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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

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सात दशक और लोकतांत्रिक ललक

4 दिन पहले
इन दिनों भारतीय समाज और राजनीति दोनों ही विमर्श के नए धरातल को तलाशने में लगे हैं। ऐसा इसीलिए कि बीते तीन सालों में ग्लोबल छतरी का रंग ही नहीं, उसके नीचे खड़े देशों की गिनती और हैसियत भी बदल गई है। कहीं ब्रेक्जिट जैसा संकट है, तो कहीं वैश्विक नेतृत्व का वह विकल्प जिसकी संभावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में पैदा हुई है। कह सकते हैं कि कम समय में आए ये बड़े बदलाव हैं। हालांकि इसका एक अर्थ यह भी है कि देश में परिवर्तन का मिजाज पहले से बन गया था, भले ही कैलेंडर में यह हालिया दिख रहा हो। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक सुखद लक्षण भी है, क्योंकि एक तरफ जागरूक लोकतंत्र अपनी केंद्रीय उपस्थिति को लेकर दशकों बाद एक तरह से संतोष का ...
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इस ‘गदर’ को भी रखें याद

4 दिन पहले
एक देश जिसने तकरीबन सौ साल का गहन स्वाधीनता संघर्ष जिया हो, उसके पास प्रखर संघर्ष क्षमता और राष्ट्रीय मूल्यबोध के इतने अक्षर दस्तावेज तो होने ही चाहिए कि देशवासियों के लिए कभी राष्ट्रप्रेम की प्रेरक ऊर्जा कम न पड़े। यों तो भारतीय स्वाधीनता संघर्ष पर किताबों की कमी नहीं है। खासौतर पर ऐतिहासिक रूप से इस संघर्ष को कई-कई चश्मों से देखा गया है। पर अगर बात करें साहित्य की तो देश के इतिहास के इस अन्यतम अनुभव को शब्द देने का काम अपेक्षित रूप से नहीं हुआ है। इस लिहाज से वेदप्रकाश 'वटुक’ की 'आजादी या मौत’ पुस्तक काफी अहम है। इस किताब में गदर पार्टी के 1848 से लेकर 1910 तक के आंदोलनात्मक इतिहास की महज ब्योरेबाजी नहीं है, ब...
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सुपर पावर बनने की राह पर भारत

2 सप्ताह पहले
क्या ‘सुपर पावर’ बनने की आकांक्षा रखने वाले किसी भी राष्ट्र को रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भर रहना चाहिए अथवा स्व‍देश में रक्षा उत्पादन अथवा रक्षा क्षेत्र से जुड़े औद्योगिक आधार की अनदेखी करनी चाहिए? निश्चित तौर पर यह उचित नहीं है। स्वदेश में रक्षा उत्पादन अथवा रक्षा क्षेत्र से जुड़ा औद्योगिक आधार किसी भी देश के दीर्घकालिक सामरिक नियोजन का अभिन्न अवयव है। आयात पर अधिक निर्भरता न केवल सामरिक नीति एवं इस क्षेत्र की सुरक्षा में भारत द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के नजरिए से अत्यंत नुकसानदेह है, बल्कि विकास एवं रोजगार सृजन की संभावनाओं के मद्देनजर भी चिंता का विषय है। वैसे तो शक्ति‍ से जुड़े तमाम स्वरूपों को हासिल...
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आगा खान पैलेस में महात्मा

2 सप्ताह पहले
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और महात्मा गांधी को एक साथ देखते हुए अक्सर राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष की आवेगी तीव्रता को लोग ज्यादा रेखांकित करते हैं। तथ्यगत रूप में ऐसा है भी, क्योंकि 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस के तमाम राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में आक्रोश उभरा। स्वाधीनता को लेकर ‘करो या मरो’ का एेलान खुद गांधी जी ने पहले ही कर दिया था। ऐसे में एक तरफ जहां फिरंगी हुकूमत ने दमनात्मक कार्रवाइयों के जरिए लोगों के विद्रोह को कुचलने की बर्बर मंशा दिखाई, वहीं लोगों ने इस दमन के खिलाफ लोहा लेते हुए बलिदानी संघर्ष का प्रेरक इतिहास रचा। अंतत: अगले पांच सालों में यह नौबत आई कि अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। पर ...
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निमोनिया के खिलाफ जंग

2 सप्ताह पहले
2014 में मौजूदा सरकार ने भारत की जनता से यह वादा किया था कि वह उनके स्वास्थ्य  की रक्षा करेगी और इस देश के स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों को अपने जीवन को बचाने और स्वस्थ जीवन जीने का हर अवसर प्रदान करेगी। उठाए गए प्रमुख कदमों के तहत यथासंभव कई रोगों से अपने बच्चोंे को सुरक्षित करना है। इस संबंध में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के जरिए नए टीके शुरू करना और उन्हें  हर व्यक्ति तक पहुंचाना शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व के तहत जन स्वस्थ्य के  क्षेत्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला था। आज मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यह वायदा पूरा होने की दिशा में अग्रसर है।  कई दशकों से हमारे बच्चे ऐसे रोगों के कारण असमय मृत्यु  को प्राप...
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पहले चिंता की फसल, अब फसल की चिंता

2 सप्ताह पहले
आधुनिकता एक काल सापेक्ष अवधारणा है। इस अवधारणा के साथ देखें तो भारत लंबे समय से एक आधुनिक राष्ट्र रहा है। यही नहीं, हमारी आधुनिकता की खासियत यह भी रही कि हमने परंपराओं की जमीन को उस तरह उजड़ने नहीं दिया, जैसा आधुनिकता की होड़ में दुनिया के कई नामवर देशों ने किया। आधुनिकता और परंपरा के इस मेल को आज भी भारत की राजनीति से लेकर जीवनशैली और आजीविका के तरीकों के तौर पर देख सकते हैं। कृषि भारतीय उद्यम परंपरा की सबसे बड़ी निशानी है। भारतीय कृषि ने समय के साथ अपने तौर-तरीके तो बदले पर कृषक भारत का ठेठ स्वभाव ज्यादा नहीं बदला।  आज भी जब हम किसी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हैं तो उसकी उपलब्धियों के लाख दावों के बीच सबसे वजनदार बात यही होती है कि उसके कार्यकाल में कृषि क्षेत्र ने ...
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जीत फेडरर की, संन्यास बार्तोली का

3 सप्ताह पहले
इस बार विंबलडन टाइटल जीता है स्विटजरलैंड के रोजर फेडरर ने, लेकिन मीडिया में यह खबर महज इस तरह नहीं आई। दरअसल, फेडरर के विंबलडन जीतने के साथ ज्यादा दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने आठवीं बार विंबलडन टाइटल जीता और वह भी 36 साल की रिकाॅर्ड उम्र में। पर यह फेडरर की जिजीविषा ही थी, जिसने कोर्ट पर उनकी वापसी करवाई और उन्हें बना दिया चैंपियंस का भी चैंपियन। फेडरर का यह 19वां ग्रैंडस्लैम खिताब है। अलबत्ता खेल और उससे जुड़े करियर में एक अहम एंगल जेंडर का भी है। इस बात को समझने के लिए चार साल पहले एक करामाती महिला विंबलडन खिलाड़ी के अचानक संन्यास की घोषणा से जुड़ी कुछ बातों को याद करना जरूरी है। दरअसल हम बात कर रहे हैं फ्रांस की टेनिस स्टार मरियन बार्तोली की, जिसने 28 साल की उम्र में संन्...
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कलम के सिपाही का विमर्श

3 सप्ताह पहले
प्रेमचंद को लेकर जब यह कहा जाता है कि वे ‘कलम के सिपाही’ या ‘कथासम्राट’ थे, तो उनके जीवन और अवदान का एक बड़ा पक्ष सामने आने से रह जाता है। निस्संदेह वे बड़े कथाकार थे, पर इससे आगे वे बीसवीं सदी के ऐसे विमर्श पुरुष थे, जिनकी बातें आज भी गौर से सुनी जानी चाहिए। तुलनात्मक तरीके से भले न सही, पर उनके जीवन और अवदान को समझने के लिए हम गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का उदाहरण सामने रख सकते हैं। प्रेमचंद की प्रासंगिकता को चिन्हित करते हुए उनके कथा संसार से बाहर उनके सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों को भी रेखांकित करने की जरूरत है। यह दरकार इसीलिए भी जरूरी है, क्योंकि जिस प्रगतिशील चिंतन और लेखन धारा से उन्हें जोड़कर या उसके सूत्रधार के तौर पर हम देखते हैं, वह धारा अब काफी क्षीण हो...
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ऐसे थे क्रांतिधर्मी ‘पंडित जी’

5 सप्ताह पहले
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सबसे चमकती इबारत निस्संदेह उन क्रांतिवीरों ने लिखी, जिन्होंने अपनी कुर्बानी से देश में जहां एक तरफ देशभक्ति के जज्बे को बढ़ाया, वहीं सबको फिरंगी हुकूमत से भिड़ने की निर्भीक प्रेरणा दी। आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की तरुणाई अपने उद्यम और क्षमता से कई क्षेत्रों में भारतीय मेधा का लोहा मनवा रही है। पर यहां गौर करना जरूरी है कि आज जिस आजाद भारत में हम सांस ले रहे हैं और कई तरह की सहूलियतें हासिल कर पा रहे हैं, उसके पीछे संघर्ष का एक लंबा इतिहास है।  इतिहास के ये पन्ने किताबों में तो हैं ही, इन्हें सदा हमारी स्मृतियों में भी होना चाहिए। वैसे भी भारत का स्वतंत्रता संग्राम कई मायनों में विलक्षण है। पहली विलक्षणता तो यही कि देश में पहले सांस्कृतिक न...
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मंडेला स्मरणीय, तो महात्मा वंदनीय

5 सप्ताह पहले
नेल्सन मंडेला जब पांच दिसंबर, 2013 को दुनिया छोड़ कर चले गए, तो उन्हें याद करने वालों ने उनके साथ गांधी की स्मृति और प्रेरणा को भी नमन किया। दिलचस्प है कि 20वीं सदी ने जहां मध्यकालीन बर्बरता से लेकर दो विश्व युद्ध देखे, वहीं गांधी, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे महापुरुष भी देखे, जिनके संघर्ष में धैर्य और प्रतिरोध मानवीयता की सीमा का कहीं भी उल्लंघन नहीं करते हैं। यह अलग बात है कि 21वीं सदी की दुनिया ने खुद को रफ्तार और तकनीक की स्पर्धा में इस तरह लगा दिया कि उसने इन विभूतियों को स्मरणीय तो बनाए रखा पर इनके अनुकरण की लीक छोटी पड़ती गई।  मंडेला निश्चय ही गांधीवादी परंपरा के बड़े नायक रहे। उनके संघर्ष ने साम्राज्यवाद और नस्लभेद की चूलें हिला दीं। दक्षिण अफ्रीका आज अ...
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वृक्ष ही बचाएंगे हमें

6 सप्ताह पहले
प्रकृति के बिना मनुष्य के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल-जंगल के बिना जन का जीवन संभव है क्या? साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी इस प्रश्न का उत्तर जानता है। लेकिन, लालच से वशीभूत आदमी प्रकृति का संवर्द्धन करने की जगह निरंतर उसका शोषण कर रहा है। हालांकि वास्तविकता यही है कि वह प्रकृति को चोट नहीं पहुंचा रहा है, वरन स्वयं के जीवन के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कर रहा है। देर से ही सही अब दुनिया को यह बात समझ आने लगी है। पर्यावरण बचाने के लिए दुनिया में चल रहा चिंतन इस बात का प्रमाण है। भारत जैसे प्रकृति पूजक देश में भी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़े हैं। प्रमुख नदियों का अस्तित्व संकट में है। जंगल साफ हो रहे हैं। पानी का संकट है। हवा प्रदूषित है...
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लगाव होंगे समाप्त तो नहीं होंगे जीवन में दुख-दर्द

6 सप्ताह पहले
जब हम समय या परिस्थिति की अनिवार्यता को आंख मूंदकर स्वयं को उसके अनुकूल बना लेते हैं तभी ये अनुभव होने लगता है कि कोई बात है जो दर्द का कारण है और तब हमें यह सामान्य अनुभव होता है। ध्यान से देखें तो हम स्वयं परिस्थितियों से निरंतर जुड़ाव को उतना महत्व देते भी नहीं। शायद यही परेशानियों का मुख्य कारण है। हम स्वयं को भौतिक वस्तुओं, अपने घर, अपने बैंक खाते, साझेदारों और माहौल आदि से जोड़े रखते हैं। इसी जुड़ाव के कारण हम जिनसे बेहद लगाव अनुभव करते हैं, उनके खो जाने से उतना ही विचलित हो जाते हैं। परिणाम यह है कि ऐसी परिस्थिति आ जाने पर उसका सामना करना हमें मुश्किल लगता है। हम अपनी प्यारी वस्तुओं को लेकर सामान्य तौर पर इतने अभ्यस्त हैं क...


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