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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

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देवी - खुशियों से भागने का क्या मतलब...

15 सप्ताह पहले
‘ना, मैं वापस क्यों जाना चाहूंगी, जब सबकुछ यहां अच्छा चल रहा है, जब मैं यहां खुश हूं..... ’ हां, वह सच में बहुत खुश है। यह साफ देखा जा सकता है, वह जिस तरह उत्साह से बातें करती है, उनकी आंखों में जिस तरह की चमक दिखती है, जिस तरह वह वृंदावन की माटी में खुशियों की बात करती है, जिस तरह वह टूटी-फूटी हिंदी में बात करने की कोशिश करती है, इन सबसे पता चलता है कि वह बहुत खुश है। वृंदावन में देवी को लगभग एक दशक हो चुका है। वह पश्चिमी बंगाल के नादिया जिले के रानाघाट की रहने वाली हैं। उनकी कहानी, अन्य विधवा माताओं से कुछ खास अलग नहीं है। लेकिन, उनकी जीवन के प्रति आशावादी सोच जरूर बाकी सबसे अलग है। देवी सिर्फ 7 साल क...
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प्रोमिला विस्वास - आपका दिल सच्चा हो, फिर भगवान आपके साथ होंगे

17 सप्ताह पहले
‘प्यारे दरसन दीज्यो आय तुम बिन रह्यो न जाय, जल बिन कमल चंद बिन रजनी ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी, आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन बिरह कालजो खाय, दिवस न भूख नींद नहिं रैना मुख सूं कथत न आवे बैना।’  ओडिशा की रहने वाली, प्रोमिला विस्वास कान्हा की नगरी वृंदावन की सड़कों पर घूमती हैं और अगरबत्ती बनाने से उन्हें खास लगाव है। वह बेहद उत्साह के साथ बताती हैं, “मेरी आंखें थोड़ी कमजोर हो गई हैं, इसीलिए अब ज्यादा सिलाई नहीं कर पाती हूं, लेकिन अगरबत्ती बनाना मुझे बहुत पसंद है। इसके आलावा, मैं भगवद गीता पढ़ती हूं, माला जपती हूं, प्रभु का भजन करती हूं.....
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दुर्गा दत्त - दुखों से लड़ना है, तो भक्तिभाव चाहिए

18 सप्ताह पहले
शायर और कवि अक्सर लोगों की जिंदगी का दर्द शब्दों में उतार देते हैं। मकबूल शायर शकील बदायूंनी का एक मशहूर शेर है- अब तो खुशी का गम है न गम की खुशी मुझे, बे-हिस बना चुकी है बहुत जिंदगी मुझे। शकील बदायूंनी का ये शेर, शायद पश्चिमी बंगाल की राजधानी कोलकाता की रहने वाली दुर्गा दत्त के लिए ही लिखा गया था। उनकी भी जिंदगी दर्द के इसी समंदर में डूबी रही। लेकिन दुर्गा दत्त की जिंदगी हमेशा से ऐसी नहीं थी। कम उम्र में शादी होने के बाद दुर्गा दत्त एक खूबसूरत जिंदगी के ख्वाब संजो रही थीं। नाजुक उम्र के मोड़ पर, उसे परिपक्व होने के लिए वक्त चाहिए था। अगर रिवाजों की आंधियां हर समय में रही, तो हसीन और खुशनुमा ख्वाब देखने  की आजा...
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कोल्लानी - खुद की तलाश पूरी हुई...

19 सप्ताह पहले
मशहूर शायर राना अकबराबादी ने कुछ लोगों का दर्द यूं बयां किया है, ‘दुनिया भी मिली है गम-ए-दुनिया भी मिला है, वो क्यूं नहीं मिलता जिसे मांगा था खुदा से।’ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की रहने वाली कोल्लानी पाल की खूबसूरत जिंदगी में भी किस्मत ने कुछ ऐसे ही खेल खेले कि उन्हें सबकुछ मिलते हुए भी कुछ न मिला और उनकी जिंदगी दोराहे पर खड़ी हो गई, जहां से एक रास्ता सिर्फ विरह और वेदना का था तो दूसरा कान्हा की नगरी वृंदावन में ले जाकर संतुष्टि का भाव स्फुटित करता था। और कोल्लानी ने दूसरा रास्ता चुना। नाजुक उम्र में शादी के पवित्र बंधन में बंधी, कोल्लानी जिस बेहतर और खूबसूरत जिंदगी के ख्वाब संजोती थीं, वह उसके कदमों में थी। ...
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मिशन बने गंगा को बचाने का विजन

20 सप्ताह पहले
स्वामी अवधेशानंद गिरि से बात करना जहां एक तरफ ज्ञान की अतल गहराइयों में उतरने का सहज अनुभव है, वहीं उनसे बात करते हुए हम स्वयं को, अपने समय की चिंताओं और चुनौतियों के बारे में आंतरिक रूप से जागरुक होते हैं। मसलन, पर्यावरण को लेकर स्वामी जी समझाते हुए कहते हैं, ‘पर्यावरण का अर्थ है, जिससे जैव संतुलन रहता है। जैव जगत में जो कुछ भी है, धरती, अंबर, जल, अग्नि, वायु, नक्षत्र, विविध प्राणी... इन सबका संबंध पर्यावरण से है। आज ग्लोबल वार्मिंग, उच्च तापमान के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जिस तरह से हरीतिमा का हनन हुआ है, न केवल वन, अपितु वन्य संपदा भी जिस तरह से छीन ली गई है। जिस ढंग से सलिलाओं का सातत्य, नदियों का प्रवाह बाधित हुआ ह...
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पारुलबाला घोष - वृंदावन ने समझाया जीवन का मर्म

20 सप्ताह पहले
दुष्यंत कुमार ने कभी लिखा था, ‘दुःख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें, सुख तो किसी कपूर की टिकिया सा उड़ गया।’ पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की रहने वाली पारुलबाला घोष की कहानी कुछ ऐसी ही है। उनकी जिंदगी में दुख ने कुछ इस तरह जगह बनाई कि जैसे उनकी नसों में खून नहीं, दुख बहता हो। लेकिन कान्हा और राधा की नगरी न सिर्फ उनके दुखों को भर रही है, बल्कि उन्हें सच्चे जीवन का मर्म भी समझा रही है। पारुल 16 साल की थीं, जब उनकी शादी 20 साल की उम्र के एक व्यक्ति से हो गई। उसका पति एक कारखाने में काम करता था। उसकी आमदनी बहुत ज्यादा तो नहीं थी, लेकिन खुशहाल जीवन की नाव, इस सांसारिक सागर में आसानी से तैर सके, इतनी जरुर थी। दोनों ...
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मेनुका - हर खालीपन को भर देता है वृंदावन

21 सप्ताह पहले
एक विधवा जीवन की शून्यता, ऐसा खालीपन है जिसे भरा जाना नामामुकिन सा लगता है। और जब इस शून्यता में, समाज की बंदिशें जुड़ जाती हैं, तो उसकी वेदना असहनीय हो जाती है। कुछ ऐसी ही कहानी है, पश्चिमी बंगाल के सिलीगुड़ी की रहने वाली मेनुका पाल की। 10 साल की उम्र में मेनुका की शादी 18 साल के आदमी से कर दी गई थी। उस वक्त शादियां कम उम्र में ही हो जाया करती थीं, शायद यही समाज का रिवाज था। इस रिवाज को मेनुका ने भी निभाया और उस उम्र में, जब उसे शादी के मायने भी नहीं पता थे, वह अपने पति के साथ रहने उसके घर चली गई। किसी नए सामान्य जोड़े की तरह, उन दोनों ने भी जिंदगी के ढेरों सपने सजाए और अपनी खूबसूरत कहानी लिखने की कोशिशें शुरू की। उ...
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रीना गुप्ता - वृंदावन वैधव्य के जीवन में भी रंग भर देता है

22 सप्ताह पहले
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली रीना गुप्ता ने अपनी जिंदगी में उस दर्द को महसूस किया है, जिसको अब इतिहास में पढ़ाया जाता है। उन्होंने क्षोभ, निराशा और उजाड़पन के उस दौर को देखा, जिसने उन्हें सोचने को मजबूर और मन को हमेशा के लिए अशांत कर दिया। लेकिन जिंदगी के एक मोड़ पर अचानक उनका आना, उन कुंज गलियों की तरफ हुआ जहां कभी अपनी गोपियों से घिरे भगवान कृष्ण बांसुरी बजाया करते थे। और इन्हीं गलियों ने रीना के अशांत मन को संतुष्टि और शांति दी। रीना 12 साल की थीं, जब उनकी शादी बांग्लादेश (उस वक्त पूर्वी पकिस्तान) के 20 साल के एक व्यक्ति से कर दी गई। वह अपने पति के साथ बांग्लादेश के खुलना शहर में स्थित प्रसिद्ध मोंगला पोर्ट के पास ...
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त्रिलोका - वृंदावन में मिला जीवन का नया उद्देश्य

23 सप्ताह पहले
करीब डेढ़ साल पहले त्रिलोका पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से वृंदावन आई थीं। वैधव्य जीवन के अभिशाप के 16 साल बाद उसका जीवन बदला और उसने तमाम रूढ़िवादी परंपराओं और कुरीतियों को पीछे छोड़ते हुए जीवन के नए लक्ष्य निर्धरित किए।  त्रिलोका सिर्फ 12 साल की थी जब उसका विवाह एक 25 साल के व्यक्ति से कर दिया गया था। इस जोड़ी के बीच उम्र का अंतर आज भले ही बहुत बड़ा लगता हो, लेकिन उन दिनों इसे सामान्य माना जाता था और ऐसे ही विवाह होते थे।  वह इतनी कम उम्र में शादी करने वाली समाज की कोई पहली लड़की नहीं थीं और न ही उसका पति अपने से आधी उम्र की लड़की से शादी करने वाला कोई पहला व्यक्ति था। सामाजिक रूप से यह सब बहुत सामान्य था...
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पुष्पा दासी - संतुष्टि की मुस्कान

24 सप्ताह पहले
पश्चिम बंगाल के जिले पश्चिम मेदिनीपुर की रहने वाली पुष्पा दासी, 4 साल पहले हमेशा के लिए वृंदावन आ गई। ऐसा नहीं था कि उन्हें अपने बेटे या उसकी पत्नी से कोई शिकायत थी। हां, कुछ मतभेद जरूर थे, जैसे कि हर घर में होते हैं, लेकिन वे इतने भी बड़े नहीं थे कि कोई बड़ा और कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूर हो जाए। पुष्पा दासी को घर छोड़ने के लिए किस चीज ने मजबूर किया, यह उन्हें तब तक नहीं पता चला जबतक उन्होंने घर छोड़ नहीं दिया। पुष्पा दासी तब 11 साल की छोटी लड़की थी, जब उनकी शादी 22 साल के लड़के से हुई। उसका परिवार बहुत गरीब था। उसका पति एक भिखारी था। इसीलिए आर्थिक स्थिति हमेशा खराब रही। ऊपर से, समय के साथ उसने चार बेटियों और दो बेटों को ज...
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तोरुलता - बच्चों ने किया बेबस

25 सप्ताह पहले
उसकी उम्र14 वर्ष थी और वह 50 वर्ष का था। उसका, उस ढलती उम्र के व्यक्ति से विवाह हो गया। उसको शायद उस वक्त पता था कि ऐसा हो सकता है और ऐसा हुआ भी। वह जल्द ही विधवा हो गई। पश्चिमी बंगाल के बालुरघाट की तोरुलता लंबे समय से विधवा हैं। उनके उम्रदराज पति को समय के साथ सांस की बीमारी ने घेर लिया और फिर उनकी मौत हो गई। उनके एक बेटी थी और दो बेटे थे। उनके तीनों बच्चों की शादी पिता के मरने से पहले ही हो गई थी। तोरुलता कहती हैं कि यद्दपि उनके पति की मृत्यु हो गई थी, लेकिन वह अपनी सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभा चुके थे और इसीलिए उसके ऊपर अब कोई भार नहीं था।” वह बताती हैं, "मुझे हम दोनों की उम्र के बड़े अं...
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प्रतिभा रॉय - वृंदावन ने उसके घाव भरे

26 सप्ताह पहले
‘मैं एक विधवा नहीं हूं, पर मैं कभी एक पत्नी भी नहीं थी। यह सब झूठ था। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी मानसिक रूप से बीमार थी, इसीलिए उन्हें और उनके बच्चों को मेरी आवश्यकता थी। यह सब झूठ था। वे चाहते थे कि उन्हें पूरी तरह से एक पूर्णकालिक नौकरानी मिले। मैं वास्तव में कभी नहीं चाहती थी, बस जरुरत थी। यह सब झूठ था ... और फिर उसने बोलना बंद कर दिया और कहा कि अब इस पर बातचीत करने का कोई मतलब है।’ यह कहानी है, पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले स्थित बलरामपुर की प्रतिभा रॉय की, जिन्होंने वर्ष 2003 से वृंदावन आने-जाने का सिलसिला शुरू किया। प्रतिभा का विवाह 15 साल की उम्र में उनसे दुगनी उम्र के एक व्यक्ति (32) के...


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