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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

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लौहपुरुष का अनुशासन

6 घंटे पहले
करीब 100 साल पहले अहमदाबाद में जब महात्मा गांधी और सरदार पटेल दोनों मिले तो उम्मीद थी की राजनीति पर गरम बहस होगी, लेकिन यहां तो धर्म-कर्म पर काफी देर तक चर्चा होती रही। पर 41 साल के बेहद सख्त मिजाज के बैरिस्टर में उस मुलाकात के बाद कुछ बेहद स्थायी बदलाव आए। गांधी के शब्द उनके कानों में तब तक गूंजते रहे, जब तक वो सत्याग्रह आंदोलन में खुद शामिल नहीं हो गए। हालांकि बेहद व्यावहारिक इंसान होने की वजह से अपने झुकाव के बावजूद खुलकर आंदोलन में 1917 में जाकर शामिल हुए। उसी साल चंपारण आंदोलन के बाद गांधी देश के राजनीतिक मसीहा बन चुके थे। बैरिस्टर उसके बाद गांधी के विश्वासपात्र बन गए और आगे चलकर धीरे-धीरे गांधी के दायां हाथ हो गए। जो भी गा...
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एक नोबेल संस्था है यूनिसेफ

7 घंटे पहले
यूनिसेफ की स्थापना तो खैर 11 दिसंबर, 1946 को ही न्यूयॉर्क में हो गई थी, पर इसने 1959 में पूरी ध्यान का ध्यान तब खींचा जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बच्चों के अधिकारों की घोषणा की और जिसे दुनिया के कई देशों ने अपनाया। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर यह दुनिया की पहली अंतरराष्ट्रीय घोषणा थी। यूनिसेफ के योगदान को तब और पहचान मिली, जब उसे 1965 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। इस पुरस्कार को स्वीकार करते हुए कार्यकारी निदेशक हेनरी लेबुइज ने समिति से कहा, ‘आपने हमें नई ताकत प्रदान की है।’ आज यूनिसेफ की पहचान ऐसी वैश्विक संस्था के रूप में है, जो दुनिया भर में बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए काम करता...
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दलितों का अर्थ उद्यम

एक सप्ताह पहले
डॉ. आंबेडकर बराबर दलितों को शिक्षित और संगठित होने पर जोर देते थे। उनके निधन के छह दशक बाद स्थिति यह है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से दबे-कुचले दलित अब व्यवसाय की दुनिया में भी मुक्कमल जगह बना रहे हैं। दलित उद्यमियों ने फिक्की, एसोचैम और सीआईआई की तर्ज पर अपना संगठन बना लिया है- दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री यानी डिक्की। डिक्की के संस्थापक मिलिंद कांबले अगले एक दशक में दलित उद्यमियों की सफलता को कुबेरी आंकड़े में देखते हैं और फख्र के साथ कहते हैं कि वो दिन अब लदने वाला है, जब अरबपतियों की सूची में दलित नाम ढूंढे नहीं मिलते थे। जो शुरुआत डिक्की और देश के कुछ महत्वाकांक्षी दलित कारोबारियों के साथ हुई है, भविष्य में वह दे...
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संविधान निर्माण का असाधारण कार्य

एक सप्ताह पहले
संविधान सभा के कार्य पर नजर डालते हुए 9 दिसंबर,1946 को हुई उसकी पहली बैठक के बाद अब दो वर्ष, ग्यारह महीने और सत्रह दिन हो जाएंगे। इस अवधि के दौरान संविधान सभा की कुल मिलाकर 11 बैठकें हुई हैं। इन 11 सत्रों में से छह उद्देश्य प्रस्ताव पास करने तथा मूलभूत अधिकारों पर, संघीय संविधान पर, संघ की शक्तियों पर, राज्यों के संविधान पर, अल्पसंख्यकों पर, अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों पर बनी समितियों की रिपोर्टों पर विचार करने में व्यतीत हुए। सातवें, आठवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें सत्र प्रारूप संविधान पर विचार करने के लिए उपयोग किए गए। संविधान सभा के इन 11 सत्रों में 165 दिन कार्य हुआ। इनमें से 114 दिन प्रारूप संविधान के विचारार्...
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स्वच्छता का अहिंसक मार्ग

2 सप्ताह पहले
महात्मा गांधी के घुमंतू जीवन में ऐसे अनगिनत अवसर आए जिनसे स्वच्छता और सेवा का संबंध स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है और तब गांधी जी अपने आप को ‘हर एक को खुद का सफाईकर्मी होना चाहिए’ के आदर्श के जीते-जागते उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। इस बात के बारे में आश्वस्त हो जाने पर कि वह ‘किसी को भी गंदे पांव अपने मस्तिष्क से होकर गुजरने नहीं देंगे’, गांधी जी ने झाड़ू को जीवन भर मजबूती से अपने हाथों में थामे रखा और ‘सफाईकर्मी की तरह’ अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने का कोई अवसर नहीं गंवाया।   अफ्रीका में फीनिक्स  से भारत में सेवाग्राम तक गांधी जी के आश्रम इस बात का जीता-जागता उदाहरण रहा कि ...
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एक वन बेटियों को समर्पित

2 सप्ताह पहले
हिमाचल प्रदेश के उना जिले में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक बड़ी और अनूठी पहल हुई है। कमाल की बात है कि इस कार्य को ग्रामीणों ने अपनी सूझ और बूते से किया है। अलबत्ता इस कार्य में जिला प्रशासन ने भी पर्याप्त सहयोग किया है। दरअसल हम बात कर रहे हैं उना के टकारला गांव की, जहां के लोगों ने अपनी बेटियों के नाम वन लगाया है। उना जिला प्रशासन ने बीते वर्ष जनसाधारण को नारा दिया है- 'बेटी बचाओ, पेड़ लगाओ’। इसके पीछे उनकी सोच यही है कि बेटियों के प्रति समाज का नजरिया और विकसित हो और पौधारोपण के लिए लोग आगे आएं व पर्यावरण सरंक्षण में उनकी सहभागिता बढ़े। एक वन बेटियों को समर्पित करने की उनकी इस पहल ने उना जिला के टकारला गांव को...
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उत्तराखंड त्रासदी के सबक को न भूलें

3 सप्ताह पहले
मैं  16-17 जून 2013 को आई आपदा के तत्काल बाद अलकनंदा और मंदाकिनी के बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में तीन-तीन बार गया, उसके बाद पिंडर नदी एवं बागेश्वर जिले की सरयू एवं रामगंगा नदी, पिथौरागढ़ जिले की गौरी-धौली के साथ ऐलागाढ़ और काली नदी तक की यात्रा की। मंदाकिनी शांत दिखने वाली नदी रही है। समय-समय पर इसकी सहायक धाराएं बौखलाती रही है, जिसके कारण मंदाकिनी इनके अवसाद से प्रभावित हुई और बौखलाई। 1961 के 26-27 जुलाई को हुई अतिवृष्टि से मंदाकिनी की सहायक धारा-डमार गाड़ बहुत बौखलाई थी। उस समय एक बड़े भूस्खलन से डडुवा गांव नष्ट हुआ था, जिसमें तीन दर्जन से अधिक लोग एवं पशु मारे गए थे। 1979 में मंदाकिनी की सहायक नदी क्यौंजागाढ़ के जलग्रहण क्षेत...
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सबके लिए खुशियों का आशियाना

3 सप्ताह पहले
देश में कम से कम साढ़े चार लाख परिवार बेघर हैं। बेघर परिवारों में से प्रत्येक का औसत तकरीबन चार लोगों का है। जनगणना के 2011 के आंकड़ो की मानें तो बीते एक दशक (2001-2011) के बीच बेघर लोगों की संख्या 8 प्रतिशत घटी है, तो भी देश में अभी कुल 17.7 लाख लोग बिल्कुल बेठिकाना हैं। हालांकि देश की कुल आबादी में बेघर लोगों की संख्या महज 0.15 प्रतिशत है तो भी इनकी कुल संख्या, यानी तकरीबन 17 लाख लोगों की अनदेखी नहीं की जा सकती। जनगणना में बेघर परिवार की बड़ी स्पष्ट परिभाषा नियत की गई है। जनगणना में उन परिवारों को बेघर माना जाता है जो किसी इमारत, जनगणना के क्रम में दर्ज मकान में नहीं रहते, बल्कि खुले में, सड़क के किनारे, फुटपाथ, फ्लाईओव...
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स्वच्छता के साथ सामाजिक बदलाव

4 सप्ताह पहले
करीब चार दशक पहले की बात है। बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते मैं भी जुड़ा था। उसी दौरान मैंने देखा कि सिर पर मैला ढोने वाले दलित समाज के लोगों के साथ संभ्रांत लोग कैसा व्यवहार करते हैं। तब सिर पर मैला ढोने वाले लोगों से उस दौर का संभ्रांत समाज इतना अत्याचार करता था कि मेरा मन भर गया। तभी मैंने सिर से मैला उठाने वाले लोगों की मुक्ति के लिए काम करने की ठान ली। चूंकि मैं ब्राह्मण परिवार से था, लिहाजा अपने समाज में मेरा विरोध भी हुआ। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। इसी दौरान मैं सिर पर मैला ढोने वाले लोगों को इस अमानवीय कार्य से मुक्ति दिलाने के बारे में सोचने लगा। इसी सोच से विकसित हुआ दो गड्ढों वाला शौचालय। इसकी तकन...
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स्वच्छता, स्वाधीनता और महात्मा

4 सप्ताह पहले
मध्य महाराष्ट्र के एक नवयुवक ने गांधी जी का आशीर्वाद लेने के लिए उनके सेवाग्राम आश्रम में जाकर उनसे भेंट की। उस नवयुवक ने आईसीएस की प्रारंभिक परीक्षा पास की थी। गांधी जी ने उस नवयुवक से पूछा, तुम आईसीएस क्यों बनना चाहते हो? नवयुवक ने उत्तर दिया, भारत की सेवा करने के लिए। गांधी जी ने उसे सलाह दी, गांव में जाना और साफ-सफाई करना भारत की सबसे उत्कृष्ट सेवा है। इसके बाद आईसीएस बनने के इच्छुक अप्पा पटवर्धन ‘सफाई’ की कला में विशेषज्ञता हासिल कर देश के बेहतरीन स्वाधीनता सेनानियों में शुमार हो गए।  स्वाधीनता संग्राम के विद्यालय में ‘सफाई’ और ‘स्वच्छता’ की पहली शर्त थी। विनोबा भावे, ठक्कर बा...
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जल परिवहन की फेरी

5 सप्ताह पहले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी एवं अत्याधुनिक रो-रो परियोजना का उद्घाटन सौराष्ट्र के भावनगर जिले में घोगा से दक्षिण गुजरात में भरूच जिले के दहेज को जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। हजीरा परियोजना के दूसरे चरण की शुरूआत भारत के परिवहन क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव का सूचक है। इस जलमार्ग की पूरी क्षमता का दोहन करने से लोगों, वस्तुओं और वाहनों की आवाजाही को बड़ी रफ्तार मिलेगी। माल ढुलाई के लिए समय और लागत की बचत का भारत के विनिर्माण एवं निर्यात क्षेत्र पर लाभकारी असर पड़ेगा। अब तक सौराष्ट्र के घोगा से दक्षिण गुजरात के दहेज तक जाने के लिए 360 किलोमीटर की सड़क यात्रा करनी पड़ती थी। इसे तय करने में...
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उम्मीद जगाती है आस्था से भरी तरुणाई

5 सप्ताह पहले
स्वामी विवेकानंद ने जिन दो बातों पर भारतवर्ष की श्रेष्ठता और महानता की कामना की थी, उसमें एक तो था वेदांत दर्शन। जबकि दूसरा आधार था देश के युवा। यह बात ज्यादा पुरानी नहीं है। वैसे भी विवेकानंद को आधुनिक संत माना जाता था। एक ऐसा संत जिसने युवकों को स्वस्थ रहने के लिए नियमित फुटबॉल खेलने की सलाह दी थी। भारत आज दुनिया का सबसे तरुण देश है। देश की 125 करोड़ की आबादी के 65 फीसदी हिस्से की उम्र 35 साल से कम है। इस युवा आबादी का करीब आधा भाग 25 साल या उससे कम उम्र का है।  जाहिर है कि देश को इसका कुछ अंदाजा होना ही चाहिए कि युवा वर्ग विभिन्न विषयों पर क्या सोचता है। उसकी सोच काफी हद तक भारत के मन-मिजाज और स्वभाव का परिचय दे स...


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