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शनिवार, 17 नवंबर 2018

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आबाद रहनी चाहिए किताबों की दुनिया

5 दिन पहले
कुछ समय पहले गांधी जयंती पर बिहार के बेगुसराय के गोदरगावां गांव में जाने का मौका मिला था। इस गांव में एक एक अद्भुत संस्था है। इसकी कहानी यह है कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजी सरकार ने रेल की पटरी उखाड़ने की सजा में इस गांव पर एक सामूहिक जुर्माना लगाया था। स्वतंत्रता मिलने के बाद नई सरकार ने गांव को जुर्माने की रकम वापस कर दी।   गांववालों ने उसी पैसे से यहां एक पुस्तकालय बनवाया। इसीलिए इसका नाम भी रखा ‘विप्लवी पुस्कालय’। मैं चिंतित था कि गांधी और राष्ट्रवाद जैसे विषय पर मैं ग्रामीण श्रोताओं के बीच कैसे बोलूं। लेकिन मुझे आश्चर्य यह हुआ कि इस पुस्तकालय के सभागार में सात सौ से ज्यादा लोग उपस...
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जलाने वाला नहीं, जिलाने वाला प्रेम

5 दिन पहले
प्रेम शब्द से न चिढ़ो। यह हो सकता है कि तुमने जो प्रेम समझा था वह प्रेम ही नहीं था। उससे ही तुम जले बैठे हो और यह भी मैं जानता हूं कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीने लगता है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं, उस प्रेम का तो तुम्हें अभी पता ही नहीं है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं वह तो कभी असफल होता ही नहीं। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं उसमें अगर कोई जल जाए तो निखरकर कुंदन बन जाता है, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं उसमें जलकर कोई जलता नहीं और जीवंत हो जाता है। व्यर्थ जल जाता है, सार्थक निखर आता है। जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है- दुनिया में दो ही दुख हैं, एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम ...
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प्रकृति और गंगा

2 सप्ताह पहले
दुनिया के शक्तिशाली कहे जाने वाले देश जिस तरह दूसरे देशों के संसाधनों से आर्थिक लूट का खेल चला रहे हैं, बिगड़ते पर्यावरण के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है। महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था कि धरती हमारे असीमित लालच और भोग का भार नहीं सह सकती है। हमें इस बारे में अब निर्णायक तरीके से सोचना ही होगा। आज संकट साझा है, पूरी धरती का है। अतः प्रयास भी सभी को साझे करने होंगे। समझना होगा कि अर्थव्यवस्था को वैश्विक करने से नहीं, बल्कि ’वसुधैव कुटुंबकम’ की पुरातन भारतीय अवधारणा को लागू करने से ही धरती और इसकी संतानों की सांसें सुरक्षित रहेंगी। यह नहीं चलने वाला कि विकसित को साफ रखने के लिए वह अपना कचरा विकासशील देशों में भेजें। निजी ...
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करुणा की गलत व्याख्या

2 सप्ताह पहले
औरतें कमजोर नहीं हैं और उन्हें कमजोर मानना भी नहीं चाहिए। उनकी स्वाभाविक करुणा और सहानुभूति की अक्सर गलत तरीके से व्याख्या की जाती है और इसे उनकी कमजोरी समझा जाता है। अगर औरत अपने भीतर की ताकत को समेट ले तो वह एक पुरुष से भी ज्यादा है। अगर हम अपनी आंतरिक शक्ति को अपने पक्ष में कर लें तो यह संसार स्वर्ग बन सकता है। युद्ध, संघर्ष और आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्यार और करुणा जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाएगा। हर युग में साहसी महिलाओं का अस्तित्व रहा है, जो क्रांति की शुरुआत करने के लिए पुरुष समाज द्वारा बनाए गए पिंजरों को तोड़कर बाहर आई हैं। भारत में ही कई साहसी महिलाएं रह चुकी हैं, जैसे- रानी पद्माव...
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स्वच्छ ईंधन की दरकार और एथनोल

4 सप्ताह पहले
पेट्रोल और डीजल की दिनों-दिन बढ़ रही कीमतों के बीच वैकल्पिक ईंधन के रूप में एथनोल के प्रयोग से न केवल प्रदूषण पर लगाम लगेगी, बल्कि वर्तमान में उपलब्ध ईंधनों से कम से कम 30 प्रतिशत सस्ता होने के कारण इससे आम उपभोक्ताओं को बड़ी राहत भी मिल सकती है। एथनोल के प्रयोग से परिवहन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है और यह डीजल का विकल्प बन सकता है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के इस दौर में ऊर्जा के क्षेत्र में एथनोल के प्रयोग पर जोरदार चर्चा चल रही है, जो पर्यावरण के लिए वरदान हो सकता है। भारत वर्ष 2013 के आकलन के अनुसार प्रति दिन 3.7 मिलियन बैरल पेट्रोलियम उत्पाद उपयोग करता है। जबकि स्वयं भारत लगभग 1 मिलियन बैरल पेट्रोलियम तर...
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संकल्प-समर्पण और स्त्री-पुरुष

4 सप्ताह पहले
विद्वानों ने पहले से कह रखा है कि कोई पुरुष पूरा पुरुष नहीं, कोई स्त्री पूरी स्त्री नहीं। आधुनिकतम खोजें कहती हैं कि हर मनुष्य के भीतर दोनों हैं। पुरुष के भीतर छिपी हुई स्त्री है, स्त्री के भीतर छिपा हुआ पुरुष है। जो फर्क है स्त्री और पुरुष में, वह प्रबलता का फर्क है, एंफैसिस का फर्क है। इसीलिए पुरुष स्त्री में आकर्षित होता है, स्त्री पुरुष में आकर्षित होती है। कार्ल गुस्ताव जुंग का महत्वपूर्ण देन इस सदी के विचार को है। उनकी अन्यतम खोजों में जो महत्वपूर्ण खोज है, वह है कि प्रत्येक पुरुष उस स्त्री को खोज रहा है, जो उसके भीतर ही छिपी है और प्रत्येक स्त्री उस पुरुष को खोज रही है, जो उसके भीतर ही छिपा है। इसीलिए यह खोज कभी पू...
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महात्माओं की कुल-परंपरा नहीं होती

5 सप्ताह पहले
‘बताइए, बताइए! कुछ तो बताइए गांधी जी के पारिवारिक प्रसंग! घरेलू घटनाएं! आप कितने भाग्यवान हैं जो उनके घर में, उन्हीं के परिवार में जन्मे हैं।’ ऐसा मुझे बार-बार कहा गया है, पूछा गया है। मैं उस जिज्ञासा को समझता हूं, उसका आदर करता हूं। और जब पूछने वाला बालक या बालिका हो तो वह प्रश्न, वह निवेदन और बल ले लेता है। उससे मुकरना कठिन हो जाता है। फिर यह तर्क भी जोड़ दिया जाता है-‘हमें उनको देखने का सौभाग्य नहीं मिला, लेकिन आपको देख रहे हैं। बस, ऐसा लगता है..।’ यह बात जैसे ही शुरू होती है, मैं उसको वहीं का वहीं रोक देने की चेष्टा करता हूं-‘देखिए, मैं अदना इंसान हूं। साधारण आदमी। गांधी नाम जरूर लगा है मेरे नाम ...
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सद्भाव की सीख

5 सप्ताह पहले
गांधी जी ने 1909 में ‘हिंद स्वराज’ नामक पुस्तक लिखी थी। वर्ष 1906 में कलकत्ता कांग्रेस में स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ था। उसके पहले हमारे लोग सरकार से प्रार्थना करते थे कि हमें फलां दुख है, उसका आप निवारण कीजिए, लेकिन कांग्रेस ने, दादाभाई नौरोजी ने जाहिर किया कि छुटपुट दुख का निवारण करने से कुछ नहीं होगा। हमारे दुख का अंत तब होगा जब स्वराज आएगा। उसके बाद 1908 में सरकार ने जोरदार दमन किया। उसमें लोकमान्य तिलक जैसे बहुत सारे लोग गिरफ्तार हुए। उस जमाने में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे। वहां से लौटते हुए उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ पुस्तक लिखी। उसमें बताया गया है कि हिंद स्वराज का नमूना कैसा होगा? ...
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बापू के सपनों को पूरा करेगा एकजुट भारत

6 सप्ताह पहले
हम अपने प्यारे बापू की 150वीं जयंती के आयोजनों का शुभारंभ कर रहे हैं। बापू आज भी विश्व में उन लाखों-करोड़ों लोगों के लिए आशा की एक किरण हैं, जो समानता, सम्मान, समावेश और सशक्तीकरण से भरपूर जीवन जीना चाहते हैं। विरले ही लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने मानव समाज पर उनके जैसा गहरा प्रभाव छोड़ा हो। महात्मा गांधी ने भारत को सही अर्थों में सिद्धांत और व्यवहार से जोड़ा था।  सरदार पटेल ने ठीक ही कहा था,‘भारत विविधताओं से भरा देश है। इतनी विविधताओं वाला कोई अन्य देश धरती पर नहीं है। यदि कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसने उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए सभी को एकजुट किया, जिसने लोगों को मतभेदों से ऊपर उठाया और विश्व मंच पर भारत का गौर...
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इतिहास का पारस-स्पर्श

7 सप्ताह पहले
वैसे तो इतिहास की हर घटना की शताब्दी आती है और उसे सौ साल पुराना बना कर चली जाती है। हम भी इतिहास को बीते समय और गुजरे लोगों का दस्तावेज भर मानते हैं। लेकिन इतिहास बीतता नहीं है, नए रूप और संदर्भ में बार-बार लौटता है और हमें मजबूर करता है कि हम अपनी आंखें खोलें और अपने परिवेश को पहचानें! इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे होते हैं कि वे जब भी आपको या आप उनको छूते-खोलते हैं तो आपको कुछ नया बना कर जाते हैं। इसे पारस-स्पर्श कहते हैं। इतिहास का पारस-स्पर्श! चंपारण का गांधी-अध्याय ऐसा ही पारस है! इस पारस के स्पर्श से ही गांधी को वह मिला और वे वह बने जिसकी खोज थी उन्हें, यानी इतिहास ने जिसके लिए उन्हें गढ़ा था। और वह गांधी का स्पर्श ही था कि जिसन...
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विपक्ष से विकल्प तक

8 सप्ताह पहले
पंडित जी के जीवन में सादगी... मैं समझता हूं कि कोई भी पंडित जी की बात करेगा तो सबसे पहले सादगी की छवि उभर कर के आती है। मुझे तो पंडित जी के दर्शन करने का सौभाग्य नहीं मिला। जब उनकी हत्या हुई तो अखबार के हेडलाइन पर थी। हम स्कूल में पढ़ते थे उस समय। पहली बार ध्यान गया था इस महापुरुष की तरफ। लेकिन बहुत लोग बैठे हैं जिनको पंडित जी को निकट से देखने का, सुनने का, बात करने का साथ में काम करने का सौभाग्य मिला है। आज कल्पना की जा सकती है कि  इतने कम समय में, राजनीतिक जीवन में एक राजनीतिक विचार, एक राजनीतिक व्यवस्था, एक राजनीतिक दल, विपक्ष से लेकर विकल्प तक की यात्रा को कोई पार का ले। ये छोटी सिद्धि नहीं है। यह विपक्ष से विकल्प तक की...
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भारतीय ज्ञान परंपरा का आधुनिक सर्ग

11 सप्ताह पहले
जिस संस्कृति और दर्शन में गुरु को ईश्वर से भी पहले स्थान दिया गया हो, उसमें गुरुओं की महानता के आख्यान आपवादिक हों, ऐसा नहीं हो सकता। पौराणिकता और परंपरा से आगे आधुनिक दौर की बात करें तो भारत में जिस गुरु या शिक्षक का स्मरण सबसे पहले होता है, वे हैं डॉ. राधाकृष्णन। अपने इस आदर्श शिक्षक की जयंती (5 सितंबर) को देश ‘शिक्षक दिवस’ के तौर पर मनाता है। डॉ. राधाकृष्णन पूरे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिए अपने भाषण में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ...


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