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शनिवार, 22 सितंबर 2018

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रीता भादुड़ी - ‘ये रातें नई पुरानी’

2 सप्ताह पहले
कई बार लोग जीते-जी हमारी स्मृतियों में इस तरह दाखिल हो जाते हैं, जैसे उनका दौर पुराना रहा हो और वो हमें छोड़कर बहुत पहले चले गए हों। ऐसा ही हुआ अभिनेत्री रीता भादुड़ी के साथ। कहने को तो उनका निधन बीते माह ही हुआ पर उनके बारे में लोग या तो सोचना-बात करना बंद कर चुके थे या फिर उनकी याद भूले-भटके ही लोगों को आती थी। उनके करीबी लोगों से संपर्क किया तो पता चला कि उन्हें कई सालों से डायबिटीज थी, जिससे उनकी किडनियां ख़राब हो गई थीं।  रीता जी से मेरी मुलाकात साल 2003-04 में दूरदर्शन के धारावाहिक ‘शिकवा’ के सेट पर पारिवारिक मित्र अलका आश्लेषा के जरिए हुई थी। अलका भी इस धारावाहिक में एक अहम किरदार निभा रही थीं। निर्मात...
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साहिर लुधियानवी - अदबी और फिल्मी शायरी का साहिर

3 सप्ताह पहले
साहिर लुधियानवी, वह जादूगर जो शब्दों को इस तरह से लिखता था, पिरोता था कि वह सीधे दिल में उतर जाते थे। साहिर फिल्म इंडस्ट्री से करीब तीन दशक तक जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों मशहूर गीत लिखे, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। आपके कुछ गाने तो इस कदर मशहूर हुए कि उन्हें आज भी गया और गुनगुनाया जाता है। वैसे भी पुराने गीतों की बात ही कुछ और है। साहिर का जन्म मुस्लिम गुज्जर परिवार में आठ मार्च, 1921 को लुधियाना, पंजाब में हुआ| उनका बचपन का नाम अब्दुल हई था। 1934 में जब वे महज 13 वर्ष के थे तब पिता ने दूसरी शादी कर ली। तब उनका मां ने एक बड़ा कदम उठाकर अपने पति को छोड़ने का फैसला किया साहिर अपनी मां के साथ रहे।
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देशभक्ति का ‘प्रदीप’

5 सप्ताह पहले
भारतीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वालों में जहां एक तरफ राष्ट्रीय नेताओं की पांत और उनके पीछे चलनेवाले लाखों राष्ट्रभक्त थे, तो वहीं संघर्ष की इस मशाल को कलम के सिपाहियों ने अपने लेखन के बूते जलाए रखा। खासतौर पर  1931 के बाद वो दौर था जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन अपने चरम पर था। एक तरफ भगत सिंह और साथियों की शहादत के बाद लोगों ने भारत को आजाद कराने के लिए कमर कस ली थी। दूसरी तरफ लोगों का हौसला बुलंद करने का जिम्मा कई कवि निभा रहे थे। उस समय तमाम कवियों के बीच एक नाम जो काफी लोकप्रिय था, वह नाम था रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी यानी प्रदीप का। रामचंद्र द्विवेदी, कवि प्रदीप कैसे बने इसका भी एक दिलचस्प किस्सा ...
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संघर्ष और सफलता की ‘साधना’

6 सप्ताह पहले
बॉलीवुड की दुनिया में अभिनेत्री साधना का कितना बड़ा नाम था, इसका अहसास से किया जा सकता है कि 25 दिसंबर 2015 को जब उनका निधन हुआ तो लता मंगेशकर ने ट्विटर के जरिए कहा, ‘मुझे अभी पता चला कि मेरी पसंदीदा अभिनेत्री साधना जी का आज स्वर्गवास हुआ है। वह एक बहुत बड़ी कलाकार थीं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।’ साधना के साथ फिल्म ‘एक फूल दो माली’ और ‘इंतकाम’ में काम कर चुके अभिनेता संजय खान कहते हैं, ‘मैंने उनके साथ अपनी दो सबसे कामयाब फिल्में की थीं। वह बेहद खूबसूरत थीं। बहुत सुंदर तरीके से चलती थीं। उन्हें हेयर स्टाइलिंग की इतनी समझ थी की एक बार उन्होंने मुझे एक नया हेयर स्टाइल दिया था।’ दर...
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मुकेश - हर इक पल मेरी हस्ती है...

8 सप्ताह पहले
मुकेश के हिस्से में शायद ही कभी मस्तीभरे गाने आए हों लेकिन अपने गानों के मिजाज से अलग वे मासूमियत भरे मजाक करने में कभी चूकते नहीं थे। यहां तक कि उन्हें खुद पर मजाक करने से भी गुरेज नहीं था। कहते हैं कि वे जब स्टेज परफॉर्मेंस के लिए जाते थे तो अक्सर वहां लता मंगेशकर का जिक्र करते थे। वे श्रोताओं से कहते कि लता दीदी  इतनी उम्दा और संपूर्ण गायिका उनकी वजह से समझी जाती हैं क्योंकि युगल गानों में वे खुद खूब गलतियां करते हैं, ऐसे में लता मंगेशकर लोगों को ज्यादा ही भाने लगती हैं। इस मजाक के साथ मुकेश एक तरह से अपने ऊपर होने वाली उस छींटाकशी को स्वीकार कर लेते थे कि वे सीमित प्रतिभा के गायक हैं। हालांकि यह संगीत की बौद्धिक समझ रखन...
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नसीरुद्दीन शाह - एक्टिंग का स्कूल

8 सप्ताह पहले
दुनिया में भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनतीं और देखी भी जाती हैं। यहां साथ कई भाषाओं में न सिर्फ फिल्मों का निर्माण होता है, बल्कि उससे जुड़ी एक अलग कला संस्कृति भी विकसित हुई है। बावजूद इसे विश्व में भारतीय सिनेमा का रचनात्मक हस्तक्षेप बहुत कम है। एक उत्सव प्रधान देश में फिल्में भी आमतौर पर मनोरंजन का साधन हैं। अस्सी के दशक में भारतीय सिनेमा के इस पारंपरिक चरित्र के समानांतर एक नई कोशिश कुछ फिल्मकारों और अभिनेताओं ने मिलकर की। इनमें अभिनेताओं में जो नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह है- नसीरुद्दीन शाह। इस लाजवाब अभिनेता ने कला और व्यावसायिक दोनों ही तरह की फिल्मों में अपनी अभिनय की छाप छोड़ी।     कुछ कलाकारों मे...
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उषा खन्ना - शालीन संगीत की ‘उषा’

9 सप्ताह पहले
उषा खन्ना हिंदी फिल्म संगीत के बड़े पुरुष प्रधान समाज में ऐसी महत्वपूर्ण महिला संगीतकार के रूप में मौजूद रहीं, जिन्होंने लोकप्रियता के शिखर पर जाकर अपने लिए एक नया और पुख्ता मुकाम बनाया। दरअसल, जद्दनबाई और सरस्वती देवी की परंपरा में उषा खन्ना एक बिल्कुल अलग ही धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं। उनके खाते में दर्जनों ऐसी सुपरहिट फिल्में हैं, जिनसे हम उषा खन्ना को लेकर एक अलग ही किस्म का सांगीतिक विमर्श रच सकते हैं।  धुनों में नाजुक अहसास पहली ही फिल्म ‘दिल दे के देखो’ (1959) से कामयाबी के झंडे गाड़ने वाली उषा ने बाद में ...
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लीला मिश्रा - अभिनय की बनारसी ‘लीला’

10 सप्ताह पहले
फिल्म ‘शोले’ में मौसी के किरदार में अभिनेत्री लीला मिश्रा ने जरूर लोकप्रियता की बुलंदी तक पहुंची, पर उनके सिने-सफर को देखें तो उनके अभिनय के कई और भी आयाम हैं। कभी वह ‘राम और श्याम’ में दिलीपकुमार (राम) की मां बनीं, तो कभी ‘दासी’ में मौसमी चटर्जी की ‘मामी’। दिलचस्प है कि कभी लीला मिश्रा को पर्दे पर अपना काम देखने के लिए सिनेमाघर जाना भी पसंद नहीं था। उन्होंने अपने ‘पवित्र बनारस’ वाले भाव को मुंबई में भी बरकरार रखा और फिल्में नहीं देखती थीं, यहां तक कि ‘शोले’ और सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ भी नहीं। लीला मिश्रा के लिए फिल्मों में अभिनय कर...
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गौहर जान - ‘भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार’

11 सप्ताह पहले
भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार गौहर जान के 145वें जन्म दिवस के मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें विशेष रूप से याद किया। गौहर भारत की उन महान हस्तियों में से एक थीं, जिन्होंने न सिर्फ भारतीय संगीत को नई बुलंदियों पर पहुंचाया बल्कि दुनियाभर में देश का सिर भी गर्व से ऊंचा किया। 26 जून 1893 को जन्मीं भारतीय सिनेमा की मशहूर गायिका का असली नाम एंजलिना योवर्ड था। वह भारत की पहली गायिका थीं, जिन्होंने अपने गाए गीतों की रिकॉर्डिंग कराई। यही वजह है कि उन्हें ‘भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार’ का दर्जा मिला है। बचपन में उत्पीड़न
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सुचित्रा सेन - बॉलीवुड की ग्रेटा गार्बो

12 सप्ताह पहले
अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री सुचित्रा सेन को याद करते हुए जीते-जी लीजेंड बन गए देवानंद की फिल्म ‘गाइड’ का एक डायलॉग याद आता है। इस फिल्म में देवानंद अपने अंदाज में कहते हैं, ‘ये जिंदगी भी एक नशा है दोस्त, जब चढ़ता है तो पूछो न क्या आलम होता है।’ उनका यह डायलॉग सिल्वर स्क्रीन की जिंदगी पर भी बिल्कुल फिट बैठता है। यहां जब एक्टर-एक्ट्रेस की शोहरत का खुमार चढ़ता है तो सातवें आसमान पर होता है, लेकिन जब उतरता है तो उन्हें लोगों की निगाहों से इतनी दूर ले जाता है कि वो खुद को भी पहचानने से इनकार कर देते हैं। कुछ साल पहले जब अपने जमाने की मशहूर एक्ट्रेस सुचित्रा सेन के अस्पताल में भर्ती होने की खबर आई तो ए...
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बैंकाक फिल्म फेस्ट में ‘किताब’

13 सप्ताह पहले
कमलेश मिश्र निर्देशित टॉम ऑल्टर की आखिरी फिल्म किताब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सराही जा रही है। हाल ही में यह फिल्म बैंकाक के 9 फिल्म फेस्ट में दिखाई गई। इस अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के छठे संस्करण में दुनिया भर की 9 फाइनलिस्ट फिल्मों में किताब भी शामिल थी। इस फिल्म को कॉम्पटिशन कैटेगॉरी में ‘द बेस्ट शॉर्ट फिल्म’ (इन साउंड डिजाइन) का अवॉर्ड मिला। इसके अलावा किताब - ‘द बेस्ट शॉर्ट फिल्म’ (व्यूअर्स च्वाइस) रही। इस समरोह में किताब इकलौती फिल्म रही जिसकी स्क्रीनिंग दर्शकों की मांग पर दो बार हुई। फिल्म की पहली स्क्रीनिंग 30 मई 2018 को तय थी पर दर्शकों की मांग पर इसे समापन समारोह पर क्लोजिंग फिल्म के तौर पर...
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आज जाने की जिद न करो...

14 सप्ताह पहले
संगीत की दुनिया की यह खासियत है कि कई बार कोई आवाज अपने दौर से इतनी आगे निकल जाती है कि वह न सिर्फ अपने गानेवाले को अमर बना देती है, बल्कि कामयाबी और शोहरत की बड़ी मिसाल भी बन जाती है। जब 70 के दशक में फरीदा खानम ने, ‘आज जाने की जिद न करो’, को पहली बार गाया, तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत प्रेमी मंत्रमुग्ध रह गए। वैसे यह भी एक हैरत की बात है कि फरीदा खानम का नाम तो सबकी जुबान पर चढ़ गया, लेकिन इसके रचयिता फैयाज हाशमी को लगभग भुला दिया गया। हाशमी वही शख्स थे, जिन्होंने पंकज मलिक की गाई मशहूर गजल, ‘ये मौसम, ये हंसना हंसाना’ लिखी थी। उनके ही लिखे गीत 'तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी', ने तलत मह...


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