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रविवार, 16 दिसंबर 2018

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किंगकांग को अखाड़े में किया चित

5 दिन पहले
बचपन में हमारे लिए ‘दारा सिंह’ एक विशेषण हुआ करता था। आपसी लड़ाई-झगड़ों में हम अक्सर एक दूसरे से कहते थे, ‘तू बहुत दारा सिंह है क्या?’ या ‘ज्यादा दारा सिंह मत बन।’ उस समय हमें पता ही नहीं था कि दारा सिंह क्या है, कौन है, हमारा बस यही अर्थ होता था कि ज्यादा दादागिरी मत दिखा। बड़े होने पर ‘दारा सिंह’ शब्द की हकीकत पता चली तब समझ आया कि इस नाम को हम विशेषण के रूप में क्यों इस्तेमाल करते थे। समय के साथ दारा सिंह से जुड़े किस्से-कहानियां पढ़-सुनकर हमारे दिलो-दिमाग में उनकी एक विराट छवि बनती चली गई। मुंबई आकर ‘सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन’ (सिन्टा) की सदस्यता ली तो एसोसिएशन की आम...
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ऋत्विक घटक - ‘मेघे ढाका तारा’ बनकर आज भी जीवित

4 सप्ताह पहले
भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने वालों में ऋत्विक घटक का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। फिल्म ‘मेघे ढाका तारा’ के जरिए घटक ने मेलोड्रामा विधा को एक नई ऊंचाई प्रदान की। मेलोड्रामा को तार्किकता से प्रेरित किया लेकिन फिर भी उन्हें वह स्थान नहीं मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था। भारतीय सिने इतिहास में फिल्म ‘मेघे ढाका तारा’ एक विलक्षण स्थान रखती है। निर्देशक ऋत्विक घटक सत्यजीत रे के समकालीन थे। सिर्फ बदकिस्मती ही थी कि वे सत्यजीत के बराबर प्रसिद्ध नहीं हो सके। अन्यथा विधा के स्तर पर ऋत्विक सत्यजीत से कमतर नहीं थे। घटक ने एक गमगीन जिंदगी गुजारी। उनकी अनेक फिल्में लंबे अरसे तक रिलीज नहीं हो सकीं, जबकि कुछ ...
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रीवा आई थी राज कपूर की बारात

9 सप्ताह पहले
राज कपूर के बारे में ये बात कम ही लोग जानते हैं कि वे मध्य प्रदेश के दामाद थे। ग्रेट शोमैन स्वर्गीय राज कपूर की रीवा से भावनात्मक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। राज कपूर का विवाह तत्कालीन रीवा आईजी करतार नाथ मल्होत्रा की बेटी कृष्णा मल्होत्रा के साथ संपन्न हुआ था। रीवा से राज कपूर के रिश्ते की नींव महज 20 साल की उम्र में जुड़ गई थी। रीवा के कलाप्रेमियों को उस दौर के रंगमच से रूबरू कराने के लिए पृथ्वीराज कपूर की नाटक कंपनी इस शहर में पहुंची थी। उनके साथ दोनों बेटे राज कपूर और शम्मी कपूर भी थे। शम्मी उस समय 15 साल के और राज कपूर 20 साल के थे। रंगमंच से मंड...
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रीता भादुड़ी - ‘ये रातें नई पुरानी’

15 सप्ताह पहले
कई बार लोग जीते-जी हमारी स्मृतियों में इस तरह दाखिल हो जाते हैं, जैसे उनका दौर पुराना रहा हो और वो हमें छोड़कर बहुत पहले चले गए हों। ऐसा ही हुआ अभिनेत्री रीता भादुड़ी के साथ। कहने को तो उनका निधन बीते माह ही हुआ पर उनके बारे में लोग या तो सोचना-बात करना बंद कर चुके थे या फिर उनकी याद भूले-भटके ही लोगों को आती थी। उनके करीबी लोगों से संपर्क किया तो पता चला कि उन्हें कई सालों से डायबिटीज थी, जिससे उनकी किडनियां ख़राब हो गई थीं।  रीता जी से मेरी मुलाकात साल 2003-04 में दूरदर्शन के धारावाहिक ‘शिकवा’ के सेट पर पारिवारिक मित्र अलका आश्लेषा के जरिए हुई थी। अलका भी इस धारावाहिक में एक अहम किरदार निभा रही थीं। निर्मात...
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साहिर लुधियानवी - अदबी और फिल्मी शायरी का साहिर

16 सप्ताह पहले
साहिर लुधियानवी, वह जादूगर जो शब्दों को इस तरह से लिखता था, पिरोता था कि वह सीधे दिल में उतर जाते थे। साहिर फिल्म इंडस्ट्री से करीब तीन दशक तक जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों मशहूर गीत लिखे, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। आपके कुछ गाने तो इस कदर मशहूर हुए कि उन्हें आज भी गया और गुनगुनाया जाता है। वैसे भी पुराने गीतों की बात ही कुछ और है। साहिर का जन्म मुस्लिम गुज्जर परिवार में आठ मार्च, 1921 को लुधियाना, पंजाब में हुआ| उनका बचपन का नाम अब्दुल हई था। 1934 में जब वे महज 13 वर्ष के थे तब पिता ने दूसरी शादी कर ली। तब उनका मां ने एक बड़ा कदम उठाकर अपने पति को छोड़ने का फैसला किया साहिर अपनी मां के साथ रहे।
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देशभक्ति का ‘प्रदीप’

18 सप्ताह पहले
भारतीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वालों में जहां एक तरफ राष्ट्रीय नेताओं की पांत और उनके पीछे चलनेवाले लाखों राष्ट्रभक्त थे, तो वहीं संघर्ष की इस मशाल को कलम के सिपाहियों ने अपने लेखन के बूते जलाए रखा। खासतौर पर  1931 के बाद वो दौर था जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन अपने चरम पर था। एक तरफ भगत सिंह और साथियों की शहादत के बाद लोगों ने भारत को आजाद कराने के लिए कमर कस ली थी। दूसरी तरफ लोगों का हौसला बुलंद करने का जिम्मा कई कवि निभा रहे थे। उस समय तमाम कवियों के बीच एक नाम जो काफी लोकप्रिय था, वह नाम था रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी यानी प्रदीप का। रामचंद्र द्विवेदी, कवि प्रदीप कैसे बने इसका भी एक दिलचस्प किस्सा ...
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संघर्ष और सफलता की ‘साधना’

19 सप्ताह पहले
बॉलीवुड की दुनिया में अभिनेत्री साधना का कितना बड़ा नाम था, इसका अहसास से किया जा सकता है कि 25 दिसंबर 2015 को जब उनका निधन हुआ तो लता मंगेशकर ने ट्विटर के जरिए कहा, ‘मुझे अभी पता चला कि मेरी पसंदीदा अभिनेत्री साधना जी का आज स्वर्गवास हुआ है। वह एक बहुत बड़ी कलाकार थीं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।’ साधना के साथ फिल्म ‘एक फूल दो माली’ और ‘इंतकाम’ में काम कर चुके अभिनेता संजय खान कहते हैं, ‘मैंने उनके साथ अपनी दो सबसे कामयाब फिल्में की थीं। वह बेहद खूबसूरत थीं। बहुत सुंदर तरीके से चलती थीं। उन्हें हेयर स्टाइलिंग की इतनी समझ थी की एक बार उन्होंने मुझे एक नया हेयर स्टाइल दिया था।’ दर...
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मुकेश - हर इक पल मेरी हस्ती है...

20 सप्ताह पहले
मुकेश के हिस्से में शायद ही कभी मस्तीभरे गाने आए हों लेकिन अपने गानों के मिजाज से अलग वे मासूमियत भरे मजाक करने में कभी चूकते नहीं थे। यहां तक कि उन्हें खुद पर मजाक करने से भी गुरेज नहीं था। कहते हैं कि वे जब स्टेज परफॉर्मेंस के लिए जाते थे तो अक्सर वहां लता मंगेशकर का जिक्र करते थे। वे श्रोताओं से कहते कि लता दीदी  इतनी उम्दा और संपूर्ण गायिका उनकी वजह से समझी जाती हैं क्योंकि युगल गानों में वे खुद खूब गलतियां करते हैं, ऐसे में लता मंगेशकर लोगों को ज्यादा ही भाने लगती हैं। इस मजाक के साथ मुकेश एक तरह से अपने ऊपर होने वाली उस छींटाकशी को स्वीकार कर लेते थे कि वे सीमित प्रतिभा के गायक हैं। हालांकि यह संगीत की बौद्धिक समझ रखन...
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नसीरुद्दीन शाह - एक्टिंग का स्कूल

21 सप्ताह पहले
दुनिया में भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनतीं और देखी भी जाती हैं। यहां साथ कई भाषाओं में न सिर्फ फिल्मों का निर्माण होता है, बल्कि उससे जुड़ी एक अलग कला संस्कृति भी विकसित हुई है। बावजूद इसे विश्व में भारतीय सिनेमा का रचनात्मक हस्तक्षेप बहुत कम है। एक उत्सव प्रधान देश में फिल्में भी आमतौर पर मनोरंजन का साधन हैं। अस्सी के दशक में भारतीय सिनेमा के इस पारंपरिक चरित्र के समानांतर एक नई कोशिश कुछ फिल्मकारों और अभिनेताओं ने मिलकर की। इनमें अभिनेताओं में जो नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह है- नसीरुद्दीन शाह। इस लाजवाब अभिनेता ने कला और व्यावसायिक दोनों ही तरह की फिल्मों में अपनी अभिनय की छाप छोड़ी।     कुछ कलाकारों मे...
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उषा खन्ना - शालीन संगीत की ‘उषा’

22 सप्ताह पहले
उषा खन्ना हिंदी फिल्म संगीत के बड़े पुरुष प्रधान समाज में ऐसी महत्वपूर्ण महिला संगीतकार के रूप में मौजूद रहीं, जिन्होंने लोकप्रियता के शिखर पर जाकर अपने लिए एक नया और पुख्ता मुकाम बनाया। दरअसल, जद्दनबाई और सरस्वती देवी की परंपरा में उषा खन्ना एक बिल्कुल अलग ही धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं। उनके खाते में दर्जनों ऐसी सुपरहिट फिल्में हैं, जिनसे हम उषा खन्ना को लेकर एक अलग ही किस्म का सांगीतिक विमर्श रच सकते हैं।  धुनों में नाजुक अहसास पहली ही फिल्म ‘दिल दे के देखो’ (1959) से कामयाबी के झंडे गाड़ने वाली उषा ने बाद में ...
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लीला मिश्रा - अभिनय की बनारसी ‘लीला’

22 सप्ताह पहले
फिल्म ‘शोले’ में मौसी के किरदार में अभिनेत्री लीला मिश्रा ने जरूर लोकप्रियता की बुलंदी तक पहुंची, पर उनके सिने-सफर को देखें तो उनके अभिनय के कई और भी आयाम हैं। कभी वह ‘राम और श्याम’ में दिलीपकुमार (राम) की मां बनीं, तो कभी ‘दासी’ में मौसमी चटर्जी की ‘मामी’। दिलचस्प है कि कभी लीला मिश्रा को पर्दे पर अपना काम देखने के लिए सिनेमाघर जाना भी पसंद नहीं था। उन्होंने अपने ‘पवित्र बनारस’ वाले भाव को मुंबई में भी बरकरार रखा और फिल्में नहीं देखती थीं, यहां तक कि ‘शोले’ और सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ भी नहीं। लीला मिश्रा के लिए फिल्मों में अभिनय कर...
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गौहर जान - ‘भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार’

23 सप्ताह पहले
भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार गौहर जान के 145वें जन्म दिवस के मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें विशेष रूप से याद किया। गौहर भारत की उन महान हस्तियों में से एक थीं, जिन्होंने न सिर्फ भारतीय संगीत को नई बुलंदियों पर पहुंचाया बल्कि दुनियाभर में देश का सिर भी गर्व से ऊंचा किया। 26 जून 1893 को जन्मीं भारतीय सिनेमा की मशहूर गायिका का असली नाम एंजलिना योवर्ड था। वह भारत की पहली गायिका थीं, जिन्होंने अपने गाए गीतों की रिकॉर्डिंग कराई। यही वजह है कि उन्हें ‘भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार’ का दर्जा मिला है। बचपन में उत्पीड़न


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