sulabh swatchh bharat

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

languages-will-survive-we-will-also-survive

भाषाएं बचेंगी, तो हम भी बचेंगे

एक दिन पहले
ऐसे कठिन दौर में जब हर चीज का अस्तित्व  मुनाफे से निर्धारित हो रहा है, भाषाओं को बचाए जाने के सवाल पर सही राय बनाना और मातृभाषाओं के पक्ष में बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाना एक ऐतिहासिक जरूरत है। इस दिशा में सरकारी प्रयास भी मदद कर सकते हैं, भारतीय संदर्भ में खासी भाषा इसका उदाहरण है, जो पहले यूनेस्को की खतरे की स्थिति वाली भाषाओं में शामिल थी, लेकिन मेघालय सरकार द्वारा उसे कामकाज की भाषा बनाने और विभिन्न क्षेत्रों में इस्तेमाल शुरू करने से उसे नया जीवन मिल गया। इसी तरह शेष भारतीय भाषाओं को बचाने की भी पहल की जानी चाहिए। खासतौर पर आदिवासी भाषाओं को बचाने के लिए, क्यों कि इस वक्ता सबसे ज्यादा खतरा आदिवासी भाषाओं के सामने ही है। वडोदरा के भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के सर्वे के...
modern-example-of-ideal-marriage

आदर्श दांपत्य की आधुनिक मिसाल

एक दिन पहले
बा और बापू, दांपत्य जीवन की यह जोड़ी हर लिहाज से आदर्श है। यह अलग बात है कि महात्मा गांधी के मुकाबले बा की चर्चा कम होती है, पर जिन लोगों ने भी गांधी जी के जीवन को करीब से देखा है, उन्होंने कस्तूरबा के जीवन, त्याग और आदर्श को रेखांकित किया है। कह सकते हैं कि अगर गांधी जी देश के करोड़ों लोगों के लिए ‘बापू’ हैं तो कस्तूरबा गांधी ‘बा’ यानी मां हैं। 11 अप्रैल 1869 को जन्मीं कस्तूरबा अपने पति से करीब छह महीने बड़ी थीं। दोनों की मई 1883 में शादी हो गई। शादी के समय दोनों की उम्र करीब 13-14 साल थी। दोनों ने छह दशक से लंबा समय एक साथ व्यतीत किया। 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा ने आखिरी सांस ली। खुद महात्मा महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया कि वे इसके बाद अकेले पड़ गए। क...
spiritual-experimentation-and-paramhansa

आध्यात्मिक प्रयोग और परमहंस

एक सप्ताह पहले
जैसे यूनान में सुकरात के लिए प्लेटो और जेनोफन ने किया। कुछ-कुछ वैसा ही रामकृष्ण परमहंस के बारे में भी हुआ। आज हम रामकृष्ण परमहंस को जिस रूप में जानते हैं, वह शायद वैसा नहीं होता, यदि केशवचंद्र सेन और विवेकानंद ने दुनिया को उनके जीवन और विचारों के बारे में इस रूप में बताया न होता। लेकिन असली गुरुओं की यही सहजता, सरलता और गुमनामी ही उनकी महानता होती है। आत्मप्रचार से दूर वे अपनी साधना और मानव सेवा में लगे रहते हैं। रामकृष्ण परमहंस के जीवन को यदि तीन शब्दों में व्यक्त करना हो, तो वे होंगे- त्याग, सेवा और साधना। यदि दो शब्द और जोड़ने हों तो वे शब्द होंगे- प्रयोग और समन्वय। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनका जीवन और व्य...
inspiration-of-nav-bharat

नवभारत के निर्माण की प्रेरणा

एक सप्ताह पहले
19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण आंदोलन मे महर्षि दयानंद सरस्वती का राष्ट्र चिंतन परवर्ती भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के चिंतन की आधारशिला बना। महर्षि दयानंद के राष्ट्र-चिंतन का आधार वेद था, जिन्हें महर्षि ने सभी सत्यविद्याओं की पुस्तक घोषित किया। किसी भी विषय के व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही उसके क्रियान्वयन और उसके परिणाम की अभिव्यक्ति होती है और यही चिंतन अन्त:वैश्वीकरण के रूप में युगानुरूप राष्ट्रीय आंदोलन की बहुआयामी प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त करता रहा है। महर्षि दयानंद सरस्वती के समक्ष विभिन्न प्रकार की चुनौतियां थीं। एक ओर ब्रिटिश साम्राज्य की आधीनता, तो दूसरी ओर भारतीय समाज में आई सामाजिक और धार्मिक विकृतियां। महर्षि दयानंद सरस्वत...
chipkos-south-carp

चिपको का दक्षिण सर्ग

2 सप्ताह पहले
चिपको आंदोलन की तरह दक्षिण भारत के अप्पिको आंदोलन को अब तीन दशक से ज्यादा हो गए हैं। दक्षिण भारत में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने में इसका उल्लेखनीय योगदान है। देशी बीजों से लेकर वनों को बचाने का आंदोलन लगातार कई रूपों में फैल रहा है। हाल ही में मैं अप्पिको आंदोलन के सूत्रधार पांडुरंग हेगड़े से मिला। सिरसी स्थित अप्पिको आंदोलन के कार्यालय में उनसे मुलाकात और लंबी बातचीत हुई। करीब 34 साल बीत गए, वे इस मिशन में लगातार सक्रिय हैं। अब वे अलग-अलग तरह से पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने की कोशिश कर रहे हैं। 80 के दशक में उभरे अप्पिको आंदोलन में पांडुरंग हेगड़े जी की ही प्रमुख भूमिका रही है। एक जमाने में दिल्ली विश्वविद्याल...
bacteriophage-and-clean-ganga

बैक्टीरियोफेज और स्वच्छ गंगा

2 सप्ताह पहले
अब यह एक स्थापित तथ्य है कि यदि गंगाजल में वर्षों रखने के बाद भी खराब न होने का विशेष रासायनिक गुण है, तो इसकी वजह है इसमें पाई जाने वाली एक अनन्य रचना। इस रचना को हम सभी ‘बैक्टीरियोफेज’ के नाम से जानते हैं। बैक्टीरियोफेज, हिमालय में जन्मा एक ऐसा विचित्र ढांचा है कि जो न सांस लेता है, न भोजन करता है और न ही अपनी किसी प्रतिकृति का निर्माण करता है। बैक्टीरियोफेज, अपने मेजबान में घुसकर क्रिया करता है और उसकी नायाब मेजबान है गंगा की सिल्ट। गंगा में मूल उत्कृष्ट किस्म की सिल्ट में बैक्टीरिया को नाश करने का खास गुण है। गंगा की सिल्ट का यह गुण भी खास है कि इसके कारण, गंगाजल में से कॉपर और क्रोमियम स्रावित होकर अलग हो जाते ह...
on-the-last-day-of-bapu

बापू के आखिरी दिन

3 सप्ताह पहले
नौ सितंबर 1947 को महात्मा गांधी कलकत्ता से दिल्ली पहुंचे थे। उनके रहने की व्यवस्था बिड़ला भवन में थी। यहां गांधी जी और उनके सहयोगियों के इस्तेमाल के लिए एक एक बड़ा सा कमरा था, जिसमें कालीन बिछा था। इससे सटा एक और कमरा था, जिसमें नहाने और नित्य-क्रिया से निवृत होने की व्यवस्था थी। इस विशाल इमारत के भूतल पर बना हुआ यह कमरा ऐसा था कि इसे किसी भी काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। इसके एक कोने पर एक मोटा सूती का गद्दा रखा था और कमर टिकाने के लिए एक तकिया भी। साथ में एक मेज भी थी। दूसरे कोने पर लिखने-पढ़ने के लिए एक कुर्सी-मेज रखी थी। गांधी जी का दिन यहां अमूमन चिट्ठियां लिखते, लोगों से बातचीत करते, चरखा कातते और दोपहर एक झपकी लेते...
life-of-widowed-mothers-and-accessibility-initiatives

विधवा माताअों का जीवन और सुलभ की पहल

4 सप्ताह पहले
बात महिला अस्मिता की करें तो 19वीं शताब्दी में सामाजिक हालात एेसे नहीं थे कि आप इस बारे में किसी तरह का संतोष जता पाएं। घर में बेटी का जन्म जहां अभिशाप समझा जाता था, वहीं उनकी शादी एक बोझ की तरह था। विधवाअों के जीवन को तो पूरी तरह अशुभ ही माना जाता था। आलम यह था कि पति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह उसके साथ सती हो जाए। यह बर्बर सामाजिक प्रथा मृत पति की चिता पर जीवित रहते प्राण त्याग करने की थी। उस दौर में उन तमाम लोगों ने जिन्होंने महिलाअों के प्रति समाज की इस बर्बरता के खिलाफ अभियान छोड़ा और इसे एक जरूरी सामाजिक मुद्दा बनाया, उन्होंने खासतौर पर विधवाअों की नारकीय स्थिति को लेकर आवाज जरूर उठाई। हम यह...
indian-food-in-the-fast-food-times

फास्ट फूड के जमाने में भारतीय भोजन

5 सप्ताह पहले
भूख स्वाभाविक इच्छा है। यह हमारी योजना का परिणाम नहीं है। भोजन बिना शरीर नहीं चलता। सो प्रकृति ने हम सबके शरीर में 'भूख' नाम की इच्छा ग्रंथि जोड़ी है। पीछे सप्ताह कोहरे की एक रात में मैं अपने सहायक दल के साथ उत्तर प्रदेश में प्रवास पर था। सड़क के किनारे ढाबे की खोज में था। स्थानीय पुलिस ने मुझे एक सुंदर होटल तक पहुंचाया। ठेठ ग्रामीण क्षेत्र में भी मैनेजर ने अंग्रेजी टाइप बातें की। उसने अंग्रेजी टाइप भाषा में खाद्य पदार्थो के नाम बताए। मेरा भाषा ज्ञान दगा दे रहा था। टमाटर को पानी में उबाल कर मसाला मिलाकर बने रस को 'टोमैटो सूप' कहना उचित है। पर इसके गाढ़ेपन का राज क्या? मन में प्रश्न उठे कि इसमें कुछ मिलाया तो नहीं...
shahadat-of-sher-e-sindh

शेर-ए-सिंध की शहादत

5 सप्ताह पहले
भारत का स्वाधीनता संघर्ष कई क्रांतिकारियों की कुर्बानी की एक ऐसी रक्तिम दास्तान है, जिन्होंने देश के लिए कुछ भी करने का ऐसा जज्बा दिखाया कि उसके बारे में जानकर रोमांच और गौरव से दिल भर आता है। ऐसे ही एक अमर क्रांतिकारी रहे हेमू कालाणी। संसद के प्रवेश द्वार पर अमर शहीद हेमू कालाणी की प्रतिमा देश के लिए प्राणों की आहूति देने वाले भारत के इस सच्चे सपूत हेमू कालाणी के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि है। सिंध की माटी के इस वीर सपूत को शेर-ए-सिंध कहा गया। 18 अक्टूवर 1983 को देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एवं शहीद हेमू कालाणी की माताजी जेठी बाई कालाणी की उपस्थिति में इस महान क्रांतिकारी पर जब डाक टिकट जारी किया था। गुलामी की जंजीरों मे...
vivek-of-indias-discovery

भारत की खोज का ‘विवेक’

6 सप्ताह पहले
अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की महासमाधि के बाद विवेकानंद ‘भारत की खोज’ के लिए निकल पड़े थे। वे नगरों में गए, गांवों में पहुंचे, भिक्षाटन किया, रेलवे स्टेशन के प्लेटफाॅर्म पर सोए, देवालयों के दर्शन किए, पर्वतों और नदियों का भ्रमण किया। मन में बस एक ही कामना थी कि कैसे भारतवर्ष की सुषुप्त आत्मा को जाग्रत किया जाए। ऐसा लगता है कि स्वामी जी एक सामूहिक पुरुषार्थ का सांस्कृतिक रास्ता ढूंढ रहे थे। किसी एक संप्रदाय विशेष का प्रचार-प्रसार करके इतिश्री करना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। पराधीन, दरिद्र, कुंठित और निष्क्रिय भारत को जगाने का युग कार्य उन्हें करना था। सौराष्ट्र की इस बार की यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद का परिभ...
road-safety-question

सड़क पर सुरक्षा का सवाल

6 सप्ताह पहले
औद्योगिक विकास के दस्तक के पहले ही दुनिया ने आवागमन और उसके लिए सड़क और तेज वाहनों के महत्व को जान लिया था। इसीलिए भारत सहित दुनिया के कई मुल्कों में बड़े राजमार्गों का इतिहास सदियों पुराना है। सड़कों का मौजूदा दौर जहां काफी रफ्तार भरा है, वहीं यह कई खतरनाक चुनौतियों को लेकर भी सामने आया है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती है सड़क हादसों में होने वाली मौतें। बात करें भारत की तो सड़क हादसों में हर साल मानव संसाधन का सर्वाधिक नुकसान यहां होता है। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन (आईआरएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की प्रति वर्ष सड़क हादसों में मौत होती है। इसमें भारत की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ज्यादा है। जिनेवा स्थि...


Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो