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बुधवार, 15 अगस्त 2018

consensus-in-democracy

लोकतंत्र में आम सहमति

2 दिन पहले
लोकतंत्र की सरिता अबाध गति से बहती रहे, यह आवश्यक है। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सरिता अविश्वास के भंवर में फंसकर अपना प्रवाह खो रही है। तब मैंने त्याग-पत्र दे दिया, क्योंकि मैं अल्पमत में था और अंपायर मुझे कहते कि आप मैदान से बाहर चले जाइए, उससे पहले ही मैंने मैदान छोड़ दिया। लेकिन उसके बाद जो घटनाचक्र चला, उस पर इस देश को गंभीरता से विचार करना होगा। 1989 से विश्वास मत के भंवर में पड़े हुए लोकतंत्र का चित्र हमें चिंता पैदा करता है। 21 दिसंबर 1989 को फिर विश्वास मत हुआ था। सरकार केवल ग्यारह महीने चली। सात नवंबर 1990 को पुन: विश्वास मत हुआ। 1990 में नए प्रधानमंत्री ने विश्वास मत लिया। किंतु पांच वर्ष सरकार चलने की बजाए ...
infinite-possibilities-for-the-handloom-sector

हथकरघा क्षेत्र के लिए असीम संभावनाएं

एक सप्ताह पहले
देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र से लेकर कश्मीर और दक्षिणवर्ती हिस्से तक हथकरघा पर बुने कपड़ों की विशिष्टताएं एक अनूठी और मोहक आकर्षण जगाती हैं। सदियों से हथकरघा का संबंध कपड़ों से जुड़ी उत्कृष्ट भारतीय कारीगरी और लगभग प्रत्येक राज्य में लाखों हथकरघा कारीगरों को रोजगार का स्रोत उपलब्ध कराने से जोड़ा जाता रहा है। तेजी से आ रहे बदलावों के बावजूद कला एवं करघा परंपराएं कलाकारों और शिल्पकारों की कई पीढ़ियों के सतत प्रयासों के कारण अब तक जीवित रही हैं, जिन्होंने अपने सपनों एवं विजन को उत्कृष्ट हथकरघा उत्पादों में पिरोया और अपने कौशल को आने वाली पीढ़ियों तक रूपांतरित किया। प्राचीन काल से ही भारतीय हथकरघा उत्पादों की पहचान उनकी दोषरहित ...
challenge-of-non-discrimination

निर्विचार होने की चुनौती

एक सप्ताह पहले
सब विचार बाहर के संबंध में चल रहे हैं। चौबीस घंटे बाहर के लिए सोच रहे हैं। बाहर को सोच रहे हैं। आंख खुलती है तो बाहर देखते हैं, आंख बंद होती है तो बाहर देखते हैं, क्योंकि बाहर से अंकित रूप और चित्र आंख बंद होने पर जाग जाते हैं, हमें घेर लेते हैं। वस्तुओं का जगत बाहर है और भीतर भी बाहर से प्रतिध्वनित एक विचारों का जगत है। गहराई से निरीक्षण करेंगे तो ज्ञात होगा कि वस्तुओं का घेरा आत्मा के लिए बाधा नहीं है। बाधा विचार का घेरा है। वस्तुएं आत्मा को घेर भी कैसे सकती हैं? पदार्थ केवल पदार्थ को घेरता है। आत्मा विचार से घिरी है। दर्शन की, चैतन्य की धारा विचार की ओर बह रही है। विचार और केवल विचार हमारे सन्मुख है। दर्शन उनसे ही आच्छादित है...
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समाज, साहित्य और प्रेमचंद

3 सप्ताह पहले
कलम के सिपाही कहे गए प्रेमचंद के बारे में कभी मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे ने कहा था कि अगर उन्होंने इस महान साहित्यकार की आंखों से देश के गांवों को नहीं देखा होता, तो उनकी कई फिल्मों की योजना आकार भी नहीं ले पाती। प्रेमचंद की मशहूर कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर इसी नाम से फिल्म भी बनाई, जो आज भी एक क्लासिक मानी जाती है। इस फिल्म के अंत को रे थोड़ा जरूर बदला था, पर इस कारण उन पर कहानी की आत्मा से छेड़छाड़ जैसा आरोप नहीं लगा, बल्कि इसे एक फिल्मकार का रचनात्मक विवेक और उसकी स्वतंत्रता माना गया। प्रेमचंद जिस समय लिख रहे थे, वह औपनिवेशिक शासन का समय था। वह शासन जो अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए ही स्थापित हुआ था और जिस...
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विज्ञान की भाषा के रूप में संस्कृत

3 सप्ताह पहले
आज भारत कई बड़ी समस्याओं का सामना कर रहा है और मेरे राय में ये सिर्फ विज्ञान के द्वारा ही सुलझाई जा सकती है। अगर हमें विकास करना है तो हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देश के कोने-कोने तक पहुंचाना होगा। यहां विज्ञान से मेरा मतलब भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीवन विज्ञान से नहीं है बल्कि पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से है। हमें लोगों को तार्किक व प्रश्नाकूल बनाना होगा और अंधविश्वासों व खोखली रीती-रिवाजों को खत्म करना होगा। भारतीय संस्कृति के आधार में संस्कृत भाषा है।  संस्कृत भाषा के बारे में एक बड़ी भ्रांति यह है कि यह केवल मंदिरों या धार्मिक आयोजनों में मंत्रोच्चार के लिए है। जबकि यह संपूर्ण संस्कृत साहित्य के 5 प्रतिशत से भी कम ...
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स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे

3 सप्ताह पहले
जिन लाल-बाल-पाल की तिकड़ी का जिक्र स्वाधीनता संघर्ष में काफी प्रमुखता से होता है, उसकी खासियत यही थी कि वे स्वाधीनता के साथ देश को सांस्कृतिक तौर पर भी समृद्ध करने के प्रण के साथ आंदोलनरत थे। लोकमान्य तिलक ने जहां गणेश उत्सव को राष्ट्रीयता का पर्व बना दिया, वहीं बिपिनचंद्र पाल ने दुर्गा पूजा और लाला लाजपत ने श्री रामलीला के जरिए देश में सांस्कृतिक एकता के सूत्र मजबूत किए। इन तीनों में लोकमान्य तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता हुए। ब्रिटिश सत्ता उनके नाम से इतना खौफ खाती थी कि उन्हें ‘भारतीय अशांति के पिता’ के नाम से पुकारती थी । उनका मराठी में दिया गया नारा ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आ...
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जैसा आचार वैसा विचार

3 सप्ताह पहले
वैज्ञानिकों ने विद्युत, चुंबकत्व, प्रकाश, ध्वनि और उष्मा-इन शक्तियों को जानकर बड़े-बड़े आविष्कार किए हैं। इससे उन्होंने समाज को अनेक प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। पदार्थ जगत में अणु के विस्फोट से भी एक बहुत बड़ी शक्ति को हासिल किया गया है। इन शक्तियों को अपने नियंत्रण में लाकर इनके द्वारा अद्भुत मशीनों एवं साधनों का निर्माण करने के फलस्वरूप आज का मानव विज्ञान के चमत्कारों से बहुत ही प्रभावित है। परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन शक्तियों को भी अपने वश में करके इनके द्वारा कार्य करने वाली शक्ति तो विचार-शक्ति ही है। विचार अथवा चिंतन एक बहुत ही बड़ी शक्ति है। लोगों ने आज जड़ अथवा भौतिक शक्तियों के महत्व को तो समझ...
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समन्वित खेती यानी लाभ का मंत्र

4 सप्ताह पहले
कभी बाढ़ तो कभी सूखा, कभी बीजों का न मिलना तो कभी सिंचाई के लिए पानी का अकाल। देश में खेती-किसानी का यह संकट आज भी एक बड़ी चुनौती है। अच्छी बात यह है कि सरकारी योजना और मदद के अलावा खेती करने की परंपरा में बदलाव लाकर इस दिशा में न सिर्फ महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, बल्कि वे अपने उद्यम से यह भी सिद्ध कर रहे हैं खेती घाटे का नहीं, बल्कि एक लाभकारी सौदा है। यह सवाल हर किसान का है। अभी हाल में आई बाढ़ ने तटवर्ती इलाकों में किसानों की कमर तोड़ दी है, अनाज खेतों में ही सड़ गए। ऐसे में अब खेतों से अधिक उत्पादन लेने की जुगत करनी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विभिन्न अवसरों पर अपने भाषणों में मंशा जताई है कि वर्ष 2022-23 तक किसानों...
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गुरु-शिष्य संबंध और परंपरा

4 सप्ताह पहले
किसी गुरु के साथ केवल एक भौतिक संगति को सत्संग नहीं माना जा सकता है। सत्संग का वास्तविक अर्थ है कि ज्ञान की खोज में शिष्य की भागीदारी उसके गुरु की भागीदारी से समान रूप से जुड़ा होता है। गुरु अपने शिष्य को ज्ञान की तलाश में राह दिखाता है। इसीलिए उपनिषद की कथा में हम देखते हैं कि किस प्रकार नचिकेता यम को उत्तर देने का हठ करता है। उद्दालक को भी हम स्वेतकेतु से ‘स्वयं’ की प्रकृति को दोहराते हुए देखते हैं। उद्दालक जीव और ब्रह्म के बीच समीकरण दिखाने के लिए नौ चित्रण प्रस्तुत करते हैं जो उस करूणा का साक्ष्य है जो वैदांतिक गुरुओं का उनके शिष्य के प्रति था। संक्षेप में, यह एक गुरु और उनकी दी हुई शिक्षा की अर्थपूर्ण भागीदारी है...
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नदी जुड़े तो खेती बढ़े

5 सप्ताह पहले
स्वाभाविक रूप से खेती बड़े संकट में है और यह ऐसा संकट है, जिसे ठीक प्रकार से समझना होगा। इसमें कोई बड़ी समस्या है तो वह पानी की समस्या है। यह सच है कि दिल्ली के लोगों को पानी की समस्या क्या है? हमारे यहां पानी के लिए 400 फीट नीचे जाना होता है। तब जाकर पानी मिलता है। पानी की गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में अधिक समस्या है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में भी थोड़ी समस्या है। पंजाब, हरियाणा और बिहार के छोटे-छोटे पॉकेट में भी थोड़ी-थोड़ी समस्या हो सकती है। सबसे कम सिंचाई झारखंड में है। पानी पर कोई सरकार सबसे अच्छा काम कर रही है तो वह तेलंगाना ...
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जैसा आचार वैसा विचार

5 सप्ताह पहले
वैज्ञानिकों ने विद्युत, चुंबकत्व, प्रकाश, ध्वनि और उष्मा-इन शक्तियों को जानकर बड़े-बड़े आविष्कार किए हैं। इससे उन्होंने समाज को अनेक प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई है। पदार्थ जगत में अणु के विस्फोट से भी एक बहुत बड़ी शक्ति को हासिल किया गया है। इन शक्तियों को अपने नियंत्रण में लाकर इनके द्वारा अद्भुत मशीनों एवं साधनों का निर्माण करने के फलस्वरूप आज का मानव विज्ञान के चमत्कारों से बहुत ही प्रभावित है। परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन शक्तियों को भी अपने वश में करके इनके द्वारा कार्य करने वाली शक्ति तो विचार-शक्ति ही है। विचार अथवा चिंतन एक बहुत ही बड़ी शक्ति है। लोगों ने आज जड़ अथवा भौतिक शक्तियों के महत्व को तो समझा...
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वैकल्पिक राजनीति का प्रथम सूत्रधार

6 सप्ताह पहले
कांग्रेस की राजनीति के बरक्स जिस राजनीति के दम पर भारतीय जनता पार्टी देश की सत्ता पर काबिज है, उस वैकल्पिक राजनीति की नींव आजादी के तुरंत बाद ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही रखी थी। आजाद भारत में राष्ट्र के नवनिर्माण का सवाल सबके सामने था। नवनिर्माण के नेहरू मॉडल को देश को स्वीकार करना पड़ा, लेकिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस बात के पक्ष में नहीं थे कि नवनिर्माण के नाम पर देश आंखें मूंद कर पश्चिम का अनुकरण करे। उनका स्पष्ट मत था कि आधुनिक भारत की नींव देश की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के उपर रखी जाए ताकि आनेवाली पीढ़ियों को देश के गौरवशाली अतीत से अवगत कराया जा सके।   नेहरू मॉडल और डॉ. मुखर्जी के बीच की यह वैचारिक ...


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