोदी जी को इसमें बहुत सफलता मिले। मैने देखा है कि लोग इंडिया में सड़क पर कहीं भी थूकते और कचरा फैलाते हैं। क्या उन्हें विदेशों में थूक नहीं आती। वह लोग यह सोचते हैं कि इंडिया अपना घर है यहां सब चलता है। ये नहीं सोचते कि हमें अपने घर को स्वच्छ रखना चाहिए। 45 सालों के करियर के बाद आपको पद्मश्री मिला तो क्या आपको लगता है कि बहुत देर हुई? ईमानदारी से बताऊं तो 10-15 साल पहले म...
DG-OP-Singh-says-CISF-is-Future-Force

डीजी ओपी सिंह - भविष्य का बल है सीआईएसएफ

30 सप्ताह पहले
सीआईएसएफ अर्द्ध सैनिक बल है, पर यह सीमा पर नहीं है। यह उस वक्त सुर्खियों में आया जब कंधार विमान अपहरण मामला सामने आया। आप एनडीआरएफ में भी थे और अभी सीआईएसएफ में हैं। इस तरह आप सीआईएसएफ में क्या खास देखते हैं? देखिए, जितने भी अर्द्ध सैनिक बल हैं, वे सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज हैं। वो चाहे सीआरपीएफ हो, बीएसफ हो, आईटीबीपी हो, सभी का एक ही काम है, एक जैसा चरित्र है। सबसे पुराना इसमें सीआरपीएफ है, जिसका जन्म 1939 में हुआ। जब किसी राज्य में आंतरिक सुरक्षा का संकट या विरोध की स्थिति आ जाए, तो उससे निपटने के लिए सीआरपीएफ का गठन किया गया। इसी तरह दूसरे अर्द्ध सैनिक बलों का भी निर्माण हुआ। अलबत्ता, सीआईएसएफ को एक...
Gender-Knowledge-is-Essential-for-boys-says-Mona-and-Purvi

मोना और पूर्वी - ‘लड़कों के लिए जरूरी है जेंडर ज्ञान’

31 सप्ताह पहले
दूरगामी परिणाम की यदि बात करें तो साहस की भूमिका को आप कैसे देखती हैं? अगर लंबे समय की बात करें तो हम ‌जेंडर शिक्षा को स्कूल के पाठ्यक्रम के अभिन्न हिस्से के रूप में देखते हैं। इक्कीसवीं सदी में भी यह मुद्दा गंभीरता से नहीं लिया जाता है। मैं जब दसवीं में थी तो हमारी टीचर ही सेक्सुअल रिपरोडक्‍शन वाला पाठ बीच में ही छोड़ देती थीं,क्योंकि वे इसे पढ़ाते वक्त असहज हो जाती थीं। अगर ‘साहस’ जेंडर एजुकेशन से जुड़ी इस असहजता को हटा दे तो हमें लगेगा कि हमारा काम हो गया।  क्या आपको लगता है कि आपकी वर्कशॉप से कोई म...
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नशे से मुक्ति का सफर

36 सप्ताह पहले
यह कथा है देश की एक ऐसी दलित बेटी की जिसने आजादी के 68 वर्षों के बाद भी देश के भीतर गुलाम बनकर नारकीय जीवन जी रहे डेढ़ दर्जन से अधिक गांवों के हजारों वनवासियों को जीने का अधिकार दिलवाकर एक नया जीवन तो दिया ही, साथ ही नशाखोरी के प्रति बड़ा अभियान चलाकर हजारों लोगों को शराब के नशे से दूर कर दिया। फर्क सिर्फ इतना था कि 1947 के पहले हम अंग्रेजों और मुगल शासकों के गुलाम थे और ये ग्रामीण आजाद देश के भीतर अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाए गए वन प्रबंधन नियमों के तहत गुलाम थे। इन्हीं गुलाम महिलाओं में एक वो भी थी, जिसका नाम भानुमती है। 38 वर्ष पूर्व मऊ जिले से ब्याह कर भानुमती सिर्फ इसीलिए लाई गई थी कि वह अपने पति और ससुराल वालों के साथ गुलामी की बेगारी प्रथा के कामों में हाथ बंटाए। शादी के...
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प्रिया हिंगोरानी - महिलाएं आत्मनिर्भर बनें, अपने दम पर जिएं

39 सप्ताह पहले
पिछले 26-27 सालों से आप इस प्रोफेशन में हैं, पुरुषों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में बतौर महिला आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?इसमें कोई शक नहीं हमेशा से यह 'मैन डोमिनेडेट फील्ड रहा है।मैंने वर्ष 1990 में जब ज्वॉइन किया था, तो खुद को साबित करने के लिए हम लोगों को डबल मेहनत करनी पड़ी। तब तो कोई लेडी लॉ ऑफिसर भी नहीं थी, जज भी&...
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अंशु गुप्ता- आत्मसम्मान का खास ध्यान

41 सप्ताह पहले
गूंज’ को कई मायनों में सिर्फ  कपड़े इक्कठा कर जरूरतमंदों तक पहुंचाने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, जबकि इसका काम बहुत ही व्यापक है। हमारा काम शहरों और गांवों में बंटा हुआ है। शहर के लोग अपने घरों से कपड़ों समेत कई उपयोग में न आने वाले सामान को 'गूंज’  में देकर जाते हैं। फिर यह 'गूंज’ की जिम्मेदारी होती है कि उसे अच्छी तरह प्रयोग में लाने और पहनने लायक बनाया जाए।  बेशक कपड़ों को आमतौर पर झुग्गियों आदि में दान के रूप में दे दिया जाता है, लेकिन 'गूंज’ का यह मानना है कि प्राप्तकर्ता का आत्म सम्मान भी बरकरार रहना चाहिए। और देखा गया है कि कई गांव वालों में इतनी गैरत होती...
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आत्मसम्मान का खास ध्यान

41 सप्ताह पहले
'गूंज’ को कई मायनों में सिर्फ  कपड़े इक्कठा कर जरूरतमंदों तक पहुंचाने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, जबकि इसका काम बहुत ही व्यापक है। हमारा काम शहरों और गांवों में बंटा हुआ है। शहर के लोग अपने घरों से कपड़ों समेत कई उपयोग में न आने वाले सामान को 'गूंज’  में देकर जाते हैं। फिर यह 'गूंज’ की जिम्मेदारी होती है कि उसे अच्छी तरह प्रयोग में लाने और पहनने लायक बनाया जाए। बेशक कपड़ों को आमतौर पर झुग्गियों आदि में दान के रूप में दे दिया जाता है, लेकिन 'गूंज’ का यह मानना है कि प्राप्तकर्ता का आत्म सम्मान भी बरकरार रहना चाहिए। और देखा गया है कि कई गांव वालों में इतनी गैरत होती ...
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नवाजुद्दीन सिद्दिकी - गरीबों के नवाज

42 सप्ताह पहले
ओम जी जैसी हालत न हो जाए जी हां, यह है अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकी। हाल में हुई मुलाकात के दौरान उनकी यह दो टूक बातें सुनने को मिली। इन दिनों बीच-बीच में हताशा उन्हें घेरने लगती है। करिअर को लेकर भी कई सवाल उनके मन को परेशान करते हैं। कभी उन्हें ऐसा लगता है कि बॉलीवुड के मौजूदा दौर में वे अनफिट हैं। अपनी इसी मनोदशा के साथ वह वर्सोवा के अपने घर में बड़ी मुश्किल से पकड़ में आए। शाम होने को है। वह सारी रात होने वाली शूटिंग में जाने की तैयारी कर रहे हैं। काफी दिनों से वह अच्छी तरह से सो नहीं पाए थे। चिंता काम की नहीं, इस बात की है कि उनके प्रिय अभिनेता ओम पुरी अब...
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परिणति चोपड़ा - 'मनीष को मैं किसी भी वक्त डिस्टर्ब कर सकती हूं’

44 सप्ताह पहले
क्या वजह है कि हर बार मनीष शर्मा ही आपके तारणहार बनते हैं? इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनीष हमेशा मेरे लिए मददगार रहे हैं। वरना मैं यशराज में मीडिया मैनेजर की नौकरी कर रही होती। मनीष वह पहले शख्स थे,जिन्होंने अपनी फिल्म में मुझे लेने का मन बनाया था। उसके बाद भी वह बराबर मेरी मदद कर रहे हैं। अब मेरी नई फिल्म 'मेरी प्यारी बिंदु’ के वह निर्माता हैं। लेकिन आपकी इस नई फिल्म के वह सिर्फ  निर्माता है?
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अक्षय कुमार - खिलाड़ी कुमार अब होंगे संजीदा

46 सप्ताह पहले
'टॉयलेट-एक प्रेम’ क्या है यह फिल्म? आप इसके टाइटल में मत जाइए। असल में यह एक टोटल कॉमेडी फिल्म है। बस, इसकी कहानी स्वच्छता के साथ जुड़ी हुई है। फिल्म का हीरो एक टॉयलेट का मालिक है और हीरोइन एक झुग्गी-झोपड़ी की लड़की है। दोनों प्यार में पड़ते है और शादी कर लेते है। फिर दोनों एक मकसद के तहत टॉयलेट बनाने में जुट जाते है। उनके इस अभियान में उन्हें जो दिक्कतें आती है, उसमें कॉमेडी का स्टायर भरपूर है। क्या आप इसे प्रचार फिल्म मानते हैं ?
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तारा पाटकर - संस्थापक, रोटी बैंक

47 सप्ताह पहले
भुखमरी के लिए दुनियाभर में बदनाम बुंदेलखंड, 'रोटी बैक’ के जरिए न केवल लोगों की भूख मिटा रहा है, बल्कि हजारों लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी बन गया है। दस साथियों के साथ मिलकर इस अनोखे रोटी बैंक की शुरुआत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता तारा पाटकर से सुलभ स्वच्छ भारत के प्रसन्न प्रांजल की बातचीत   कैसे आया आइडिया? मैंने 20 साल से ज्यादा समय तक पत्रकारिता की है। अक्सर मैं फ...


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