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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

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कान्हा की भक्ति में डूबी सबिता आई वृंदावन

एक सप्ताह पहले
  सबिता रॉय चौधरी एक पारदर्शी व्यक्तित्व की महिला हैं। उनके अंदर और बाहर की सभी भावनाएं एक जैसी ही दिखती हैं, जिसे वह छिपा नहीं पाती हैं। सबिता अपने दुखों से लड़ने के लिए भक्ति-भाव को अपना लिया और मंदिरों में भजन गाने लगीं। सबिता की जब शादी हुई तब वह महज 16 या 17 वर्ष की ही थी। काफी समय बीत जाने की वजह से उन्हें इस बारे में सारी बातें ठीक से याद नहीं हैं।  वह बताती हैं कि शादी के बाद उस तीन बच्चे हुए, वह पांच लोग कोलकाता में किराए के एक घर में रहते थे। उनका वैवाहिक जीवन खुशी-खुशी चल रहा था लेकिन ये खुशियां ज्यादा समय तक नहीं रह पाईं और उनके पति बीमार रहने लगे। पति की बीमारी की वजह से घर में सभी दुखी रह...
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कमल सक्सेना - एक जेंटलमैन अधिकारी

3 सप्ताह पहले
जब आपने पहली बार नौकरी ज्वाइन की तो आपका लक्ष्य क्या था?  मैं लोगों तक पहुंचना चाहता हूं। कई तरह के लोग हैं, जो जीवन में विभिन्न प्रकार की चीजों को प्राप्त करना चाहते हैं। मैंने गांव स्तर के सामान्य स्कूलों में तीव्र बुद्धि वाले बच्चों और एक उच्च प्रतिष्ठित विद्यालय में बहुत साधारण बच्चों को देखा है। कभी-कभी तीक्षण बुद्धि वास्तव में तीव्रबुद्धि नहीं, बल्कि अवसरों के बारे में होती है। मैंने इसे महसूस किया और सही तरह के लोगों को अवसर प्रदान करने की कोशिश की। मैंने बहुत ईमानदारी से कोशिश की और मुझे आशा है कि मैंने सकारात्मक रूप से समाज के विकास की दिशा में योगदान दिया है।
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समाज के व्यवहार ने किया दुखी- करुणा मंडल

3 सप्ताह पहले
किसी भी व्यक्ति के जीवन में आई विपत्ति उतना कष्ट नहीं देती, जितना परिवार के लोगों की प्रताड़ना से होता है। भारतीय समाज में पहले से ही विधवाओं को समाज से अलग माना जाता रहा है। यदि किसी महिला के पति की मौत हो जाए तो उसमें उस महिला या लड़की का क्या दोष, लेकिन हमारे समाज में हमेशा से ही उन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद की रहने वाली करुणा मंडल के जीवन में कोई भी ऐसा नहीं है जो उन्हें सहारा दे सके। इसीलिए वह ठाकुर जी की शरण में आ गई। करुणा बताती हैं कि उनके समय में कम उम्र में विधवा हुई महिलाओं को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। जिस रास्ते से वे जाती है उस रास्ते में कोई नहीं आता और किसी भी धार...
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मुस्कुराहट के पीछे दुखों का पहाड़

4 सप्ताह पहले
अशोका का मतलब जिसे कोई शोक न हो,कोई दु:ख न हो। अशोका रानी मुंडो ने अपने नाम को पूरी तरह सार्थक किया है। अशोका एक ऐसा व्यक्तित्व है, जो बड़ी खूबसूरती से मुस्कुराते हुए अपने दर्द को छुपा लेती हैं, जिसे पहली मुलाकात में जानना समझना काफी कठिन है। इस समय अशोका रानी वृंदावन में सुलभ की सहायता वाले विधवा आश्रम में रहती हैं। कोलकाता की रहने वाली अशोका रानी मुंडो का जीवनकाल बादलों में कैद बिजली की तरह है। हालांकि उनसे बातचीत के बाद भी उनके व्यक्तित्व का दुखों से भरा पक्ष बाहर नहीं आ पाया। अशोका रानी की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी और शादी के कुछ समय बाद ही उनको एक बेटा हुआ। जब वह मात्र ढाई साल का था तभी अशोका के पति की मृत्यु ...
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‘ठाकुर जी मेरे बच्चों को ये दिन न दिखाएं’

5 सप्ताह पहले
अपने बच्चों की खुशी और उनकी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए एक मां अपने सभी सपने और खुशियों को त्याग देती है। पर वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो उस मां की कद्र करना भूल जाते हैं। यहां तक कि मां की वृद्धावस्था में उनकी सेवा करने के बजाए उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसी ही दर्द भरी कहानी है शांति देवी की, जो वृंदावन के एक वृद्धा आश्रम में रह रहीं हैं। दोनों पैर नाकाम शांति के दोनों पैर लकवाग्रस्त हैं। वह न तो चल सकती हैं और न ही खुद से अपने नित्य कर्म ही कर सकती हैं। ऐसे में उनकी देखभाल आश्रम के कर्मचारियों द्वार...
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उत्तरदायित्वों को समझने से बदलेगा समाज -ऊषा ठाकुर

14 सप्ताह पहले
आप महिलाओं को स्वावलंबी बनाने और समाज को बदलने के क्षेत्र में कब से कार्य कर रही हैं? मुझे याद ही नहीं है कि हमने यह कार्य कब शुरु किया था, हां मैं यहां 25 साल पहले आई थी, तब यहां असामजिक तत्व खुलेआम घूमा करते थे, जिनपर कोई कार्रवाई नहीं होती थी। ये गुंडे गरीब महिलाओं और बच्चियों के साथ छेड़छाड़ और कुकर्म करते थे और कोई भी इनके खिलाफ आवाज नहीं उठाता था। इन सब बातों से मैं काफी द्रवित हुई और इन दरिंदों को सबक सिखाने और महिलाओं को जागरुक करने का बीड़ा उठाया। पर्यावरण के क्षेत्र में भी आपने उत्कृष्ट कार्य किया है, जिसके लिए हा...
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डॉ. विन्देश्वर पाठक - बापू की प्रेरणा से बने ‘टॉयलेट मैन’

23 सप्ताह पहले
विकास की तेजी के बीच स्वच्छता का मुद्दा भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में थोड़ा पीछे छूटा। अफ्रीका और एशिया के कई विकासशील देशों में तो स्वच्छता को नजरअंदाज करने का आलम यह रहा है कि वहां कुछ समुदाय के लोगों की स्थिति अत्यंत नारकीय हो गई। इसी स्थिति को देखते हुए स्वच्छता को सीधे-सीधे मानवाधिकार मानने की वकालत आज संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पर की जा रही है। बात करें भारत की तो स्वच्छता यहां राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से अहम मुद्दा रहा। खासतौर पर महात्मा गांधी कांग्रेसजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्ध होने की सीख देते थे।  आजादी के बाद विकास के जोर के बीच स्वच्छता का मुद्दा जरूर थोड़ा कमजोर पड़ा...
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‘स्वच्छता अभियान के लिए दिल से प्रार्थना है’ - अनुराधा पौडवाल

48 सप्ताह पहले
मोदी जी के स्वच्छता अभियान के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? स्वच्छता अभियान बहुत जरूरी है। इसके लिए मैं दिल से भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मोदी जी को इसमें बहुत सफलता मिले। मैने देखा है कि लोग इंडिया में सड़क पर कहीं भी थूकते और कचरा फैलाते हैं। क्या उन्हें विदेशों में थूक नहीं आती। वह लोग यह सोचते हैं कि इंडिया अपना घर है यहां सब चलता है। ये नहीं सोचते कि हमें अपने घर को स्वच्छ रखना चाहिए। 45 सालों के करियर के बाद आपको पद्मश्री मिला तो क्या आपको लगता है कि बहुत देर हुई? ईमानदारी से बताऊं तो 10-15 साल पहले म...
DG-OP-Singh-says-CISF-is-Future-Force

डीजी ओपी सिंह - भविष्य का बल है सीआईएसएफ

49 सप्ताह पहले
सीआईएसएफ अर्द्ध सैनिक बल है, पर यह सीमा पर नहीं है। यह उस वक्त सुर्खियों में आया जब कंधार विमान अपहरण मामला सामने आया। आप एनडीआरएफ में भी थे और अभी सीआईएसएफ में हैं। इस तरह आप सीआईएसएफ में क्या खास देखते हैं? देखिए, जितने भी अर्द्ध सैनिक बल हैं, वे सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज हैं। वो चाहे सीआरपीएफ हो, बीएसफ हो, आईटीबीपी हो, सभी का एक ही काम है, एक जैसा चरित्र है। सबसे पुराना इसमें सीआरपीएफ है, जिसका जन्म 1939 में हुआ। जब किसी राज्य में आंतरिक सुरक्षा का संकट या विरोध की स्थिति आ जाए, तो उससे निपटने के लिए सीआरपीएफ का गठन किया गया। इसी तरह दूसरे अर्द्ध सैनिक बलों का भी निर्माण हुआ। अलबत्ता, सीआईएसएफ को एक...
Gender-Knowledge-is-Essential-for-boys-says-Mona-and-Purvi

मोना और पूर्वी - ‘लड़कों के लिए जरूरी है जेंडर ज्ञान’

50 सप्ताह पहले
दूरगामी परिणाम की यदि बात करें तो साहस की भूमिका को आप कैसे देखती हैं? अगर लंबे समय की बात करें तो हम ‌जेंडर शिक्षा को स्कूल के पाठ्यक्रम के अभिन्न हिस्से के रूप में देखते हैं। इक्कीसवीं सदी में भी यह मुद्दा गंभीरता से नहीं लिया जाता है। मैं जब दसवीं में थी तो हमारी टीचर ही सेक्सुअल रिपरोडक्‍शन वाला पाठ बीच में ही छोड़ देती थीं,क्योंकि वे इसे पढ़ाते वक्त असहज हो जाती थीं। अगर ‘साहस’ जेंडर एजुकेशन से जुड़ी इस असहजता को हटा दे तो हमें लगेगा कि हमारा काम हो गया।  क्या आपको लगता है कि आपकी वर्कशॉप से कोई म...
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नशे से मुक्ति का सफर

55 सप्ताह पहले
यह कथा है देश की एक ऐसी दलित बेटी की जिसने आजादी के 68 वर्षों के बाद भी देश के भीतर गुलाम बनकर नारकीय जीवन जी रहे डेढ़ दर्जन से अधिक गांवों के हजारों वनवासियों को जीने का अधिकार दिलवाकर एक नया जीवन तो दिया ही, साथ ही नशाखोरी के प्रति बड़ा अभियान चलाकर हजारों लोगों को शराब के नशे से दूर कर दिया। फर्क सिर्फ इतना था कि 1947 के पहले हम अंग्रेजों और मुगल शासकों के गुलाम थे और ये ग्रामीण आजाद देश के भीतर अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाए गए वन प्रबंधन नियमों के तहत गुलाम थे। इन्हीं गुलाम महिलाओं में एक वो भी थी, जिसका नाम भानुमती है। 38 वर्ष पूर्व मऊ जिले से ब्याह कर भानुमती सिर्फ इसीलिए लाई गई थी कि वह अपने पति और ससुराल वालों के साथ गुलामी की बेगारी प्रथा के कामों में हाथ बंटाए। शादी के...
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प्रिया हिंगोरानी - महिलाएं आत्मनिर्भर बनें, अपने दम पर जिएं

58 सप्ताह पहले
पिछले 26-27 सालों से आप इस प्रोफेशन में हैं, पुरुषों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में बतौर महिला आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?इसमें कोई शक नहीं हमेशा से यह 'मैन डोमिनेडेट फील्ड रहा है।मैंने वर्ष 1990 में जब ज्वॉइन किया था, तो खुद को साबित करने के लिए हम लोगों को डबल मेहनत करनी पड़ी। तब तो कोई लेडी लॉ ऑफिसर भी नहीं थी, जज भी&...


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