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बुधवार, 23 मई 2018

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सांस्कृतिक सेतु है पर्यटन

एक दिन पहले
देश में विदेशी पर्यटकों की संख्या 2016 के 6.8 प्रतिशत से बढ़कर जनवरी 2017 में 16.5 प्रतिशत हो गई। इसी प्रकार घरेलू पर्यटकों की संख्या में (2015 की तुलना में) 2017 में 15.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या से स्पष्ट है कि एनडीए सरकार द्वारा लागू की गई पर्यटन नीतियां सफल रही हैं। विदेशी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि का कारण ऑनलाइन वीजा सुविधा उपलब्ध कराना है। यह सुविधा अब 180 देशों को उपलब्ध है। चिकित्सा और व्यावसायिक पर्यटकों के लिए ई-वीजा की सुविधा तथा ठहरने की अवधि को 30 दिनों से बढ़ाकर 60 दिन कर देने की वजह से भी विदेशी पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। ताजमहल जैसी ऐतिहासिक इमारतों में ई-टिकट के लांच स...
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स्वच्छता के लिए भारत भ्रमण

एक दिन पहले
मेरा जन्म तमिलनाडु के मदुरै में हुआ, लेकिन पिता की नौकरी के सिलसिले में मेरी परवरिश मुंबई से लेकर केन्या तक हुई। मैं पढ़ाई के सिलसिले में वापस भारत आई और चेन्नई में आर्किटेक्चर की पढ़ाई शुरू की। दो साल पहले ऐसे ही दोस्तों के साथ बातचीत करते हुए एक दिन मुझे पता चल कि ग्रामीण इलाके की लड़कियां तब तक ही स्कूल जाती है, जब तक उन्हें मासिक धर्म की हकीकत से जूझना नहीं पड़ता। दरअसल, अधिकतर ग्रामीण स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था नहीं होती। वैसे यह जानकर मैं थोड़ा हैरान हुई।  इस सिलसिले में मैंने खोजबीन की तो मुझे सच्चाई और भी भयावह लगी। मुझे एक ऐसी बच्ची के बारे में पता चला जिसने सिर्फ इसलिए दम तोड़ दिया था, क्योंकि खुले में ...
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मृत्यु और धर्म

एक सप्ताह पहले
अरस्तुन ने कहा है कि यदि मृत्यु न हो, तो जगत में कोई धर्म भी न हो। ठीक ही है उनकी बात, क्योंकि अगर मृत्यु न हो, तो जगत में कोई जीवन भी नहीं हो सकता। मृत्यु केवल मनुष्य के लिए है। इसे थोड़ा समझ लें। पशु भी मरते हैं, पौधे भी मरते हैं, लेकिन मृत्यु मानवीय घटना है। पौधे मरते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मृत्यु का कोई बोध नहीं है। पशु भी मरते हैं, लेकिन अपनी मृत्यु के संबंध में चिंतन करने में असमर्थ हैं। इस तरह मृत्यु केवल मनुष्य की ही होती है, क्योंकि मनुष्य जानकर मरता है, जानते हुए मरता है। मृत्यु निश्चित है, ऐसा बोध मनुष्य को है। चाहे मनुष्य कितना ही भुलाने की कोशिश करे, चाहे कितना ही अपने को छिपाए, पलायन करे। लेकिन हृदय की गहराई में मनुष्य जानता है कि मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है। ...
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अब साफ-सुथरे होने लगे गांवों के रास्ते

एक सप्ताह पहले
सातो अवंती बिहार के कैमूर जिले का एक प्रतिष्ठित गांव है। कभी वहां गांव में घुसने के रास्ते गंदे होते थे। शौचालय के अभाव में अधिकतर महिलाएं और बच्चे इन रास्तों पर शौच किया करते थे। न तो शौच करने वालों को यह पसंद था और न ही इस रास्ते पर आने-जाने वालों को। फिर भी यह सब जारी रहा। कोई किसी को ऐसा करने से नहीं रोकता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। गांव में घुसने के रास्ते साफ-सुथरे हो गए हैं। अब कोई प्रवेश मार्ग पर शौच के लिए नहीं बैठता। उन्हें अब यह साफ-सफाई अच्छा लगने लगा है। आखिर लोगों के व्यवहार में यह परिवर्तन कैसे आ गया?  यह कहानी किसी एक गांव की नहीं है। बिहार और देश के कई गांवों की यह कहानी है। मोदी सरकार के स्वच्छ भा...
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स्वच्छता और सेहत के साथ समाज सुधार

2 सप्ताह पहले
पर्यावरण का संदर्भ औपचारिक नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर सभी लोगों को चिंतित कर रहा है, प्रभावित कर रहा है। खासतौर पर जलवायु परिवर्तन की जो खतरनाक परिणति लगातार सामने आती जा रही है, उसने पर्यावरण और मानवता दोनों के भविष्य को साझे तौर पर संकट में ला दिया है। लिहाजा, इस विषय पर अगर कोई विचार कर रहा है और इस दिशा में सकर्मक तरीके से कार्य करने की प्रतिबद्धता दिखा रहा है, तो वह सराहना का पात्र है। इस मुद्दे पर जितना भी मंथन हो और जितने भी तरह के सुझाव आएं, वे सब कीमती हैं, ये हमारे समय की दरकार और चुनौती के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं।  हम सब लोग पर्यावरण-स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बढ़े महत्व के बारे मे...
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विंडहोक घोषणा और मौजूदा पत्रकारिता

2 सप्ताह पहले
दुनिया भर में पिछले कुछ सालों में पत्रकारों पर हो रहे हमलों में तेजी आई है। कुछ लोग इसे ‘पोस्ट ट्रूथ’ के नाम से उभरे ग्लोबल फिनोमेना के तौर पर देखते हैं, जिसमें मीडिया के लोकतांत्रिक आलोचकीय विवेक पर हर तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं, साथ ही उस पर प्रहार लगातार हो रहे हैं। ये प्रहार सत्ता और समाज की उन दक्षिणपंथी कही जानेवाली ताकतों की तरफ से किए जा रहे हैं, जो विसम्मति या असहमति को अपने वैचारिक प्रसार के लिए चुनौती मानते हैं। प्रत्येक वर्ष 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1993 में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की घोषणा की थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह प्रेस की स्वतंत्रता के सिद्...
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बापू, बिहार और सत्याग्रह

6 सप्ताह पहले
10 अप्रैल 1917 ! सुबह के करीब 10 बजे हैं और एक रेलगाड़ी अभी-अभी पटना जंक्शन पर आ कर थमी है। एक नया आदमी स्टेशन पर उतरता है, जिसे न पटना जानता है और न जिसने कभी पटना को जाना-देखा है। नाम है मोहनदास करमचंद गांधी! मोहनदास करमचंद गांधी नाम का यह आदमी राजकुमार शुक्ल नाम के उस आदमी को भी बहुत थोड़ा जानता है, जो उसे कलकत्ता से साथ ले कर पटना आया है। राजकुमार शुक्ल भी इस मोहनदास करमचंद गांधी को बहुत थोड़ा जानते हैं। हां, वे इतना जरूर जानते हैं कि यह आदमी गुजराती है, लेकिन देश में जो कुछ लोग उसे जानते हैं वह सुदूर के देश दक्षिण अफ्रीका के कारण जानते हैं जहां इस आदमी ने ‘कुछ किया’ है। क्या किया,  क्यों और कैसे किया, यह रा...
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स्वतंत्र भारत में स्वच्छाग्रह

6 सप्ताह पहले
कहते हैं, जिस विचार का समय आ गया हो, उसे कोई रोक नहीं सकता! एक रक्तरंजित विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में, जब हिंसा ही युग की पहचान हुआ करती थी, भारत ने अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन के जरिए, सत्याग्रह के जरिए स्वतंत्रता हासिल की। पूरा देश महात्मा के आह्वान के पीछे आ गया और अपनी स्वतंत्रता के रूप में भारत ने संसार के सामने एक मिसाल पेश की। यह एक ऐसा विचार था, जिसका समय आ चुका था। उसी तरह आज, जब भारत का नाम खुले में शौच करने वालों की सबसे बड़ी तादाद के साथ इसके लिए बदनाम देशों की सूची में सबसे ऊपर है, 2 अक्टूबर 2019 तक पूर्ण स्वच्छता प्राप्ति के लक्ष्य के साथ प्रधानमंत्री द्वारा किया गया स्वच्छ भारत का आह्वान एक ऐसा विचार है, जिसका समय आ...
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अन्नदाता और राष्ट्रपिता

7 सप्ताह पहले
आने वाले कुछ महीने किसान भाइयों और बहनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इसी कारण ढ़ेर सारे पत्र कृषि को लेकर के आए हैं। इस बार मैंने दूरदर्शन के किसान चैनल पर जो किसानों के साथ चर्चाएं होती हैं, उनके विडियो भी मंगवा कर देखे और मुझे लगता है कि हर किसान को दूरदर्शन के इस चैनल से जुड़ना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए और दिखाए गए प्रयोगों को अपने खेत में लागू करना चाहिए। महात्मा गांधी हों, शास्त्री जी हों, लोहिया जी हों, चौधरी चरण सिंह जी हों, चौधरी देवीलाल जी हों- सभी ने कृषि और किसान को देश की अर्थव्यवस्था और आम जन-जीवन का एक अहम अंग माना। मिट्टी, खेत-खलिहान और किसान से महात्मा गांधी को कितना लगाव था, ये भाव उनकी इस पंक्ति में झलकता है, ...
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कम समय में पूरा ध्यान

7 सप्ताह पहले
ध्यान समय प्रबंधन में हमारी मदद कर सकता है। भले ही पहली बार इस बात पर विश्वास करना कठिन है, लेकिन आप ध्यान की मदद से अपने दिन के हर मिनट का हिसाब रखने में सक्षम हो सकते हैं। इसके लिए पूरे दिन में से केवल शांति के पांच मिनट चाहिए। ऐसा करने पर ‘मेरे पास समय नहीं है’ की आपकी सोच ‘मैं प्यार और समय का असीमित स्रोत हूं’ में बदल जाएगी। जब आप सुबह बिस्तर से उठते हैं, तैयार होते हैं, बच्चों को खाना खिलाते हैं, कुत्ते को बाहर घुमाने ले जाते हैं और पूरे दिन ऐसी कई जिम्मेदारियां निभाते हैं, तो ऐसे में शांति और केंद्रिता की अवस्था को पाना असंभव लगता है। लेकिन खुद का खयाल रखने के लिए शांति से पांच मिनट बैठना अपन...
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पुनर्वास और पानी

8 सप्ताह पहले
यह दावा अक्सर सुनाई पड़ता है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा। मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में हाथ लगा। वैसे भी मैं पिछले ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हूं। इस यात्रा के तहत अब तक करीब 40 देशों का दौरा कर चुका हूं। यात्रा को 'वर्ल्ड पीस वाटर वॉक' का नाम दिया गया है। इस वक्त जो मुद्दे अंतरराष्ट्रीय तनाव की सबसे बड़ी वजह बनते दिखाई दे रहे हैं, वे हैं- आतंकवाद, सीमा विवाद और आर्थिक तनातनी। निस्संदेह, सांप्रदायिक मुद्दों को भी उभारने की कोशिशें भी साथ-साथ चल रही हैं। इसके अलावा सम...
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सद्गुरु की खोज

8 सप्ताह पहले
शिष्य, सद्गुरु की खोज नहीं कर सकता है। कोई उपाय नहीं है आपके पास जांचने का कि कौन सद्गुरु है और संभावना इसकी है कि जिन बातों से प्रभावित होकर आप सद्गुरु को खोजें, वे बातें ही गलत हों। अक्सर होता यह है कि जो दावा करता है कि मैं सद्गुरु हूं, वह आपको प्रभावित कर ले। हम दावों से प्रभावित होते हैं, जिससे बड़ी कठिनाई निर्मित हो जाती है। वैसे शायद ही कोई हो जो खुद के सद्गुरु होने का दावा स्वयं करे। विडंबना यह कि बिना दावे के तो हमारे पास कोई उपाय नहीं है पहचानने का। हम चरित्र की सामान्य नैतिक धारणाओं से प्रभावित होते हैं, लेकिन सद्गुरु हमारी चरित्र की सामान्य धारणाओं के पार होता है। समाज की बंधी हुई धारणा, जिसे नीति मानती है, सद्...


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